क्यों पढ़े आरोग्य आपका   ?

स्वस्थ रहें या रोगी?: फैसला आपका

स्वावलम्बी अहिंसक चिकित्सा

( प्रभावशाली-मौलिक-निर्दोष-वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धतियाँ )

आहार चिकित्सा (Diet Therapy)


आहार चिकित्सा (Diet Therapy)

भोजन हेतु समग्र दृष्टिकोण आवश्यक-

                हवा और पानी के पश्चात् शरीर को चलाने के लिये तीसरी मुख्य आवश्यकता भोजन की होती है। भोजन की शरीर के सभी अवयवों के निर्माण में अहं भूमिका होती है। शरीर को ताकत मिलती है। अतः भोजन के बारे में काफी शोध हो रही है। परन्तु अधिकांश आहार विशेषज्ञों ने शरीर को ताकतवर, शक्तिशाली बनाने हेतु आवश्यक रासायनिक तत्त्व और ऊर्जा को जैसे-प्रोटीन, विटामिन, कार्बोज, लवण, जल, वसा और केलोरीज की मात्रा को तो अत्यधिक महत्त्व दिया। किसी खाद्य पदार्थ में क्या-क्या तत्त्व कितनी-कितनी मात्रा में होते हैं, उनकी जानकारी से जन साधारण को अवगत कराया। परन्तु भोजन के अवयव कितने सात्त्विक, अहिंसक, शुद्ध और पवित्र होने चाहिये, उस संबंध में अपेक्षित प्राथमिकता नहीं दी। परिणाम स्वरूप पौष्टिकता के नाम पर आज भक्ष्य-अभक्ष्य, खाद्य-अखाद्य, करणीय-अकरणीय, अहिंसा-हिंसा, न्याय-अन्याय, वर्जित-अवर्जित आदि का विवेक मानव खोता जा रहा है।

                अधिकांश आहार गोष्ठियों में भोजन के पोष्टिक तत्त्वों एवं केलोरिज के बारे में चर्चा और चिन्तन प्रायः सीमित होता है। भोजन से जीवन क्यों, कितना और कैसे प्रभावित होता है? प्रायः गौण रहता है। यदि आपको कोई अपने घर भोजन के लिये आमंत्रित करें, अच्छे से अच्छा भोजन बनावे, परन्तु भोजन खिलाते समय आप पर व्यंग करें, जैसे- क्या आपको जिन्दगी में ऐसा अच्छा भोजन किसी ने कराया? मुझे आवश्यक कार्य से बाहर जाना है, कृपया आप भोजनालय से भोजन लेकर अपनी क्षुधा पूर्ति कर लेना। यदि ऐसा व्यवहार करें तो भोजन में उपलब्ध पोष्टिक तत्त्व क्यों प्रभावहीन हो जाते हैं? चिन्तन की आवश्यकता है।

                भोजन कब, क्यों, कितना, कैसा और कहाँ करना चाहिए और कब, क्यों, कैसा और कहाँ नहीं करना चाहिये? भोजन कहाँ और कैसे वातावरण और बर्तनों में बनाना चाहिये और खिलाना चाहिए? दो भोजन के बीच में कितने समय का कम से कम अन्तराल होना चाहिये? थोड़ा-थोड़ा अथवा बार-बार क्यों नहीं खाना चाहिए? प्रकृति के अनुरूप भोजन का सर्वश्रेष्ठ अनुकूल समय कौन सा होता है? रात्रि भोजन क्यों नहीं करना चाहिए? भोजन करते समय आसपास  का वातावरण, हमारी भूख, आसन, विचार, भावना, मानसिकता, चिन्तन कैसा है? भोजन मौसम और शारीरिक अवस्था के अनुकूल है अथवा नहीं? उसमें क्या-क्या कितने-कितने उपयोगी अथवा अनुपयोगी पदार्थ हैं? जिस उद्देश्य से भोजन किया जा रहा है, उसका कितना प्रतिशत लाभ मिल रहा है? अगर नहीं मिल रहा है, तो क्यों नहीं मिल रहा हैं?

                भोजन को प्रभावित करने वाले ऐसे अनेकों परमावश्यक तथ्य आहार विशेषज्ञों की चर्चा, चिन्तन और अभिव्यक्ति में प्रायः गौण रहते हैं। रोगी को भोजन संबंधी परामर्श देते समय प्रायः उपेक्षित रहते हैं। जिनका महत्त्व पोष्टिकता से भी अधिक होता है। जिस प्रकार विष की चंद बूंदें टनों दूध को अपेय बना देती है। एक चिनगारी सारे घास के ढ़ेर को जलाने की क्षमता रखती है। एक सांप के काटने से व्यक्ति मर सकता है। मृत्यु के लिये सौ सांपों के काटनें की आवश्यकता नहीं होती। ठीक उसी प्रकार भोजन में उपरोक्त तथ्यों में से किसी भी तथ्य की उपेक्षा भोजन से होने वाले लाभ से वंचित रख सकती है।

                भारत के नागरिकों का खान-पान, मौसम की विविधता, विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियाँ, पारिवारिक और सामाजिक संरचना में अनेकता तथा रीति-रिवाजों, त्यौहारों, अलग-अलग उपासना पद्धतियों का समन्वय होने से एक जैसा भोजन संभव नहीं होता। परन्तु पाश्चात्य संस्कृति में प्रायः इतना बदलाव नहीं होता। हमारी दिनचर्या और जीवन शैली विदेशियों से मेल नहीं खाती। अतः भोजन में उनका अन्धाःनुकरण स्वास्थ्य के सदैव अनुकूल हो आवश्यक नहीं।

                जिस वातावरण और स्थान पर हम रहते हैं, हमारे लिये आवश्यक सभी खाद्य पदार्थो का उत्पादन प्रकृति उस क्षेत्र में करती है। सभी जीव जन्तु वही खाते हैं, जो उनके आसपास उपलब्ध होता है। वे कोई खाद्य पदार्थो  का अन्य स्थानों से आयात नहीं करते। अतः जिस मौसम में जो फल, सब्जियाँ और अन्य खाद्य पदार्थ सहज और सरलता से भरपूर मात्रा में उपलब्ध हों, वे सारे पदार्थ प्रायः स्वास्थ्य के अनुकूल होते हैं। प्रकृति के नियम और कानून गरीब और अमीर सबके लिये समान होते हैं। अतः मंहगे, बेमौसमी, आयातित खाद्यान्न का सेवन स्वास्थ्य के लिये सदैव उपयोगी हो, पूर्णत मिथ्याधारणा है।

                जो भोजन सहज रूप से उपलब्ध होता है, उसे शांत भाव से ग्रहण करना चाहिये। भोजन में पौष्टिक तत्त्वों एवं केलोरीज की आवश्यक मात्रा, जितनी ऊर्जा नहीं देती, उससे ज्यादा मानसिक तनाव, भय और चिन्ता के कारण ऊर्जा का अपव्यय हो जाता है, जो घाटे का सौदा होता है। अधिकांश व्यक्तियों को सावधानी रखते हुए भी वही भोजन लेना पड़ता है जो घर में बनता है। घर में प्रत्येक परिजन के आवश्यकतानुसार प्रायः भोजन नहीं बनता। अतः भोजन करते समय भोजन के अवयवों के बारे में व्यर्थ चिन्तन नहीं करना चाहिये। जिससे व्यर्थ तनाव और चिन्ता होती है। जो भोजन में उपलब्ध पौष्टिक तत्त्वों की कमी से ज्यादा हानिकारक होती है। अतः उपलब्ध भोजन को शांत भाव से ग्रहण करना अधिक लाभप्रद होता है।

भोजन में प्राथमिकता क्या हो?

                भोजन के संबंध में हमारी प्राथमिकताएँ क्या हो?क्या कभी हमने मनोबल और आत्मबल की क्षमताओं को जानने, समझने तथा अनुभव करने का प्रयास किया?भोजन न केवल शरीर को ताकत देता है, अपितु हमारे विचारों, भावनाओं, चिन्तन तथा जीवन शैली को भी प्रभावित करता है। जिस प्रकार बिना कपड़े आभूषण से शरीर को सजाने वालों पर दुनिया हँसती हैं। यद्यपि आभूषणों का मूल्य तो कपड़ों (पोशाक) से ज्यादा ही होता है। ठीक उसी प्रकार पौष्टिकता और स्वाद के नाम पर मन और आत्मा को विकारी और कमजोर बनाने वाला भोजन करना अदूरदर्शिता पूर्ण आचरण ही होता है।

भोजन का पूर्ण चयापचय (Metabolism) आवश्यक

                भोजन जितना महत्वपूर्ण नहीं, उतना उसका सही पाचन जरूरी है। भोजन के पाचन से सर्व प्रथम उसका रस बनता है। उसके पश्चात् रक्त, मांस, चर्बी, हड्डी और अंत में वीर्य बनता है। वीर्य का निर्माण चयापचय की सम्पूर्ण क्रिया होने पर ही संभव है। जिस भोजन से मात्र रक्त, चर्बी अथवा हड्डियों आदि के अवयव बनते हों, वीर्य नहीं बनता हो, उस भोजन की पाचन क्रिया को पूर्ण एवं संतुलित नहीं कहा जा सकता। साथ ही हमें असंयम पूर्ण जीवन जीते हुए अपने वीर्य का यथा संभव अपव्यय और दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। वीर्य का नाश कमजोरी और रोगों का आमन्त्रण है तथा वीर्य की रक्षा स्वस्थ जीवन का राजमार्ग। आप स्वयं चिन्तन करें कि आपकी प्राथमिकता क्या है?

