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स्वस्थ रहें या रोगी?: फैसला आपका

स्वावलम्बी अहिंसक चिकित्सा

( प्रभावशाली-मौलिक-निर्दोष-वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धतियाँ )

जल चिकित्सा


जल चिकित्सा

शरीर में जल के कार्य-

                हवा के पश्चात् शरीर में दूसरी सबसे बड़ी आवश्यकता पानी की होती है। पानी के बिना जीवन लम्बे समय तक नहीं चल सकता। शरीर में लगभग दो तिहाई भाग पानी का होता है। शरीर के अलग-अलग भागों में पानी की आवश्यकता अलग-अलग होती है। जब पानी के आवश्यक अनुपात में असंतुलन हो जाता है तो, शारीरिक क्रियाएँ प्रभावित होने लगती है, अतः हमें यह जानना और समझना आवश्यक है कि पानी का उपयोग हम कब और कैसे करें? पानी कितना, कैसा और कब पिये? उसका तापमान कितना हो? स्वच्छ, शुद्ध, हल्का, छना हुआ शरीर के तापक्रम के अनुकूल पानी जन साधारण के लिए उपयोगी होता है। पानी को जितना धीरे-धीरे घूंट-घूंट पीये उतना अधिक लाभप्रद होता है। इसी कारण हमारे यहाँ लोकोक्ति प्रसिद्ध है- ‘‘खाना पीओ और पानी खाओ’’ अर्थात् धीरे-धीरे पानी पीओ।

                हमारे शरीर में जल का प्रमुख कार्य भोजन पचाने वाली विभिन्न प्रक्रियाओं में शामिल होना तथा शरीर की संरचना का निर्माण करना होता है। जल शरीर के भीतर विद्यमान गंदगी को पसीने एवं मलमूत्र के माध्यम से बाहर निकालने, शरीर के तापक्रम को नियंत्रित करने तथा शारीरिक शुद्धि के लिए बहुत उपयोगी तथा लाभकारी होता है। शरीर में जल की कमी से कब्ज, थकान, ग्रीष्म ऋतु में लू आदि की संभावना रहती है। जल के कारण ही हमें, छः प्रकार के रसों-मीठा, खट्टा, नमकीन, कड़वा, तीखा और कषैला आदि का अलग-अलग स्वाद अनुभव होता है।

भोजन के तुरन्त बाद पानी पीना हानिकारक-

                भोजन के तुरन्त पहले पानी पीने से भूख शान्त हो जाती है। बिना भूख भोजन का पाचन बराबर नहीं होता। खाना खाने के पश्चात् आमाशय में लीवर, पित्ताशय, पेन्क्रियाज आदि के श्राव और अम्ल के मिलने से जठराग्नि प्रदीप्त होती है। अतः प्रायः जनसाधारण को पानी पीने की इच्छा होती है। परन्तु पानी पीने से पाचक रस पतले हो जाते हैं, जिसके कारण आमाशय में भोजन का पूर्ण पाचन नहीं हो पाता। फलतः भोजन से जो ऊर्जा मिलनी चाहिए, प्रायः नहीं मिलती। आहार के रूप में ग्रहण किये गये जिन पौष्टिक तत्त्वों से रक्त, वीर्य आदि अवयवों का निर्माण होना चाहिये, नहीं हो पाता।  अपाच्य भोजन आमाशय और आंतों में ही पड़ा रहता है, जिससे मंदाग्नि, कब्जी, गैस आदि विभिन्न पाचन संबंधी रोगों के होने की संभावना रहती है। दूसरी तरफ अपाच्य भोजन को मल द्वारा निष्काशित करने के लिये शरीर को व्यर्थ में अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। अतः भोजन के पश्चात् जितनी ज्यादा देर से पानी पीयेंगे उतना पाचन अच्छा होता है। प्रायः भोजन के दो घंटें पश्चात् जितनी आवश्यकता हो खूब पानी पीना चाहिए। जिससे शरीर में पानी की कमी न हो।