                आजकल अधिकांश व्यक्ति प्रायः भोजन शरीर की आवश्यकतानुसार नहीं करते, अपितु मजबूरी और स्वाद की प्राथमिकता के अनुसार करते हैं। भोजन से न केवल स्वाद, अपितु शक्ति भी मिलनी चाहिए। हमें जीने के लिये भोजन करना चाहिये। परन्तु आजकल प्रायः हम भोजन के लिये जीते हैं, ऐसा समझा जावे तो आश्चर्य नहीं। गंदी से गंदी वस्तुओं को खाते समय छान बीन नहीं करते। मात्र उस पर डाली गई सुगन्ध, आकर्षक पेकिंग, मन लुभावने भ्रामक विज्ञापनों से भ्रमित हो स्वाद की लोलुपता के कारण स्वविवेक न होने से ग्रहण करते तनिक भी संकोच नहीं करते। पाचन हो या न हो खाना एक रिवाज बन गया हैं।

                इसी कारण आज दुनिया में 80 प्रतिशत से अधिक व्यक्ति खाने का विवेक न होने अथवा ज्यादा खाने से बीमार होते हैं। इसीलिये तो कहा गया है कि- 'More Dishes more Diseases’ अर्थात् ‘‘जितना ज्यादा खाना उतने ज्यादा रोग।’’ हमारे यहां लोकोक्ति प्रसिद्ध है- ‘‘एक समय खाने वाला योगी, दो समय खाने वाला भोगी, तीन समय खाने वाला रोगी तथा उससे ज्यादा खाने वाला महा रोगी।’’ हम स्वयं आत्म निरीक्षण करें कि हम कौनसी श्रेणी में हैं। इसी कारण बाह्य रूप से भले ही हम अपने आपको स्वस्थ समझें, हमारे शरीर में परोक्ष रूप से सैकड़ों रोग होते हैं।

                हम भलीभांति जानते हैं कि जिस फुटबाल अथवा हाकी की टीम में यदि गोल रक्षक कमजोर हो, वह टीम मैच तभी जीत सकती हैं, जबकि आगे के खिलाड़ी अधिक मजबूत, सजग, सक्रिय हों, ताकि गोलरक्षक तक फुटबाल कम से कम पहुँचे। ठीक उसी प्रकार यदि हम दांतों का कार्य आमाशय से करवाते हैं, तो आमाशय को भोजन पचाने के लिए अधिक श्रम करना पड़ता है, अधिक पाचक रसों की आवश्यकता होती है। परन्तु शरीर सीमित मात्रा में ही पाचक रस भेजता है। परिणामस्वरूप पाचन बिगड़ने लगता है। अतः स्वास्थ्य प्रेमियों को दांतों का कार्य दांतों से ही करना चाहिए न कि आमाशय से। अर्थात् भोजन को पूर्ण चबा-चबा कर ही खाना चाहिए।

बार-बार भोजन करना हानिकारक-

                हमारे ऋर्षि मुनियों ने एकासन करने की जो बात कहीं, उसके पीछे यही उद्देश्य था कि मुँह में जब चाहे कुछ न डाला जाये। जो कुछ खाना हो एक या दो बार ही खाया जाये। ताकि हमारे आमाशय को बाकी समय पूर्ण आराम मिल जाये। जब हम कोई भी पदार्थ मुंह में डालते हैं, चाहें उसकी मात्रा बहुत कम ही क्यों न हो, सारी पाचन व्यवस्था को सजग और सक्रिय हो कार्य करना पड़ता है। जिस प्रकार किसी रेलवे फाटक पर कार्यरत चौकीदार को चाहे अकेला इंजिन उधर से निकले अथवा राजधानी एक्सप्रेस, फाटक बंद करने की प्रक्रिया में उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। किसी बस में चाहे एक यात्री हो अथवा पूरी बस भरी हो, बस चालक को कोई अन्तर नहीं पड़ता। पेट्रोल की खपत में भी बहुत ज्यादा अन्तर नहीं पड़ता। इसी प्रकार जितनी अधिक बार मुंह में कुछ भी डाला जायेगा उतना पाचन अंगों को अधिक कार्य करना पड़ेगा। परिणामस्वरूप जब हमारा मुख्य भोजन होगा तब वे अपनी पूर्ण क्षमता से कार्य नहीं कर पाते। समय पर अच्छी स्वाभाविक भूख नहीं लगती। भोजन समय की नियमितता नहीं रहती। इसी कारण आज अधिकांश व्यक्तियों का पाचन प्रायः ठीक नहीं होता। जितनी कम बार खाया जायेगा, उतनी भूख अच्छी लगेगी और पाचन अच्छा होगा। अतः जो मधुमेह अथवा पाचन संबंधी रोगों से पीड़ित हैं, उन्हें तो बार-बार कभी नहीं खाना चाहिए। परन्तु आज के आहार विशेषज्ञों का सोच इसके विपरीत पाया गया हैं। रोगी को थोड़ा-थोड़ा बार-बार खाने के लिये प्रेरित किया जाता है। जिस पर बिना किसी पूर्वाग्रह शोध एवं चिन्तन आवश्यक है, ताकि मधुमेह तथा पाचन रोग जैसी असाध्य बीमारी से रोगी को राहत दिलाई जा सके।

                जो व्यक्ति अपनी प्रकृति और मौसम के अनुकूल भोजन करता है, भूख से थोड़ा कम और नियमित समय पर भोजन करता है, वह दीर्घजीवी होता है। आधुनिक खान-पान के समय की एक और विशेषता है कि जब शरीर श्रम करता है, तब उसे कम आहार दिया जाता है, और जब वह विश्राम की अवस्था में होता है तो उसे अधिक मात्रा में कैलोरीयुक्त आहार दिया जाता है। जैसे दिन का समय जो मेहनत परिश्रम का होता है तब तो हल्का भोजन, नाश्ता, चाय, काफी, ठंडे पेय आदि कम केलोरी वाले आहार करता है और रात्रि में जो विश्राम का समय होता है, प्रायः गरिष्ठ भोजन किया जाता है, जो स्वास्थ्य के मूल सिद्धान्तों के विपरीत होता है।

भोजन कैसा हो?

            आजकल अप्राकृतिक रासायनिक खाद के उपयोग एवं कीटाणुनाशक औषधियों के अधिक प्रयोग के कारण बाजार में उपलब्ध अधिक खाद्यान्न, फल और सब्जियाँ दूषित हो जाती है। वे शरीर का सम्पूर्ण पोषण नहीं कर सकती बल्कि सेवन से शरीर में विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न होने की संभावना रहती है। हमारे शरीर में अम्ल क्षार का अनुपात 20ः80 है। अतः भोजन में भी यथा संभव 80 प्रतिशत क्षार तत्त्व एवं 20 प्रतिशत अम्ल तत्त्व होने चाहिए, जिससे शारीरिक अवयवों का सही निर्माण हो सकें।

                अतः जिन खाद्य पदार्थो के उत्पादन में रासायनिक खाद, विषैली कीटनाशक दवाओं का उपयोग न किया गया हों, जिसको प्राप्त करने के लिए किसी भी चेतनाशील प्राणी की हत्या न की गई हों अथवा उन पर क्रूरता, अत्याचार और कष्ट नहीं दिये गये हों, जो भोजन अपनी प्राकृतिक अवस्था और स्वरूप में हों उसकी अवस्था एवं स्वरूप में कम से कम परिवर्तन हुआ हों, ऐसे अपनी आवश्यकता के अनुरूप पौष्टिक पदार्थों से ओतप्रोत सात्त्विक भोजन को ही सर्व श्रेष्ठ भोजन कहा जा सकता है।

‘‘पशु खाता है केवल पेट भरने के लिए, मूर्ख खाता है केवल स्वाद के लिए।

बुद्धिमान खाता है आरोग्य और शक्ति के लिए, सन्त खाता है केवल साधना के लिए।।’’

                हम स्वयं निर्णय करें कि हम कैसा भोजन कर रहे हैं। यदि हम अपने आपको बुद्धिमान समझते हैं, तो भोजन को ग्रहण करने से पूर्व एक क्षण चिन्तन करें क्या भोजन हमारे अनुकूल है?किसी प्राणी के अपवित्र रक्त, मांस और चर्बी की गंदगी तो उसमें नहीं है? किसी बेगुनाह जीव की हत्या से निर्मित उस जीव की बददुआएँ की तरंगें भोजन के माध्यम से पेट में जाकर हमारे में हिंसा, क्रूरता, निर्दयता और प्रति हिंसा की ज्वाला तो पैदा नहीं करेगी? अतः भ्रामक विज्ञापनों से प्रभावित हों अखाद्य वस्तु पेट में डालकर अपने पेट को कूड़ा दान न बनायें।

                जो भोजन उपर्युक्त तथ्यों के जितना समीप होता है, उसी अनुपात में उसका लाभ अधिक मिल सकता है। क्योंकि भोजन में न केवल पदार्थ का ही महत्त्व होता है, अपितु उसके बनाने के ढंग और बनाने वालों के भावों, शारीरिक स्थिति का भी प्रभाव पड़ता है।