                प्रारम्भ में जब तक अभ्यास न हो, ठोस भोजन के साथ तरल पदार्थों का भी उपयोग अवश्य करना चाहिये। भोजन की बीच में थोड़ा सा पानी पी सकते हैं, परन्तु वह पानी गुनगुना हो न कि बहुत ठण्डा। खाने के पश्चात् भी आवश्यक हो तो जितना ज्यादा गरम पीने योग्य पानी थोड़ा पी सकते है। भोजन पाचन के पश्चात् पानी पीना पथ्य होता है। भोजन पाचन से पूर्व एक साथ ज्यादा पानी पीने से आंव की वृद्धि होती है। अपच, गैस और कब्ज होता है। जैन साधु और बहुत से श्रावक रात्रि में पानी नहीं पीते। परिणाम स्वरूप सायंकालीन भोजन के तुरन्त पश्चात् उनको पर्याप्त पानी पीना पड़ता है, जिससे उनके पाचन संबंधी रोग होने की संभावना अधिक रहती है। अतः स्वास्थ्य प्रेमी साधकों को सायंकालीन भोजन यथा संभव त्यागना ही उपयुक्त होता हैं परन्तु यदि ऐसा संभव न हो और भोजन के पश्चात् पानी पीना आवश्यक हों तो, जितना गर्म पानी पी सकते हैं, उतना गर्म पानी धीरे-धीरे घूंट-घूंट पीना चाहिए, जिससे आमाशय की गर्मी कम न हो। साथ ही धीरे-धीरे पानी पीने से, पानी के साथ थूक मिल जाने से वह पानी पाचक बन जाता है।

उषापान-

                प्रातःकाल निद्रा से उठने के पश्चात् बिना मुंह धोये अथवा दांतुन या कुल्ला किये रात भर ताम्र पात्र में रखा हुआ अपनी क्षमतानुसार सवा से डेढ लीटर पानी पीना चाहिये। इस क्रिया को उषा पान कहते हैं। रात भर में निःश्वास के साथ जीभ पर विजातीय तत्व जमा हो जाते हैं। इसी कारण दिन भर कार्य करने के बावजूद मुंह में जितनी बदबू नहीं आती, उतनी निद्रा में बिना कुछ खाये ही आती है। ये विजातीय तत्व जब पानी के साथ खाली पेट में पुनः जाते हैं तब औषधि का कार्य करते हैं। अतः उषापान का पूर्ण लाभ बिना दांतुन पानी पीने से ही मिलता है। उसके पश्चात् टहलने अथवा पेट का हलन-चलन वाला व्यायाम (संकुचन और फैलाना) करने से पेट में आंतें एक दम साफ हो जाती है। जिससे पाचन संबंधी सभी प्रकार के रोगों में शीघ्र राहत मिलती हैं। पानी पीने का श्रेष्ठतम समय प्रातःकाल भूखे पेट होता है। रात्रि के विश्राम काल में चयापचय क्रिया द्वारा जो विजातीय अनावश्यक तत्त्व  शरीर में रात भर में जमा हो जाते हैं, उनका निष्कासन गुर्दें, आंते, त्वचा अथवा फेंफड़ों द्वारा होता है। अतः उषापान से ये अंग, सक्रिय होकर समस्त विजातीय पदार्थों को बाहर निकालने में सक्रिय हो जाते हैं। जब तक रात भर में एकत्रित विष भली भांति निष्कासित नहीं होता और ऊपर से आहार किया जाये तो विभिन्न प्रकार के रोग होने की संभावना रहती है। उषापान से बवासीर, सूजन, संग्रहणी, ज्वर, उदर रोग, कब्ज, आंत्ररोग, मोटापा, गुर्दे संबंधी रोग, यकृत रोग, नासिका आदि से रक्त स्राव, कमर दर्द, आंख, कान आदि विभिन्न अंगों के रोगों से मुक्ति मिलती है। नेत्र ज्योति में वृद्धि, बुद्धि निर्मल तथा सिर के बाल जल्दी सफेद नहीं होते आदि अनेक लाभ होते हैं।

                जापान के सिकनेश एसोसियेशन द्वारा प्रकाशित एक लेख में इस बात की पुष्टि की गई है। ऐसे प्रयोग का पूर्ण लाभ तब ही मिलता है जब उपरोक्त विधि से पानी पीने के साथ भोजन के लगभग दो घंटें बाद अथवा आमाशय में भोजन के पाचन के पश्चात् ही पानी पीते हैं।