भोजन बनाने हेतु सावधानियाँ-

                जो महिलाएँ मासिक धर्म से होती है, उनका आभामंडल विकृत हो जाता है। उनके सम्पर्क में आने वाले पदार्थ भी विकृत हो जाते हें। इसी कारण हमारे यहाँ उस अवस्था में महिलाओं को भोजन बनाने और पीने के पानी के संग्रह वाले स्थानों के स्पर्श पर पहले पूर्ण प्रतिबंध था। परन्तु आजकल पाश्चात्त्य संस्कृति के अन्धाःनुकरण के परिणाम स्वरूप अज्ञान और विवेक की कमी के कारण पढ़ी लिखी अधिकांश महिलाएँ उस नियम का प्रायः पालन नहीं करती। जिससे उनके द्वारा बनाया गया भोजन विकृत हो जाता है। जिस पर वर्तमान वैज्ञानिकों द्वारा किये गये निष्कर्षों के आधार पर सम्यक् चिन्तन और आचरण अनिवार्य है, किन्तु उपेक्षा अनुचित हैं।

                दूसरी बात उबालने, मिक्सी में रस निकालने, फ्रीज अथवा स्टोरेज में रखने से खाद्य पदार्थो का प्राकृतिक स्वरूप बदल जाता है और पौष्टिक तत्त्वों में कमी आ जाती है। भोजन बनाते समय भी आजकल स्टील, एलुमिनियम और प्लास्टिक के बर्तनों का प्रयोग अधिक होता है। जिससे भोजन में हानिकारक, रासायनिक पदार्थों के मिश्रित होने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसा भोजन शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता घटाता है।

                एलुमीनियम थोड़ी सी गर्मी पाकर गलने लगता हैं और खाद्य पदार्थो के साथ पेट में जब पहुँच जाता है तो, अपाच्य विकार पैदा करता है, जिससे गुर्दे में पथरी और आंतों में खराबी होने की संभावनाएँ बढ़ सकती हैं। अतः यथा संभव एलुमीनियम के बर्तनों का उपभोग खाना बनाने में नहीं करना चाहिए। परन्तु आजकल प्रायः घरों में कूकर, ओवन आदि एलुमीनियम के ही भोजन बनाने में उपयोग में लिए जाते हैं, जो उचित नहीं है।

            इसी कारण हमारे पूर्वज भोजन बनाने में मिट्टी के बर्तनों तथा अपनी क्षमतानुसार चाँदी के बर्तनों का उपयोग खाना खाने में करते थे। इस संबंध में विस्तृत जानकारी धातु चिकित्सा (Metal Therapy) करने वाले अनुभवी विशेषज्ञों से परामर्श कर प्राप्त की जा सकती हैं।

भोजन बनाने वालों के भावों का महत्व-

                भोजन बनाने वालों के भावों की तरंगें भी हमारे भोजन को प्रभावित करती है। माता और पत्नी जिस प्रेम से अपने पुत्र एवं पति को खिलाने हेतु भोजन बनाती है, उसमें बाजार में उपलब्ध पौष्टिक पदार्थों से अधिक ऊर्जा और तृप्ति मिलती है। भोजन जिन भावों से बनाया जायेगा, खाने वाले का मन उसी के अनुरूप बन जायेगा। इसीलिये हमारे यहाँ लोकोक्ति प्रसिद्ध है- ‘‘जैसा अन्न वैसा मन, जैसा मन वैसा चिन्तन। जैसा चिन्तन वैसा विचार। जैसा विचार वैसा स्वभाव। जैसा स्वभाव वैसी वृत्तियाँ और जैसी वृत्तियाँ वैसे संस्कार।’’

                खाया हुआ भोजन तीन भागों में विभक्त हो जाता है। स्थूल भाग मल बनता है, मध्यम अंश से शरीर के अवयवों का निर्माण होता है। सूक्ष्म अंश से मन की पुष्टि होती है। जिस प्रकार दही के मन्थन से उसका सूक्ष्म अंश ऊपर आकर मक्खन बन जाता है, जिसको और तपाया जाये तो घी बन जाता है। ठीक उसी प्रकार अन्न के भावांश से मन बनता है। इसी कारण होटल के खाने से पेट तो भर सकता है, परन्तु मन नहीं। पेट तो भोजन  से भर सकता है, परन्तु मन तो भोजन में होने वाले भावों से ही भरता है। जैन आगमों में निर्दोष आहार प्राप्ति के सम्बन्ध में विस्तृत विवेचन मिलता हैं। आध्यात्मिक संतों का आहार कैसा हो? उसे कैसे प्राप्त किया जाए? उसको ग्रहण कैसे किया जाए तथा ग्रहण करते समय कैसा चिन्तन हों?  साधुओं को आहार लेते समय जिन 42 दोषों की चर्चा की गई है तथा आहार ग्रहण करते समय जिन 47 दोषों से सावधान रहने का जो निर्देश दिया गया है, निश्चय ही पठनीय, मननीय, चिन्तनीय एवं आचरणीय है। ऐसा आहार ही साधक को शरीर के पोषण के साथ-साथ मन को संयमित, नियन्त्रित एवं पोषण करने वाला होता है। जिज्ञासु पाठक उनका अध्ययन कर अपने आहार को अधिकाधिक सात्विक बनाएं, ऐसा अपेक्षित है। इसी कारण तामसिक भोजन करने वाला तामसिक वृत्तियों वाला होता है। तामसिक व्यक्ति शरीर के लिए जीता है। उसके लिये बाकी सब बातें गौण होती है। उसके भोजन का उद्देश्य होता है स्वाद और पेट भरना। परिणाम स्वरूप वह अधिक प्रमादी होता है। राजसिक भोजन से मन और बुद्धि चंचल होती है। राजसिक प्रवृत्ति वाले अत्यधिक महत्वाकांक्षी होते हैं। अतः उन्हें उत्तेजना पैदा करने वाला भोजन अच्छा लगता है। सात्त्विक भोजन ही संतुलित होने से सर्वश्रेष्ठ होता है। क्योंकि ऐसा भोजन करने से न तो उत्तेजना आती है, न मादकता, न आलस्य और न कमजोरी। परन्तु स्फूर्ति और ताकत प्राप्त होती हैं।

                बाजार में उपलब्ध भोजन तथा कारखानों में निर्मित पदार्थो में घर में बने भोजन जैसी पवित्रता, स्वच्छता, विवेक और उच्च भावों का अभाव होने से, उस भोजन से मात्र पेट भरा जा सकता है, परन्तु शरीर में आवश्यक अवयवों का पूर्ण निर्माण प्रायः नहीं होता। अपितु अपाच्य पदार्थों के विसर्जन हेतु शरीर को अधिक ऊर्जा खर्च करनी पड़ती हैं। परन्तु आजकल घर में भोजन बनाने को मजबूरी समझा जाता है और बाहर बने बनाये पदार्थो को खाने का प्रचलन काफी बढ़ गया है, जिससे न केवल स्वास्थ्य बिगड़ता है, अपितु पारिवारिक प्रेम, अपनापन और घनिष्ठता समाप्त हो रही है, जो भारतीय संस्कृति की पवित्र परम्पराओं के लिए घातक है।

भोजन भी दवा है-

                भोजन के मुख्यरूप से छः स्वाद होते हैं- 1. मीठा, 2. खट्ठा, 3. नमकीन, 4. तीखा, 5. कड़वा, 6. कषैला।

                अधिकांश व्यक्तियों के भोजन में प्रायः अंतिम दो स्वादों का अभाव होता है। यदि भोजन में इनका समुचित समावेश किया जाये तो मधुर स्वाद का दुष्प्रभाव दूर हो जाता है और पाचन सुधरता है।

                प्राकृतिक चिकित्सकों और आहार विशेषज्ञों के दृष्टिकोण से भोजन ही औषधि है। अतः उनकी मान्यता के अनुसार रोगी का उपचार चिकित्सालय की अपेक्षा भोजनालय में होना चाहिए। बड़े-बड़े अनुभवी हृदय रोगों के चिकित्सक दवाओं के दुष्प्रभावों के कारण मात्र संतुलित भोजन से हजारों हृदय रोगियों का सफल उपचार करने में सफल हुए हैं। स्वस्थ होने पर भोजन पोषण के लिये और रोग होने पर रोग को दूर करने के लिए भोजन औषधि का कार्य करता है।

                शरीर के लिए जो आवश्यक, अपाच्य, अभक्ष्य, अखाद्य पदार्थों का खाना, पेट को कचरा पेटी बनाना है। गलत आहार जितनी सरलता से गले के नीचे उतर जाता है, उतनी सहजता से उसके अपाच्य तत्त्व, पेट से बाहर नहीं निकल पाते। इस प्रकार व्यक्ति अज्ञान और अविवेक के कारण स्वयं गलती करता है और रोग को गले लगाता है। साथ ही अपनी लापरवाही के कारण बढ़ते रोगों की उपेक्षा करता है, जब तक वे अपना विकराल रूप न धारण कर लें। ऐसे मानव क्या स्वयं के प्रति ईमानदार कहें जा सकते हैं?