                उषापान स्वस्थ एवं रोगी दोनों के लिए समान उपयोगी होता है। प्रारम्भ में यदि एक साथ इतना पानी न पी सकें तो, प्रारम्भ में दो गिलास जल से शुरु करें। धीरे-धीरे सवा से डेढ़ लीटर तक मात्रा बढ़ावें। इतना ज्यादा पानी एक साथ पीने पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। सिर्फ प्रथम कुछ दिनों में अधिक पेशाब आ सकता है। यह प्रयोग सस्ता, सुन्दर, स्वावलम्बी और काफी प्रभावशाली होता है।

गर्म पानी औषधि है-

                ठण्डे पेय तथा फ्रीज में रखा अथवा बर्फ वाला पानी स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होता है। स्वस्थ अवस्था में हमारे शरीर का तापक्रम 98.4 डिग्री फारहनाइट यानि 37 डिग्री सेन्टीग्रेड के लगभग होता है। जिस प्रकार बिजली के उपकरण एयर कंडीशनर, कूलर आदि चलाने से बिजली खर्च होती है। उसी प्रकार ठण्डे पेय पीने अथवा खाने से शरीर को अपना तापक्रम नियन्त्रित रखने के लिये अपनी संचित ऊर्जा व्यर्थ में खर्च करनी पड़ती है। अतः पानी यथा संभव शरीर के तापक्रम के आसपास तापक्रम जैसा पीना चाहिये। आजकल सामूहिक भोजों में भोजन के पश्चात् आइसक्रीम और ठण्डे पेय पीने का जो प्रचलन है, वह स्वास्थ्य के लिये बहुत हानिकारक होता है।

                गर्मी स्वयं एक प्रकार की ऊर्जा है और शारीरिक गतिविधियों में उसका व्यय होता है। अतः जब कभी हम थकान अथवा कमजोरी का अनुभव करते हैं तब गर्म पीने योग्य पानी पीने से शरीर में स्फूर्ति आती है। जिन व्यक्तियों को लगातार अधिक बोलने का अर्थात् भाषण अथवा प्रवचन देने का कार्य पड़ता है, जब वे थकान अनुभव करें, तब ऐसा पानी पीने से पुनः ऊर्जा का प्रवाह सक्रिय होता है। लम्बी तपस्या करने वालों के लिये ऐसा पानी विशेष उपयोगी होता है, जिससे शक्ति का संचार होता है। गर्म पानी सर्दी  संबंधी रोगों में क्षीण ऊर्जा को पुनः प्राप्त करने का सरलतम उपाय होता हैं।

                साधारणतया रोजाना पानी को उबालकर पीने से उसमें रोगाणुओं और संक्रामक तत्त्वों की संभावना नहीं रहती। अतः ऐसा पानी स्वास्थ्य के लिये अधिक उपयोगी होता है।

                खाली पेट गर्म पानी से अम्लपित्त जनित हृदय की जलन और खट्टी डकारें आना दूर हो जाता है। गर्म जल सुखी खांसी की प्रभावशाली औषधि है। सहनीय एक गिलास गर्म जल में थोड़ा सा सेंधा नमक डालकर पीने से कफ पतला हो जाता है और अंत में खांसी का वेग बहुत कम हो जाता है। खाली पेट दो गिलास गर्म पानी पीने से मूत्र का अवरोध दूर होता है। जिनके मूत्र पीला अथवा लाल हो, मूत्र नली में जलन हो उनको गर्म जलपान करना चाहिए।

पानी कब न पीना चाहिए?

                चिकनाई वाले पदार्थ अथवा मीठा खाने के तुरन्त बाद पानी पीने से खांसी और गले के रोग होने की संभावना रहती है। धूप में चलकर आने पर अथवा व्यायाम के पश्चात् जब तक पसीना पूरा सूख न जायें पानी नहीं पीना चाहिये, अन्यथा तुरन्त जुकाम होने की संभावना रहती है। चिकित्सकों की दृष्टि से शौच के तुरन्त पश्चात् भी पानी नहीं पीना चाहिये। सोने के लगभग दो घंटे पूर्व तक पानी नहीं पीना चाहिये। विशेषकर ऐसे व्यक्तियों को जिन्हें रात्रि में पेशाब के लिए बार-बार उठना पड़ता है। सोते समय पानी पीने से निद्रा में पेशाब की शंका बनी रहने के कारण गहरी निद्रा आने में बाधा पहुँचती है। एक बार निद्रा भंग होने के पश्चात् पुनः निद्रा सरलता से नहीं आती। अतः ऐसे व्यक्तियों को अधिक समय तक सोये रहना पड़ता है। परिणाम स्वरूप प्रातः जल्दी नहीं उठ पाते।