भोजन कितना, कैसे और कहाँ खाया जाये-

                भोजन उतना ही करें, जिसका पूर्ण पाचन हो सकें। हम प्रायः जितना खाते हैं, उसके दो तिहाही भाग से हम जीवित रहते हैं तथा एक तिहाही भाग से चिकित्सक। पाचन संस्थान शरीर का वह तंत्र है जो आहार को ग्रहण करने, उसका पाचन करने, पाच्य आहार से शरीर के लिए आवश्यक समस्त पोशक तत्त्वों का अवशोषण करने तथा पाचन एवं अवशोषण के उपरान्त जो अनुपयोगी पदार्थ बचते हैं, उन व्यर्थ पदार्थो का मल के रूप में शरीर से बाहर निकालने का कार्य करता है। उपर्युक्त कार्यो में यदि कहीं भी अपूर्णता रहती है अथवा अवरोध होता है तो जो भोजन शक्ति वर्धक होना चाहिये, वह स्वास्थ्य के लिये हानिकारक हो जाता है।

                पाचन क्रिया का प्रारम्भ मुँह से होता है। भोजन को खूब चबाकर धीरे-धीरे खाना चाहिए, ताकि उसमें अधिक से अधिक लार और थूक का मिश्रण हो सकें। ऐसा करने से भोजन का अधिकांश पाचन मुंह में ही हो जाता है। अधिक स्वाद मिलता है, और भोजन से तृप्ति होती है। परन्तु आज तेजी का युग है, प्रत्येक व्यक्ति कम समय और कम श्रम में जीवन की समस्या का सरलतम समाधान चाहता है। परिणाम स्वरूप भोजन के लिये अधिकांश व्यक्तियों को समय ही नहीं होता है। वे मात्र मजबूरी से खाना खाते हैं। शान्त, प्रसन्नचित, एकाग्रता से मौन पूर्वक खाना नहीं खा सकते। भोजन करते समय सारा ध्यान भोजन में होना चाहिए न कि कुछ देखने, सुनने, पढ़ने अथवा बातचीत करने में। बोलते रहने से मुँह में लार कम बनती है। फलतः मुँह सूखने लग सकता है। जिससे भोजन के बीच में पानी पीना पड़ता है। भोजन के बीच में पानी पीने से पेट की जठराग्नि शान्त हो जाती हैं और आमाशय में भोजन को पेन्क्रियाज, लीवर, गाल ब्लेडर आदि से मिलने वाले पाचक रस पतले हो जाते हैं। जिससे आमाशय में भोजन का पूर्ण क्षमता से पाचन नहीं हो सकता।

                दूसरी बात भोजन को चबा-चबा करने से, भोजन में जो शर्करा का अंश होता है, वह प्रचुर मात्रा में थूक में मिलने से मुँह में ही पाचन हो जाता है और पेन्क्रियाज को उस शर्करा को पचाने के लिये ज्यादा इंसुलिन की आवश्यकता नहीं होती। अतः मधुमेह और पाचन संबंधी अन्य रोगियों के लिये धीरे-धीरे पूरा चबाकर भोजन करना सर्वोत्तम औषधि का कार्य करता है।

                तीसरी बात भोजन खड़े-खड़े नहीं करना चाहिए। क्योंकि उससे आमाशय को भोजन पचाने हेतु अधिक श्रम करना पड़ता है। भोजन पालकी आसन में बैठकर करना चाहिए। भोजन करने से पूर्व अपने आराध्य का स्मरण, भोजन को नमस्कार तथा सुपात्र दान की भावना रखनी चाहिए। भोजन को भगवान का प्रसाद समझ कर खाना चाहिए। भोजन समभाव पूर्वक अर्थात बिना किसी प्रतिक्रिया, निंदा अथवा प्रशंसा के करना चाहिए। भोजन का एक कण भी झूठा नहीं डालना चाहिए। भोजन करने के पश्चात् ‘‘आरोग्य बोहि लाभं, समाहिवर-मुत्तमं दिन्तु’’- अर्थात् ग्रहण किया गया भोजन मुझे अरोग्य, निर्मल बुद्धि एवं सम्यक् श्रद्धा का पात्र बनाये- ऐसा चिन्तन करना चाहिए। हमारे आसपास जो उपस्थित हों, उन्हें भोजन का निमन्त्रण देकर भोजन करना चाहिए। क्योंकि भूखे को भोजन खिलाकर भोजन करना हमारी संस्कृति है। पूर्व दिशा में शक्ति के स्रोत सूर्य का उदय होता है। अतः पूर्व दिशा की तरफ मुख करके भोजन करने से भोजन की शक्ति बढ़ जाती है। भोजन करते समय सूर्य स्वर चलाना चाहिए ताकि भोजन का पाचन अच्छा होता है। भोजन में कम से कम पदार्थो का समावेश होना चाहिए। अथवा जिन पदार्थो को आपस में मिलाया जा सकता है, उन्हें मिला देना चाहिए ताकि भोजन करते समय-समय बार-बार स्वाद में परिवर्तन न हों, अथवा एक ही प्रकार के पदार्थ एक साथ खाना चाहिए। फिर दूसरे पदार्थ को खाना चाहिए। हम अच्छी तरह जानते हैं कि जिस वाहन का गियर बार-बार बदला जाता हैं, उस वाहन को ज्यादा ऊर्जा की आवश्यकता होती है। ठीक उसी प्रकार प्रत्येक कौर में स्वाद बदलने से भोजन के पाचन हेतु अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। भोजन स्वच्छ, प्रदूषण रहित स्थान पर करना चाहिए। भोजन करने और पानी पीते समय मेरु दण्ड सीधा नहीं होना चाहिए ताकि भोजन आमाशय में धीरे-धीरे पहुँचे।

भोजन में दृष्टि दोष-

                भोजन खिलाने वाले की सोच नकारात्मक, द्वेशात्मक, घृणात्मक नहीं होना चाहिए। भोजन में स्पर्श दोष की भांति दृष्टि दोष का भी प्रभाव पड़ता है। हमारे पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार भोजन पर भूखे, नीच, दरिद्र, पाखण्डी, रोगी आदि की दृष्टि ठीक नहीं होती। उनकी विश दृष्टि भोजन में संक्रमित होने से भोजन अपाच्य बन जाता है। अच्छी या बुरी दृष्टि में कितनी शक्ति होती है, उसको आजकल सम्मोहन विद्या द्वारा प्रमाणित किया जा चुका है। व्यक्तियों की भांति अनेक पशु पक्षियों की दृष्टि भी भोजन के लिए हानिकारक होती है। अतः सर्प, कुते, कौए, चील, मुर्गे आदि जानवरों की दृष्टि से भोजन को दूर रखना चाहिए। क्रोध अथवा अन्य किसी प्रकार के आवेग के समय भोजन नहीं करना चाहिए। पेय या भोजन न अधिक गर्म और न अधिक ठण्डा होना चाहिए। शरीर के तापक्रम पर भोजन अधिक लाभप्रद होता है।

                उपर्युक्त नियमों का भोजन करते समय जितना अधिकाधिक पालन किया जाता है, उतना भोजन सरस, सुपाच्य और स्वादिष्ट बन जाता ह। और भोजन से जो हम अपेक्षा करते हैं, उसका हमें पूरा-पूरा लाभ मिलता है।

                भोजन के पश्चात् हमारी स्फूर्ति बढ़नी चाहिए। शरीर हल्का लगना चाहिए। भोजन के पश्चात् भारीपन अथवा निद्रा आना दुर्बल पाचन शक्ति के संकेत होते हैं। भोजन के तुरन्त बाद में कठिन परिश्रम कभी नहीं करना चाहिए। क्योंकि उस समय पाचन क्रिया हेतु जो अधिक रक्त संचालन की आवश्यकता आमाशय को होती है, उमसें बाधा उत्पन्न होती है। भोजन के पश्चात् कुछ समय वज्रासन में बैठना, टहलना स्वास्थ्य के लिए और पाचन के लिए लाभप्रद होता है। भोजन के पश्चात् निद्रा नहीं लेनी चाहिए। भोजन के पश्चात् निद्रा आने का कारण या तो आवश्यकता से अधिक भोजन अथवा ठण्डा, बासी, तामसिक भोजन करना होता है। जिसको पचाने के लिए आमाशय को अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। परिणामस्वरूप उस स्थिति में मस्तिष्क को आवश्यकता के अनुरूप ऊर्जा न मिलने से उसकी गतिविधि शिथिल हो जाती है और निद्रा आने लगती है।

भोजन के अनुकूल हमारी दिनचर्या कैसी हो?

प्रकृति के अनुकूल दिनचर्या आवश्यक

                सूर्य प्रतिदिन प्रातःकाल उदय होकर सायंकाल ही क्यों अस्त होता है?निद्रा का समय प्रायः रात्रि में ही क्यों उपयुक्त होता है? प्रातःकाल ही प्रायः अधिकांश व्यक्ति मल-त्याग क्यों करते हैं? भ्रमण एवं श्वसन सम्बन्धी व्यायामों अथवा प्राणायाम प्रातः ही क्यों विशेष लाभप्रद होता है? जैन धर्म में रात्रि भोजन का क्यों निषेध किया गया है? मौसम के अनुकूल खान-पान और रहन-सहन में  परिवर्तन क्यों आवश्यक है? हमारी दिनचर्या एवं रात्रिचर्या के पीछे क्या दृष्टिकोण है? प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में एक जैविक घड़ी होती है, जो शरीर की क्रियाओं को नियन्त्रित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसी कारण ठीक समय पर हमें निद्रा आती है, भूख लगती है, निद्रा खुल जाती है क्या सारी बातों का कोई वैज्ञानिक सोच या आधार है अथवा हमारी सुविधा या अन्धाःनुकरण?कोई बीज कितना ही अच्छा क्यों न हो, अच्छी उपजाऊ जमीन पर बोया जावे, उचित हवा, पानी धूप होने के बावजूद उचित समय पर न बोने से नहीं उगता। ठीक उसी प्रकार भोजन, पानी, हवा, निद्रा आदि का बराबर खयाल रखने के बावजूद उचित समय पर सेवन न करने से वे अपेक्षाकृत लाभदायक नहीं होते। राम का नाम सत्य है, परन्तु शुभ प्रसंगों पर भी राम नाम सत्य है कहना अप्रासंगिक समझा जाता है। अतः हमारी दिनचर्या का चयन इस प्रकार करना चाहिये कि शरीर के अंगों की क्षमताओं का अधिकतम उपयोग हो।

क्या शरीर में सभी अंग चौबीसों घण्टे सक्रिय होते हैं?

                शरीर के सभी अंगों में प्राण ऊर्जा का प्रवाह वैसे तो चौबीसों घंटे होता ही है। परन्तु सभी समय सभी अंगों में एकसा नहीं होता। प्रायः प्रत्येक अंग कुछ निश्चित समय के लिये प्रकृति से अधिकतम प्राण ऊर्जा मिलने से अधिक सक्रिय होते हैं तो, कभी प्रकृति से निम्नतम प्राण ऊर्जा मिलने से अपेक्षाकृत सबसे कम सक्रिय होते हैं। इसी कारण कोई भी रोगी चौबीसों घंटे एक जैसी स्थिति में नहीं रहता। अंगों में प्राण ऊर्जा के प्रवाह का संतुलन ही स्वास्थ्य का सूचक होता है। यदि कोई रोग किसी अंग की असक्रियता से होता है तो, जिस समय उस अंग को प्रकृति से सर्वाधिक प्राण ऊर्जा का प्रवाह होता है, तब रोगी को अपेक्षाकृत आंशिक राहत का अनुभव होता है। उसके विपरीत जब रोग उस अंग की अधिक सक्रियता से होता है तो जब उस अंग में प्राण ऊर्जा का प्रवाह निम्नतम होता है, तब रोगी को अधिक राहत का अनुभव होता है। कभी-कभी हम अनुभव करते हैं कि रोगी को निश्चित समय होते ही रोग के लक्षण प्रकट होने लग जाते हैं। ऐसा क्यों होता है? इसका कारण उस समय संबंधित अंग में प्राण ऊर्जा का प्रवाह अधिकतम या निम्नतम होता है।

                वैज्ञानिक शोधों का यह निष्कर्ष है कि शरीर में सभी अंगों में सभी समय एकसा ब्रह्माण्ड से प्राण ऊर्जा का प्रवाह नहीं होता। लगभग प्रत्येक प्रमुख अंगों में दो-दो घंटें सर्वाधिक तो उसके ठीक विपरीत समय अर्थात् 12 घंटे पश्चात् निम्नतम प्राण ऊर्जा का प्रवाह उस अंग में होता है। इसी कारण एक ही लक्षण वाली बीमारियों के अलग-अलग समय में प्रकट होने के कारण अलग-अलग होते हैं। जैसे किसी व्यक्ति को प्रातःकाल सिर दर्द होता है अथवा चक्कर आता है और किसी अन्य रोगी को दोपहर अथवा रात्रि में सिर दर्द अथवा चक्कर आता हो तो दोनों के कारण अलग-अलग होते हैं। रोग का कारण उससे संबंधित अंग में प्राण ऊर्जा का प्रवाह ज्यादा अथवा कम होता है। इस प्रकार संबंधित रोग ग्रस्त अंग का आसानी से सही निदान किया जा सकता हैं।

शारीरिक क्रियाओं का प्रकृति से तालमेल आवश्यक-

                मनुष्य की दिनचर्या में सभी बाह्य गतिविधियों का प्रारम्भ निद्रा त्याग से एवं समापन निद्रा आने के साथ होता है। स्वस्थ रहने की कामना रखने वालों को शरीर में कौनसा अंग और क्रियायें कब विशेष सक्रिय रहती है, इस बात की जानकारी आवश्यक होती है, और उसके अनुरूप आचरण करना चाहिये। हमें चिन्तन करना होगा कि कोई भी शारीरिक अथवा मानसिक क्रिया और कार्य क्यों करें? कितना करें? कहाँ करें? कैसे करें? इन सबके साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि वह क्रिया कौन से समय करें? जैसे भोजन कब करें? निद्रा कब लें? पानी कब पीयें? व्यायाम कब करें इत्यादि? प्रकृति के अनुरूप दिनचर्या का निर्धारण और संचालन करने से शारीरिक क्षमताओं का अधिकाधिक उपयोग होता है। हम रोगों से सहज ही बच जाते हैं, यदि अज्ञानतावश रोग ग्रस्त हो भी जावें तो पुनः शीघ्र स्वस्थ बन सकते हैं।

                दुःख इस बात का है कि आज अधिकांश व्यक्तियों की दिनचर्या प्रकृति के अनुरूप नहीं है और न वे इसके प्रभाव एवं महत्त्व को समझने का भी प्रयास करते हैं। अज्ञान, अविवेक, पूर्वाग्रहों, कुतर्को, मायावी विज्ञापनों, सरकारी और सामाजिक व्यवस्थाओं के अन्धाःनुकरण के कारण प्रकृति के साथ जनसाधारण का सही सामंजस्य नहीं होता है। परिणाम स्वरूप भोजन के समय नाश्ता और निद्रा के समय जागृत रहने जैसी आदतों को संजोये हुये हैं। हम उनके दुष्प्रभावों से अपरिचित हैं।

                हम यह भूल जाते हैं कि जिसमें प्रकृति के विरुद्ध चलने की ताकत न हो, वह कम से कम उसका सहयोग तो लें। तूफान का सामना करने की क्षमता न हो तो, कम से कम हवा की दिशा में तो चले ताकि कम कठिनाई का अनुभव हो। शरीर में जिस समय जो अंग सक्रिय हो, उस समय उस अंग से संबंधित कार्य एवं क्रियायें करें। दूसरी बात जिस समय किसी अंग में प्रकृति से प्राण ऊर्जा का प्रवाह सर्वाधिक हो, यदि उस समय दूसरे अंगों के कार्य और क्रियायें करेंगे तो संबंधित अंग प्रकृति से प्राप्त अपने हिस्से की विशेष प्राण ऊर्जा (चेतना) से वंचित रह जावेगा। जैसे नगर निगम से पानी के वितरण के समय, जो पानी का संग्रह नहीं करेगा, उसको बाद में पानी की आवश्यकता पड़ने पर पछताना पड़ेगा।

शरीर के प्रमुख अंगों में प्रकृति से सर्वाधिक एवं निम्नतम ऊर्जा के प्रवाह का समय

अंगों का नाम                                              अंग में प्राण ऊर्जा के सर्वाधिक            प्राण ऊर्जा के निम्नतम

                                                                      प्रवाह का समय                                       प्रवाह का समय

  1. फेंफड़ें (LU)                                      प्रातः 3 से 5 बजे तक                          दोपहर 3 बजे से 5 बजे तक
  2. बड़ी आंत (LI)                                 प्रातः 5 से 7 बजे तक                        सांयकाल 5 बजे से 7 बजे तक
  3. आमाशय (ST)                              प्रातः 7 से 9 बजे तक                       सांयकाल 7 बजे से 9 बजे तक
  4. तिल्ली (SP)/पेनक्रियाज          प्रातः 9 से 11 बजे तक                    रात्रि 9 बजे से 11 बजे तक
  5. हृदय (H)                                      प्रातः 11 से 1 बजे तक                     रात्रि 11 से 1 बजे तक
  6. छोटी आंत (SI)                           दोपहर 1 से 3 बजे तक                    रात्रि 1 से 3 बजे तक
  7. मूत्राशय (UB)                           दोपहर 3 से 5 बजे तक                    रात्रि 3 से 5 बजे तक
  8. गुर्दे (K)                                      सांयकाल 5 से 7 बजे तक               प्रातः 5 से 7 बजे तक
  9. पेरीकार्डियन (PC)                 रात्रि 7 से 9 बजे तक                          प्रातः 7 से 9 बजे तक
  10. त्रिअग्री (TW)                         रात्रि 9 से 11 बजे तक                    दिन में 9 से 11 बजे तक
  11. पीत्ताशय (HB)                    रात्रि 11 से 1 बजे तक                     दोपहर 11 से 1 बजे तक
  12. लीवर (LIV)                            रात्रि 1 से 3 बजे तक                      दोपहर 1 से 3 बजे तक

                उपर्युक्त तालिका दिन एवं रात को 12-12 घंटों तथा सूर्योदय 6 बजे तथा सूर्यास्त सांयकाल 6 बजे का आधार मानकर बनाई गयी हैं। परन्तु जहाँ दिन रात बराबर नहीं होते वहां पर उसके अनुरूप ऊर्जा प्रवाह के समय में आंशिक परिवर्तन होता है। यद्यपि क्रम तो वही रहता है, फिर भी उस स्थिति में उससे संबंधित आगे अथवा पीछे वाला अंग भी प्रभावित हो सकता है। अतः रोग का सही निदान करने के लिये संबंधित अंगों के लक्षणों के प्रभाव का भी ध्यान रखना आवश्यक होता है। तालिका को देखने  से दूसरा तथ्य यह सामने आता है कि शरीर में एक ही प्रकार की ऊर्जा का प्रवाह संबंधित यिन-यांग अंगों के जोड़े में 4 घंटें तक अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय और ठीक 12 घंटें पश्चात् 4 घंटों तक उनमें प्रकृति से प्राण ऊर्जा का प्रवाह निम्नतम होता है।

निद्रा कब त्यागें?