स्वास्थ्य हेतु क्षारीय पानी गुणकारी

                पानी की दूसरी महत्त्वपूर्ण आवश्यकता उसके अम्ल-सार के अनुपात की होती है। जिसको pH के आधार पर मापा जा सकता है। पानी का pH जब 7 होता है तो इसमें अम्ल एवं क्षार तत्त्व बराबर मात्रा में होते हैं। pH यदि 7 से कम होता है तो पानी अम्ल की अधिकता वाला और 7 से अधिक pH वाला पानी क्षार गुणों वाला होता है।

              स्नायु एवं मज्जा के पोषण हेतु शरीर में अम्ल तत्त्व की बहुत कम मात्रा की आवश्यकता होती है। रक्त में आवश्यकता से अधिक अम्ल होने से रक्त विषाक्त बन अनेक रोगों का कारण बन जाता है। शरीर में अधिकांश विजातीय तत्त्वों के जमाव एवं रोगों में अम्ल तत्त्व की आवश्यकता से अधिक उपलब्धता भी प्रमुख कारण होती है। हमारे शरीर में गुर्दो का मुख्य कार्य अम्ल की अधिकता को बाहर निकालना एवं शरीर में अम्ल एवं क्षार का संतुलन बनाए रखना होता है।

              शरीर में क्षार तत्त्व की कमी के कारण शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता क्षीण होने लगती है एवं रक्त में सफेद कोशिकाएँ कम होने लगती है। हड्डियाँ कमजोर होने लगती है। अम्लपित्त (Acidity), गैस, जोड़ों में दर्द एवं कब्जियत जैसे रोगों की संभावना बढ़ने लगती है। जिससे शरीर को सुचारू रूप से संचालित करने वाला सारा तंत्र अनियन्त्रित होने लगता है तथा शरीर रोगों का घर बन जाता है। ऐसी स्थिति में प्रकृति शरीर के अन्य तन्तुओं से क्षार तत्त्व खींचकर अपना पोषण करने लगती है। परिणाम स्वरूप शरीर के वे अवयव जिसमें से क्षार तत्त्व शोषित कर लिए जाते हैं, निःसत्व, निर्बल एवं रोगी हो जाते हैं।

              डाॅ. शेरी रोजर्स (Dr. Sheery Rogers), डाॅ. इंगफ्रेइड हाॅबर्ड (Dr. Ingfreid Hoberd) टोकियो जापान की पानी संस्था के निदेशक डाॅ. हिडेमित्सु हयासी (Dr. Hidemitu Hayashi- Director of the Water Institute Tokyo-Japan), डाॅ. डेविड कारपेन्टर (Dr. David Carpenter), डाॅ. मुशीक जोन (Dr. Murshik John), डाॅ. विलियम केली (Dr. William Kelly), डाॅ. नीताबेन गोस्वामी, डाॅ. जयेशभाई पटेल, जमशेदपुर के वैज्ञानिक डाॅ. जीवराजजी जैन आदि पीने योग्य पानी पर शोधकत्र्ताओं के अनुसार क्षारीय पानी नियमित पीने से समय के पूर्व वृद्धावस्था के लक्षण प्रकट नहीं होते। हड्डियों का घनत्व बढ़ता है तथा अम्लपित्त, गैस, कब्जी,  जोड़ों का दर्द जैसे रोगों की संभावनाएँ अपेक्षाकृत कम रहती है। हमारे आहार में 20 प्रतिशत अम्लीय एवं 80 प्रतिशत क्षारीय पदार्थ होने चाहिए। परन्तु आजकल अधिकांश व्यक्तियों के भोजन में अम्ल तत्त्व बहुत ज्यादा और क्षार तत्त्वों की बहुत कमी होती है। वर्तमान में चटपटा, फास्टफूड, आम्लिक जैसा आहार अधिकांश लोगों द्वारा किया जाता है, उससे ऐसे रोगों की संभावनाएँ बहुत अधिक हो गई है। शरीर में अम्ल की अतिरिक्त मात्रा को दूर करने के लिए नियमित क्षारीय पानी पीना सबसे सहज, सरल, सस्ता, दुष्प्रभावों से रहित, अहिंसक, स्वावलम्बी प्रभावशाली विकल्प है।

पानी की कम उपलब्धता में प्यास पर नियन्त्रण कैसे करें?

           जैन साधक एवं श्रावक प्रायः अचित्त (उबले हुए अथवा धोवन) पानी का ही उपयोग करते है। गर्मी के दिनों में ग्रामानुग्राम विचरण करते समय कभी-कभी ऐसा पानी आवश्यकतानुसार उपलब्ध नहीं होता। दूसरी बात यह है कि वे रात में पानी भी नहीं पीते और सायंकालीन भोजन के तुरन्त पश्चात् पानी पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। ऐसी परिस्थितियों में एक घूंट पानी को मुँह में भर कर जितना अधिक देर उसे मुँह में घुमा सके घुमाकर पीना चाहिए जिससे पानी में लार मिलने से पानी स्वास्थ्यवर्धक गुलकोज बन जाता है। जल गंडूस से कण्ठ की नमी बढ़ जाती है और चन्द घण्टों तक प्यास नहीं लगती।

मिनरल पानी के सेवन का अन्धानुकरण कितना उचित?

             आजकल अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमताओं से अपरिचित व्यक्ति, बाह्य संक्रमणों से अपनी सुरक्षा हेतु शुद्ध पानी के नाम से वितरीत प्लास्टिक बोतलों में बंद मिनरल पानी का उपयोग करना आवश्यक समझते हैं। भारत में लगभग दो-तीन प्रतिशत जनता ऐसे पानी का सेवन करती है। यद्यपि ऐसे व्यक्तियों की भी रोग प्रतिरोधक क्षमता इतनी कमजोर नहीं होती परन्तु मिनरल पानी के भ्रामक विज्ञापनों से प्रभावित होने के कारण वे अपने स्वास्थ्य से कोई खतरा मोल लेना नहीं चाहते। ऐसा पानी पीने वाले भी दांतुन के पश्चात् कुल्ला करने के लिए तो प्रायः नल के पानी का ही उपयोग करते हैं, परन्तु इससे उनको किसी प्रकार का प्रायः संक्रमण नहीं होता, जबकि घूंट भर दूषित पानी में ही इतने विषाणु होते हैं कि वे उन्हें अपनी चपेट में ले सकते हैं।  बोतलों में पानी उपयोग में लेने से पूर्व बहुत दिनों तक संग्रहित रहता है। ऐसा पानी प्लास्टिक के हानिकारक रसायनिक तत्त्वों से प्रभावित न हो, असंभव ही लगता है। इसी कारण सेन-फ्रांसिस्कों में बोतल बंद पानी की बिक्री रोक दी गई है।

गाय के गोबर की राख मिश्रित क्षारीय पानी कैसे तैयार करें?

                उपयोग में आने योग्य पानी को आवश्यकतानुसार छानकर उसमें गाय के गोबर को जलाने से बनी राख इतनी मात्रा में ही मिलाए ताकि पानी में घुलने के पश्चात् राख पानी के बर्तन में नीचे जमने लगे। इस पानी को निथार कर उपयोग हेतु अन्य बर्तन में संग्रहित कर लें। यह पानी राख के गुणों वाला स्वास्थ्य के लिए उपयोगी, क्षारीय गुणों वाला शक्तिवर्धक रोगनाशक बन जाता है। ऐसा पानी सहजता से कहीं भी तैयार किया जा सकता है। ऐसे पानी में चंद घण्टों तक पुनः जीवोत्पत्ति भी नहीं होती। अनादिकाल से जैन व्रतधारी साधकों में ऐसे धोवन पानी के नाम से विख्यात पानी पीने का प्रचलन है।

             ऐसा क्षारीय जल आवश्यकतानुसार गरीब भी अपने घरों में तैयार कर सकते हैं। अतः राख मिश्रित पानी पीने से सहज ही पानी से होने वाले रोगों से राहत मिल सकती है। आवश्यकता है दृढ़ मनोबल एवं भ्रामक विज्ञापनों से भ्रमित हो अन्धानुकरण न कर तथ्यानुसार पानी के उपयोग करने की।

पानी का उपयोग कैसे करे?