                प्रातः 3 बजें से प्रातः 5 बजें फेंफड़ों में प्राण ऊर्जा का प्रवाह सर्वाधिक होता है। इसी कारण प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर खुली हवा में घूमने वाले, शुद्ध वायु में प्राणायाम तथा श्वसन का व्यायाम करने वालों के फेंफड़े सशक्त होते हैं। परन्तु दमा के रोगी प्राण ऊर्जा के उस अतिरिक्त प्रवाह को ग्रहण न कर सकने के कारण पिछली रात अधिक परेशान और बेचौन रहते हैं। प्रातःकाल 3 बजे से 5 बजें पीयूष एवं पीनियल ग्रन्थियों से सोमरस निकलता है, जो शरीर की प्रतिकारात्मक शक्ति को बढ़ाता है तथा शरीर के व्यवस्थित विकास हेतु आवश्यक है। इस समय निद्रा लेने पर शारीरिक स्थिरता के कारण सोमरस की धारा गले के नीचे प्रवाहित नहीं हो पाती। इस रस के कारण उस समय मस्तिष्क की स्मरण शक्ति जितनी अच्छी होती है, अन्य समय नहीं होती। ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाले छात्र अधिक बुद्धिमान, स्वस्थ, सजग एवं क्रियाशील होते हैं। उनमें आलस्य अपेक्षाकृत कम होता है।

                प्रातः 5 बजे से 7 बजे तक समय में फेंफड़ों के सहयोगी अंग बड़ी आंत में ऊर्जा का विशेष प्रवाह होने से यह अंग अधिक क्रियाशील होता है। इसी कारण मलत्याग के लिए यह सर्वोत्तम समय होता है। जो व्यक्ति उस समय मलत्याग नहीं करते हैं, उनके कब्जी रहने का एक कारण यह भी हो सकता है। इसलिये जो देर तक सोये रहते हैं, उनका पेट प्रायः खराब रहता है।

भोजन कब करें-

                जब हमें स्वाभाविक अच्छी भूख लगे तब ही भोजन करना चाहिए। भूख का संबंध हमारी आदत पर निर्भर होता है। जैसी हम आदत डालते हैं, उस समय भूख लगने लग जाती है। अतः हमें भोजन की ऐसी आदत डालनी चाहिए कि जब आमाशय अधिक सक्रिय हो, उस समय हमें तेज भूख लगे। दूसरी बात जब तेज भूख लगे तो कुछ खाकर आमाशय की पूर्ण क्षमता का अपव्यय नहीं करना चाहिये। यदि ऐसा किया गया तो मुख्य भोजन के समय आमाशय भी पाचन के प्रति उदासीन हो जाए तो आश्चर्य नहीं।

                प्रातः 7 बजे से 9 बजे तक आमाशय में प्रकृति से प्राण ऊर्जा का सर्वाधिक प्रवाह होने तथा बड़ी आंत की सफाई हो जाने से इस समय पाचन आसानी से हो जाता है। आजकल उस समय अधिकांश व्यक्ति प्रायः भोजन नहीं करते, अपितु नाश्ते का प्रचलन बढ़ गया है। जितना अच्छा भोजन का पाचन प्रातःकाल में होता है उतना अन्य समय में नहीं होता। प्रातः व्यक्ति अपेक्षाकृत शान्त, तनाव मुक्त, षडयंत्रों तथा उलझनों से मुक्त रहता है। अतः भोजन के समय में भी नियमितता रखी जा सकती है। ऐसे समय किया गया भोजन, अधिक सुपाच्य होता है और अमृत का कार्य करता है। विशेष रूप से मधुमेह का रोग जिसे असाध्य माना जाता है, प्रकृति के समयानुकूल भोजन कर ठीक किया जा सकता है।

                नाश्ता अधूरा आहार है और जब हम आंशिक आहार का पाचन आमाशय की सर्वाधिक क्षमता के समय करते हैं तो जब हमारा मुख्य भोजन होता है, तब आमाशय की पाचन क्षमता इतनी अधिक न होने से उसे अधिक श्रम करना पड़ता है। दूसरी बात प्रातःकाल नाश्ता करने से हमें तेज भूख समय पर नहीं लगती। फलतः ऐसे व्यक्ति प्रायः दोपहर में भोजन करते हैं। आत्मार्थी साधु-संतों, ऋर्षि मुनियों को तो एक समय ही आहार करना चाहिये। क्योंकि उनको कठोर शारीरिक श्रम की आवश्यकता नहीं होती। दूसरी बात उन्हें गृहस्थों के घरों से मिला आहार लाकर अपनी उदर पूर्ति करनी पड़ती है। संयमित, नियमित, परिमित, स्वावलम्बी जीवन जीने के कारण ऐसे संतों का पाचन तंत्र प्रायः अच्छा होता है। अतः उनके लिये भोजन का समय दूसरा हो तो भी अधिक हानिकारक नहीं होता। परन्तु जो एक समय से ज्यादा भोजन करते हैं, यदि प्राकृतिक नियमों का पालन नहीं करते हैं, तो रोगों के होने की संभावना रहती है। परन्तु गृहस्थ के लिये कम से कम दो भोजन की आवश्यकता होती है। अतः जब दोपहर देर से भोजन करते हैं तो उनका सायंकालीन भोजन प्रायः सूर्यास्त के बाद होता है। क्योंकि दो भोजन के बीच कम से कम 6 से 8 घंटें का अन्तराल आवश्यक होता है। परन्तु सूर्यास्त के पश्चात् किया गया भोजन स्वास्थ्य के लिये अहितकर होता है। अतः स्वास्थ्य प्रेमियों का प्रातःकाल का भोजन आमाशय और पेन्क्रियाज समूह में जब प्राण ऊर्जा का प्रवाह प्रकृति से अधिक हो अवश्य कर लेना चाहिये।

                आयुर्वेद के सिद्धान्तानुसार प्रातः 10 बजे तक का समय शरीर में कफ प्रकृति का होता है और दिन में 10 से 2 बजे तक का समय पित्त प्रकृति का होता है। अतः हमेशा भोजन कफ प्रकृति में करने के बाद में पित्त प्रकृति का समय होने से पाचन में मदद मिलती है। 10 बजे के पश्चात् शरीर में गर्मी बढ़ने के साथ-साथ बाह्य सूर्य की गर्मी भी बढ़ती है। प्रायः उस समय तक सभी के निद्रा त्याग देने से शरीर में हलन-चलन भी होने लगता है। कफ प्रकृति में भोजन करने से भोजन के तुरन्त पश्चात् इतनी ज्यादा प्यास भी नहीं लगती, जिससे खाने के तुरंत पश्चात् पानी पीने से जो पाचन बिगड़ता है उससे हम सहज बच जाते हैं, भोजन के पश्चात् निद्रा भी नहीं आवेगी। भोजन के पश्चात् आलस्य, आराम खराब पाचन क्रिया के सूचक होते हैं। प्रातः भोजन करने से इस कारण पाचन सर्वोत्तम होता है और हम सैकड़ों पाचन संबंधी रोगों से सहज ही बच जाते हैं।

                इसलिये तो कहा गया है कि- ‘‘सुबह का खाना खुद खाओ, दोपहर का दूसरों को खिलाओं एवं रात्रि का दुश्मन को खिलाओं।’’

                अर्थात् प्रातः पूरा खाना खाओ, दोपहर में आवश्यकता हो तो हल्का पाच्य खाना खाओ और रात में भिखारी को भांति, कभी मिल जाये तो खा लो अन्यथा अपने आपको संयमित रखो। आज अधिकांश रोगों की जड़ पेट से है। अतः अपने समस्त पूर्वाग्रहों को छोड़ भोजन करने के सही समय का महत्त्व समझना चाहिये।

                प्रातः 9 बजे से 11 बजे तक का समय तिल्ली और पेन्क्रियाज का सबसे अधिक सक्रियता का समय होता है, और रात्रि 9 बजे से 11 बजे प्रकृति से इन अंगों को सबसे कम प्राण ऊर्जा मिलती है। ठीक उसी प्रकार सांयकाल 7 बजे से 9 बजे आमाशय में निम्नतम प्राण ऊर्जा का प्रवाह प्रकृति से होता है। अतः प्रातः 9 बजे से 11 बजे शरीर में पेन्क्रियाटिक रस और इन्सुलिन सबसे ज्यादा बनता है। इन रसों का पाचन में विशेष महत्त्व होता है। अतः जो मधुमेह अथवा अन्य किसी प्रकार के पाचन रोगों से ग्रस्त होते हैं, उनके भोजन करने के समय में परिवर्तन आवश्यक होता है। उन्हें जब आमाशय और पेन्क्रियाज को निम्नतम प्राण ऊर्जा मिलने से पाचन क्रिया मंद पड़ जाती है।

रात्रि भोजन क्यों हानिकारक?

                रात्रि भोजन न केवल आमाशय और पेन्क्रियाज में निम्नतम प्राण ऊर्जा का प्रवाह होने के कारण हानिकारक होता है। अपितु निम्न अन्य कारणों से भी हानिकारक होता है।

  1. कीटाणुओं का भोजन पर प्रभाव

                सूर्यास्त के पश्चात् बहुत से सूक्ष्म जीव पैदा हो जाते हैं। सूर्य का प्रकाश इन कीटाणुओं को पैदा होने से रोकता हैं। सूर्य के ताप में अनेक विषैले कीटाणु निष्क्रिय बन जाते हैं, जो सूर्यास्त के बाद पुनः सक्रिय होने लगते हैं। प्रायः हम अनुभव करते हैं कि दिन में 1000 वाट के बल्ब के पास भी सूक्ष्म जीव नहीं आते, जबकि रात में थोड़ी सी रोशनी में भी बल्ब के आसपास मच्छर मंडराने लगते हैं। ये जीव आहार की गन्ध के कारण भोज्य पदार्थो की तरफ आकर्षित होते हैं। वही दूसरी तरफ भोजन में भी अनेक सूक्ष्म बेक्टीरियाँ उत्पन्न हो जाते हैं। इनका रंग भोजन के रंग जैसा ही होने से कृत्रिम प्रकाश में हम इन्हें नहीं देख पाते हैं। कृत्रिम प्रकाश में उजाला तो है, परन्तु वह सूर्य की बराबरी नहीं कर सकता। पूर्ण शाकाहारियों के लिये यह भोजन निश्चित रूप से त्याज्य होता है। रात्रि में तमस (अँधेरे) के कारण वैसे भी भोजन तामसिक बन जाता है। रात्रि भोजन से स्मरण शक्ति कमजोर होने लगती है। व्यक्ति अपनी क्षमताओं को पूर्ण रूपेण विकसित नहीं कर पाता।

  1. रात्रि भोजन और निद्रा

                भोजन और शयन के बीच कम से कम चार घंटे का अन्तर आवश्यक होता है। सोने के समय तक भोजन का पूरा पाचन न हों तो भोजन का वह अंश आमाशय में ही पड़ा रहता है और पाचन संबंधी अनेक रोगों को पैदा करने का कारण बनता है। अंग्रेजी में एक कहावत है- Early to Bed, Early to rise is the Way to be Healthy & Wise अर्थात् जल्दी सोने तथा जल्दी उठने से व्यक्ति स्वस्थ, सम्पन्न, समृद्धिशाली और बुद्धिमान होता है। इस दृष्टि से भी जब व्यक्ति देर से भोजन करेगा तो सोवेगा भी देर से और देर से उठेगा। आज मधुमेह (डायबीटिज) जैसे अनेक रोगों को पैदा करने में रात्रि -भोजन भी एक मुख्य कारण होता है।

  1. सूर्य के ताप का शरीर पर प्रभाव

                मच्छर रात्रि में क्यों प्रायः अधिक काटते हैं? क्या कभी हमने चिन्तन किया? सूर्यास्त होने के पश्चात् शरीर की प्रतिरोधक शक्ति कम हो जाती है। ऊर्जा शक्ति की हानि होने से रात्रि में किया गया भोजन कैसे शक्तिवर्धक हो सकता है?

                सूर्य की रोशनी से शरीर में रोग-प्रतिकारक शक्ति बढ़ती है। इसी कारण प्रायः अधिकांश रोगों का प्रकोप रात में बढ़ने लगता है। प्रत्येक बीमारी भी अपेक्षाकृत रात में ज्यादा कष्टदायक होती है। इसका मुख्य कारण रात में सूर्य की गर्मी का अभाव होता है।

                जिस प्रकार चूल्हे पर रखी हुई वस्तु को जब अग्नि की गर्मी मिलती है तभी वह पकती है, उसी प्रकार हमारे आमाशय में हम जो डालते हैं वह भी पेट की उष्णता (जठाराग्नि) के कारण ही पचता है। इसी कारण जिसकी जठराग्नि प्रदीप्त होती है उसकी पाचन शक्ति अच्छी मानी जाती है। भोजन करते समय उन सब नियमों का पालन करने का प्रयास किया जाना चाहिये, जिनसे जब तक भोजन का पूर्ण पाचन न हो, पाचन शक्ति मन्द न पड़े। भोजन में शक्ति का माप केलोरीज की उष्णता पर आधारित होता है। पेट में नाभि को कमल की उपमा दी गई है। कमल को भारतीय संस्कृति में निष्कामता, निर्मलता और निर्लिप्तता का प्रतीक कहा गया है। कमल और सूर्य का सम्बन्ध लोक विख्यात है। कमल सूर्योदय के साथ खिलते हैं और सूर्यास्त के साथ उनकी सक्रियता में अन्तर आ जाता है। विशेष रूप से नाभि कमल का पाचन में महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। सूर्यास्त के पश्चात् इसके सक्रिय न होने से रात्रि भोजन का पाचन बराबर नहीं होता।

  1. दिन में प्राण वायु की अधिकता

                सूर्य के प्रकाश में वृक्ष एवं पेड़ पौधे आक्सीजन रूपी प्राणवायु छोड़ते हैं। अतः वायु मण्डल में रात्रि की अपेक्षा दिन में आॅक्सीजन की मात्रा अपेक्षाकृत ज्यादा रहती है। जिससे पाचन सरलता से होता है। इसके विपरीत रात में वृक्ष आॅक्सीजन ग्रहण कर स्वास्थ्य के लिये हानिकारक कार्बन डाई आक्साइड छोड़ते हैं। ऐसे वातावरण में श्वास लेने एवं भोजन से आरोग्य बिगड़ता है।

  1. रात्रि भोजन एवं आध्यात्म

                रात्रि भोजन में जो हिंसा होती है उसके कारण जप, तप और तीर्थ यात्रा आदि सब व्यर्थ हो जाते हैं। पद्म पुराण-प्रभाव खंड में रात्रि भोजन को नरक का प्रथम द्वार बताया है। ‘‘चत्वारि नरक द्वारं, प्रथमं रात्रि भोजनम्’’। चरक संहिता के अनुसार रात्रि भोजन दूषित और अम्लीभूत होने से बहुत क्षति पहुँचाता हैं।

                मार्कण्ड पुराण में तो सूर्यास्त के बाद अन्न को मांस और जल को रक्त जैसा हो जाने की बात बहुत स्पष्ट शब्दों में वर्णित हैं। जिसके भाव निम्न हैं- ‘‘अस्तंगते, दिवानाशे, आपो रुधिरमुच्यते। अन्नं मांससमं प्रोक्तं मार्कण्डेय महर्शिणा।’’ गीता के सतरहवें अध्ययन के दसवें श्लोक में कहा गया है- ‘‘यातनामं गतरसं पूर्ति पर्युशितं च यत्। उच्छिष्टमपि यामेध्यं भोजनं तामसप्रियम।’’

                अर्थात् रात में रखा या बनाया हुआ तथा नीरस, दुर्गन्ध युक्त तथा किसी जीव जन्तु के द्वारा स्पर्श किया हुआ और अपवित्र आहार तामस मनुष्यों को ही प्रिय होता है।

                यजुर्वेद आहिक श्लोक 24-19 के अनुसार रात्रि भोजन को राक्षसों का भोजन बतलाया गया है। योगवशिष्ट पूर्वाध श्लोक 108, योग शास्त्र प्र. 2 आदि में भी रात्रि भोजन न करने का स्पष्ट निर्देश दिया गया है। आत्म-पुराण अध्याय 33, श्लोक 43, स्कन्द पुराण- कपोल स्रोत-श्लोक 24 तथा स्कंध 7 अध्याय 11, श्लोक 235 में उनका स्पष्ट उल्लेख है।

                जो बेटा मां बाप की माला फेरे, प्रणाम करें परन्तु उनकी आज्ञा का पालन न करे तो हम ऐसे पुत्र को क्या कहेंगे? उसी प्रकार हम धर्म ग्रन्थों एवं विज्ञान की बातें करें और अप्राकृतिक जीवन पद्धति अपनाकर स्वस्थ रहना चाहे तो असंभव है।

  1. पाश्चात्त्य अंधानुकरण के कारण रात्रि भोजन की विवशता

                रात्रि भोजन के लिये एक तरफ जहां हमारी असजगता एवं उससे पड़ने वाले दुष्प्रभावों की जानकारी का अभाव जिम्मेदार होता है तो दूसरी तरफ हमारी सामाजिक व सरकारी व्यवस्थाएँ भी उतनी ही जिम्मेदार होती हैं। सामूहिक भोजन का समय निर्धारित करते समय तथा कार्यालयों में भोजनावकाश का समय निर्धारित करते समय स्वास्थ्य के अनुकूल समय पर भोजन करने के समय की पूर्ण उपेक्षा की गयी हैं। जैसी व्यवस्था होगी, उसी के अनुरूप जनसाधारण अपने आपको ढालता है। जब बच्चे प्रातःकाल जल्दी पाठशाला जावेंगे और दोपहर बाद घर पहुंचेंगे तो पारिवारिक सदस्य समय पर कैसे भोजन कर सकते हैं? दो भोजन के बीच कम से कम 7-8 घंटों का अन्तर चाहिये। अतः जब सुबह खाना देर से खावेंगे तो रात का खाना स्वतः देरी से खाना पड़ेगा। क्योंकि बिना भूख खाना भी तो उचित नहीं।

                दूसरी तरफ आज नाश्ते का प्रचलन बढ़ गया है, जो भोजन के सही समय हमारी भूख को समाप्त कर देता है। अतः जिन लोगों को समय पर खाने की अनुकूलता है, वे भी समय पर नहीं खाते।

                तीसरी बात व्यक्ति का भोजन के बारे में जितना संयम रहना चाहिये उतना नहीं है। इसलिये जब चाहा, जो चाहा, जहाँ चाहा, जैसा चाहा पेट में डाल देता है, जिससे सौर मण्डल की दृष्टि से पाचन के लिये जो सर्वश्रेष्ठ समय है उस समय उनको भूख ही नहीं लगती।

                चौथी बात रात्रि के प्रकाश के बारे में सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में हमारी मिथ्या धारणाएँ हैं। जिसके फलस्वरूप रात्रि भोजन को आधुनिकता का प्रतीक समझने की भूल हो रही है। सोते हुए को जगाया जा सकता है, परन्तु जो जागृत व्यक्ति निद्रा का बहाना कर सोये उसको जगाना बहुत मुश्किल है।