                पानी को छानकर ही प्रयोग करना चाहिए। अगर पानी गंदा हो तो, पीने से पहिले उसको किसी भी विधि द्वारा फिल्टर करना चाहिए। कठोर पानी पीने योग्य नहीं होता। उबला हुआ पानी स्वास्थ्य के लिये लाभप्रद होता है।

                पानी को घूंट-घूंट, धीरे-धीरे चन्द्र स्वर में पीना चाहिये और शरीर के तापक्रम पर हो जाने के पश्चात् पानी को निगलना चाहिए।

                प्रत्येक भोजन के डेढ़ से दो घंटें पहले पर्याप्त मात्रा में जलपान करना उत्तम रहता है। ऐसा करने से पेट के अन्दर अपचित आहार जो सड़ता रहता है, पानी में पूर्णतया घुल जाता हैं। पाचन संस्थान एवं पाचक रस ग्रन्थियाँ सबल एवं स्वस्थ बनती है। इसी प्रकार भोजन के दो घंटें पश्चात् मात्रा में जितनी आवश्यकता हो पानी पीना चाहिये, जिससे शरीर में जल की कमी न हों। पर्याप्त मात्रा में जल पीने से पित्ताशय व गुर्दे की पथरी तथा जोड़ों की सूजन व दर्द ठीक होते हैं। रक्त में मिश्रित विकार धुलकर बाहर निकल जाते हैं।

  1. जल से शरीर के अन्दर की गर्मी एवं गंदगी दूर होती है।
  2. खड़े-खड़े पानी पीने से गैस, वात, विकार, घुटने तथा अन्य जोड़ों का दर्द, दृष्टि दोष, श्रवण विकार होते हैं।
  3. थकावट होने अथवा प्यास लगने पर पानी धीरे-धीरे घूंट-घूंट पीना लाभप्रद होता है।
  4. भय, क्रोध, मूच्र्छा, शोक व चोट लग जाने के समय अन्तःश्रावी ग्रन्थियों द्वारा छोड़े गये हानिकारक श्रावों के प्रभाव को कम करने के लिये पानी पीना लाभप्रद होता है।
  5. लू तथा गर्मी लग जाने पर ठंडा पानी व सर्दी लग जाने पर गर्म पानी पीना चाहिये, उससे शरीर को राहत मिलती है। पानी पीकर गर्मी में बाहर निकलने पर लू लगने की संभावना नहीं रहती।
  6. उच्च अम्लता में भी अधिक पानी पीना चाहिए, क्योंकि यह पेट तथा पाचन नली के अन्दर की कोमल सतह को जलन से बचाता है।
  7. दिन में दो घंटें के अन्तर पर पानी अवश्य पीना चाहिए, क्योंकि इससे अन्तःश्रावी ग्रन्थियों का स्राव पर्याप्त मात्रा में निकलता रहता है।
  8. उपवास के समय पाचन अंगों को भोजन पचाने का कार्य नहीं करना पड़ता। अतः वे शरीर में जमे विजातीय तत्त्वों को आसानी से निकालना प्रारम्भ कर देते हैं। अधिक पानी पीने से उन तत्वों के निष्कासन में मदद मिलती है।
  9. पेट में भारीपन, खट्टी डकारें आना, पेट में जलन तथा अपच आदि का कारण पाचन तंत्र में खराबी होता है। अतः ऐसे समय गर्म पानी पीने से पाचन सुधरता है और उपरोक्त रोगों में राहत मिलती है।
  10. डायरिया, हैजा व उल्टी, दस्त के समय उबाल कर ठंडा किया हुआ पानी पीना चाहिये, क्योंकि यह पानी कीटाणु रहित हो जाता है तथा दस्त के कारण शरीर में होने वाली पानी की कमी को रोकता है।
  11. गले और नाक में गर्म जल की वाष्प के बफारे लेने से जुकाम और गले संबंधी रोगों में आराम मिलता है।
  12. पीने वाली अधिकांश दवाईयां में पानी का उपयोग किया जाता है।
  13. अधिकांश ठोस दवाईयां भी चाहें वे एलोपेथिक की टेबलेट हों अथवा आयुर्वेद या अन्य चिकित्सा पद्धति से संबंधित मुंह में लेने वाली दवाईयों को पानी के माध्यम से सरलता पूर्वक निगला जा सकता है।
  14. त्रिफला के पानी से आंखें धोने पर रोशनी सुधरती है। रात भर दाणा मैथी में भिगोया पानी पीने से पाचन संबंधी रोग ठीक होते हैं। प्राकृतिक चिकित्सा में शारीरिक शुद्धि के लिये पानी का अलग-अलग ढंग से उपयोग किया जाता है।
  15. विशेष परिस्थितियों के अतिरिक्त स्नान ताजा पानी से ही करना चाहिये। ताजा पानी रक्त संचार को बढ़ाता है। जिससे शरीर में स्फूर्ति और शक्ति बढ़ती है। जबकि गर्म पानी से स्नान करने पर आलस्य एवं शिथिलता बढ़ती है।
जल चिकित्सा के अनुभूत प्रयोग-