                दिन में 11.00 से 1.00 बजे के बीच हृदय में विशेष प्राण ऊर्जा का प्रवाह होता है। हृदय हमारी संवेदनाओं, करूणा, दया एवं प्रेम का प्रतीक है। यदि उस समय हम भोजन करते हैं तो हमारी अधिकांश संवेदनाएँ भोजन के स्वाद की तरफ आकर्षित रहती है। अतः हृदय प्रकृति से मिलने वाली अपनी प्राण ऊर्जा को पूर्ण रुपेण ग्रहण नहीं कर सकता। 1.00 बजे से 3.00 बजे तक छोटी आंत जो हृदय का पूरक अंग है और उसका अन्य कार्यो के साथ एक कार्य आमाशय से पचे हुये भोजन के अवशिष्टों को प्राप्त करना। अतः हृदय रोगियों को भी दोपहर 11.00 बजे से 3.00 बजे के बीच भोजन जहाँ तक संभव हो त्यागना चाहिये। उस समय भोजन करने से हृदय छोटी आंत अपनी प्राप्त ऊर्जाओं को पूर्ण क्षमताओं से ग्रहण नहीं कर पाते। निर्दयी, हिंसक और क्रूर व्यक्तियों को जिसमें प्रेम, दया, करुणा नहीं होती, क्यों हृदय हीन कहा जाता है? क्या उनके हृदय नहीं होता? सही समय पर भोजन न करने के कारण आजकल मानव में संवेदना, करुणा, दया अपेक्षाकृत कम होती जा रही है। घृणा, द्वेश, क्रूरता, हिंसा बढ़ रही है। प्रेम सूख रहा है। छल कपट जन साधारण में बढ़ रहा है। व्यक्ति हृदयहीन बनता जा रहा है। दूसरों के लिये क्या कहें, वह स्वयं अपने प्रति भी ईमानदार नहीं रह पा रहा है। अपनी क्षमताओं का दुरुपयोग कर रहा है। इसके लिये क्या अच्छा और क्या बुरा का विवेक समाप्त हो रहा है। वह अपनी प्राथमिकताओं के प्रति अपरिचित हो रहा है। आत्म विश्वास घट रहा है। उसका चिन्तन विज्ञापनों पर आधारित परावलम्बी बनता जा रहा है। बढ़ते हुये असमय हृदय रोगों का एक प्रमुख कारण उसकी गलत दिनचर्या का चयन भी है। यदि हम संयममय जीवन जीयें, नियमित और परिमित एक समय ही भोजन करें तो, भोजन के समय में थोड़ा परिवर्तन हो सकता है, परन्तु जो न संयमित है, न जिनका आचरण नियमित और परिमित हैं। उनको स्वस्थ रहने के लिये तो इन नियमों का पालन करना ही चाहिये।

                परन्तु आज हमारे दिल और दिमाग में ये बातें नहीं बैठ पा रही है। हमारे Lunch और Dinner रोगों के मंच बनते जा रहें है। स्वास्थ्य मंत्रालय को पूर्वाग्रह छोड़ इस सत्य को स्वीकार करना चाहिये तथा भोजन के उपयुक्त सर्वोत्तम समय की जानकारी जन साधारण तक पहुँचानी चाहिये। सारी सामाजिक एवं सरकारी व्यवस्थाओं को उसके अनुरूप बदलने की पहल करनी चाहिये। यदि उचित समय पर भोजन न किया जाए तो हमें हमारी पाचन क्रिया को अच्छा रखने के लिये बाह्य साधनों का उपयोग करना पड़ेगा।

दिनचर्या के निर्धारण में स्वास्थ्य की प्राथमिकता अनिवार्य

                हमें हमारी जीवनचर्या में स्वास्थ्य के प्रतिकूल संस्कारों को बदलना होगा। प्रकृति के नियम व्यक्तिगत अनुकूलताओं के आधार पर नहीं बदलते। हमारी जीवन पद्धति के अनुरूप सूर्योदय और सूर्यास्त का समय निश्चित नहीं होता। बुद्धिमान वहीं है जो प्रकृति के अनुरूप अपने आपको ढाल लेता है।

                स्वास्थ्य मंत्रालय का दायित्व है कि वह रात्रि भोजन के दुष्प्रभावों का अध्ययन करें तथा जो वास्तविकता है उसका प्रचार-प्रसार कर जनता को स्वास्थ्य प्रदान करने के अपने कत्र्तव्यों को निभाये। नीति-निर्माताओं से अपेक्षा है कि रात्रि में सामूहिक भोजों का प्रचलन बंद करें। पाठशालाओं, कार्यालयों, कारखानों में स्वास्थ्य के अनुरूप भोजन के अनुकूल समय पर भोजनावकाश करने के निर्देश दें, पाठ्यक्रमों में बच्चों को रात्रि भोजन के दुष्प्रभावों की जानकारी दी जावे।

                कहने का तात्पर्य यह है कि रात्रि भोजन आरोग्य के साथ वैज्ञानिक, आध्यात्मिक, सामाजिक एवं पारिवारिक दृष्टिकोण से अनुपयोगी है। हानिकारक है। प्रकृति के विरुद्ध है। अतः स्वास्थ्य प्रेमियों के लिये त्याज्य है तथा उन्हें यथा सम्भव दिन में ही भोजन करने का प्रयास करना चाहिये।

पाचन तंत्र को आराम हेतु उपवास

                परिश्रम के पश्चात् शरीर को आराम की आवश्यकता होती है। व्यवसाय जगत में भी सप्ताह में कम से कम एक दिन अवकाश का कानूनी प्रावधान होता है। अवकाश के समय अपूर्ण कार्यो को पूर्ण किया जा सकता है ताकि भविष्य में अधिक उत्साह एवं शक्ति से नियमित कार्यो को किया जा सके।

                प्रायः जनसाधारण को जैसे सुपाच्य, पोष्टिक भोजन की आवश्यकता होती है, उसके स्थान पर अधिकांश व्यक्ति स्वाद और भूख वश अपाच्य, स्वास्थ्य के लिये अनुपयोगी, हानिकारक पदार्थो का सेवन करने में पूर्णतया विवेक नहीं रखते। फलतः पाचन तंत्र को उन पदार्थो को पचाने के लिये सदैव क्षमता से अधिक कार्य करना पड़ता है। उनको आराम नहीं मिलता। परिणामस्वरूप उनकी क्षमता क्षीण होने लगती है। पाचन तंत्र में विकार जमा होने लगता है, जिससे रक्त में भी विकार बढ़ जाते हैं।

                उपवास में आहार का त्याग करने से आमाशय खाली हो जाता है तथा जठराग्नि के रूप में जो प्राण ऊर्जा आहार को पचाने में कार्य करती है उसका उपयोग पाचन तंत्र की सफाई में लग जाता है, जिससे रक्त भी शुद्ध होने लगता है तथा शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने लगती है। जैसी कहावत है- ‘‘पेट साफ तो सब रोग माफ’’ अतः नियमित कम से कम सप्ताह में एक दिन उपवास करने वालों को पाचन संबंधी रोग होने की अपेक्षाकृत कम संभावनाएँ रहती है। आहार शरीर को आवश्यक ऊर्जा और गर्मी प्रदान करता है जबकि उपवास शरीर को आरोग्य और शुद्धि प्रदान करता है। अधिकांश पशु-पक्षी स्व स्फूर्णा से रोग होने पर सर्व प्रथम आहार त्याग करते हैं। रोगावस्था में आहार न करने से रोगी नहीं रोग भूखों मरता है। बीमारी में तो किया गया आहार विशेष रूप से रोगी का नहीं, अपितु रोग का पोषण करता है। अतः नियमित रूप से उपवास करने वाला स्वस्थ तथा पाचन संबंधी रोग के समय आहार का त्याग करने वाला जल्दी स्वस्थ होता है।

उपवास का शाब्दिक अर्थ होता है आत्मा के समीप रहने की साधना। यदि आत्मा के समीप रहने की बात समझ में आ जाये तो, उपवास का लाभ कई गुणा बढ़ जाता है। समीप रहने का मतलब आत्म स्वभाव में रमण करना। उससे शरीर का शोधन और रोगाणुओं के शान्त होने के साथ साथ चेतना की शुद्धि और अनुभूति होने लगती है। जिससे भाव, विचार, चिन्तन, मनन एवं भाषा का भी शोधन होता है। वास्तव में तो यही सच्चा उपवास कहलाता है। खाली भोजन न करना तो लंघन ही कहा जा सकता है, जिससे शरीर का शोधन तो हो सकता है, परन्तु आत्मा का नहीं। अतः उपवास में अधिकाधिक स्वाध्याय, ध्यान, आत्म-चिंतन, मनन, निरीक्षण एवं स्वदोषों की समीक्षा करनी चाहिए, मन और पांचों इन्द्रियों के अनावश्यक दुरुपयोग को रोक उनका सदुपयोग किया जाय तो आत्म-विकार, मानसिक विकार, वाणी के विकार भी शरीर के विकार के साथ दूर हो जाते हैं तथा व्यक्ति पूर्ण रूप से स्वस्थ होने लगता है।

                भोजन से शरीर के विकास तथा संचालन हेतु आवश्यक ऊर्जा मिलती है। अतः यह आवश्यक है कि भोजन करते समय इन उद्देश्यों की पूर्ति का विशेष खयाल रखा जायें। यदि इन बातों का ध्यान न रखा जायें तो जो भोजन स्वास्थ्यवर्धक होना चाहिये, स्वास्थ्य भक्षक बन जाता है।

               

Chordia Health Zone

Powerd By Webmitra