                पानी विभिन्न प्रकार की ऊर्जाओं को सरलता से अपने अन्दर समाहित कर लेता है। अतः आजकल विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों में पानी में आवश्यक ऊर्जा संचित कर रोगी को देने से उपचार को प्रभावशाली बनाया जा सकता है।

  1. सूर्य किरण और रंग चिकित्सा के अन्तर्गत शरीर में जिस रंग की आवश्यकता होती है, उस रंग की कांच की बोतल या बर्तन में पानी को निश्चित विधि तथा धूप में रखने से पानी में उस रंग के गुण आ जाते हैं। ऐसा पानी पीने से रोगों में राहत मिलती है तथा यदि स्वस्थ व्यक्ति पीये तो रोग होने की संभावना नहीं रहती।
  2. पानी को आवश्यकतानुसार चुम्बक पर रखने से उसमें चुम्बकीय ऊर्जा संचित होने लगती है। उस पानी का उपयोग चुम्बकीय चिकित्सक विभिन्न रोगों के उपचार में करते हैं।
  3. सूर्य किरण एवं चुम्बक की भांति पिरामिड के अन्दर अथवा पिरामिड के अन्दर अथवा पिरामिड समूह के ऊपर पानी रखने से उसमें स्वास्थ्यवर्धक गुण उत्पन्न हो जाते हैं, जिसका सेवन करने से रोगों में राहत मिलती है और स्वस्थ व्यक्ति रोग मुक्त हो जाता है।
  4. पानी को रेकी, स्फटिकों, रत्नों, मंत्रों, स्वर तथा विभिन्न रंगों के बिजली के प्रकाश की तरंगों से भी उर्जित किया जा सकता है। जिसके सेवन से असाध्य एवं संक्रामक रोगों का उपचार किया जा सकता है।
  5. पानी को जैसे बर्तन अथवा धातु के सम्पर्क में रखा जाता है, उसमें उस धातु के गुण उत्पन्न होने लगते हैं। प्रत्येक धातु का स्वास्थ्य की दृष्टि से अपना अलग-अलग प्रभाव होता है।
  6. सोने से ऊर्जित जल पीने से श्वशन प्रणाली के रोग, जैसे-दमा, श्वास फूलना, फेंफड़े संबंधी रोगों,हृदय और मस्तिष्क संबंधी रोगों में लाभ होता हैं।
  7. चांदी से पाचन क्रिया के अवयवों जैसे-आमाशय, लीवर, पित्ताशय, आंतों के अनेक रोगों एवं मूत्र प्रणाली के रोगों में आराम मिलता है।
  8. तांबें में ऊर्जित जल के सेवन से जोड़ों के रोग, पोलियों, कुष्ठरोग, रक्त चाप, घुटनों का दर्द, मानसिक तनाव आदि में काफी लाभ होता हैं।

                उपरोक्त तीनों धातुओं से ऊर्जित निश्चित विधि द्वारा तैयार पेय स्त्री-पुरुष, बच्चों-जवान-वृद्धों सबके लिये शक्तिवर्धक होने से लाभदायक होता है।

 

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