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स्वस्थ रहें या रोगी?: फैसला आपका

स्वावलम्बी अहिंसक चिकित्सा

( प्रभावशाली-मौलिक-निर्दोष-वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धतियाँ )

श्वशन चिकित्सा (Breathing Therapy)


श्वशन चिकित्सा

(Breathing Therapy)
वायु और स्वास्थ्य-

                यदि किसी भिखारी को लाखों रुपये देने के बदले दस से पन्द्रह मिनट तक श्वास रोकने के लिये कहते है तो वह उसके लिय तैयार नहीं होता। ऐसी अमूल्य श्वसन क्रिया हमारे स्वयं के द्वारा जन्म से अनवरत संचालित होती है। परन्तु हम उसका महत्त्व नहीं समझते। क्या हम उस अमूल्य श्वास का उपयोग बराबर कर रहे हैं?

श्वसन क्रिया-

                श्वसन इतनी स्वाभाविक और सहज क्रिया है कि हमारी असजगता में भी स्वतः चालू रहती है। चाहे हम निद्रा में हो अथवा जागृत अवस्था में हमारी श्वसन क्रिया अविराम गति से निरन्तर चलती रहती है।

                दो श्वासों के बीच का समय ही जीवन है। प्रत्येक व्यक्ति के श्वासों की संख्या निश्चित होती हैं। जो व्यक्ति आधा श्वास लेता है वह आधा जीवन ही जीता है। जो सही ढंग से गहरा ओर पूरा श्वास लेता है, वही पूर्ण जीवन जीता है। अतः जो व्यक्ति जितनी धीमी और दीर्घ श्वास लेता है, उसकी आयु उतनी ही ज्यादा होती है। जितनी तेज, अधूरी और जल्दी-जल्दी श्वास लेते हैं, उतनी ही आयुष्य कम होती है। अधूरी श्वास लेने वालों के फेंफड़े का बहुत सा भाग निष्क्रिय पड़ा रहता है। जिन मकानों की सफाई नहीं होती, उनमें गन्दगी जमा होने लगती हैं ठीक उसी प्रकार फेंफड़ों के जिन वायु कोषों में श्वास नहीं पहुँचती वहां फेंफड़ों को क्षति पहुँचाने वाले विजातीय तत्त्व जमा होने लगते है और धीरे-धीरे बढ़ते-बढ़ते वे इतने अधिक बढ़ जाते हैं कि, उनको वहाँ से दूर हटाना आसान नहीं होता। परिणाम स्वरूप श्वसन संबंधी रोगों से शरीर पीड़ित हो जाता है। अतः श्वसन क्रिया में फेंफड़ों का जितना ज्यादा प्रसारण और संकुचन होता है, श्वसन उतना ही उपयोगी एवं प्रभावशाली होता है। अधिक जीवन शक्ति और शांति का अनुभव होता है। चिन्तन का ढंग बदल जाता है।

शरीर को पोषण करने वाले तत्त्वों का सम्यक् उपयोग आवश्यक-

                जिस प्रकार अच्छे से अच्छा बीज होते हुये भी अच्छी फसल प्राप्त करने के लिये उसे उचित समय पर बोने के साथ-साथ उपजाऊ मिट्टी, हवा, पानी, धूप की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार स्वस्थ रहने के लिये शरीर को पोषण करने वाले हवा, पानी, भोजन, धूप के उचित सेवन की आवश्यकता होती है। उनकी उपेक्षा करने से हम स्वस्थ रहना चाहते हुये तथा उसके लिये निरन्तर प्रयास करने के बावजूद भी अपने आपको पूर्ण स्वस्थ नहीं रख सकते।

                स्वस्थ रहने की कामना रखने वालों को स्वास्थ्य के साधारण नियमों का ईमानदारी पूर्वक पालन करना चाहिए? उन्हें चिन्तन करना चाहिए कि भोजन, पानी, हवा, धूप, व्यायाम और आराम कब करें? क्यों करे? कहाँ करें? कितना करें? कैसे करें? जीवन के लिए अति आवश्यक इन क्रियाओं को निरन्तर करने के बावजूद इनका पूरा लाभ क्यों नहीं मिलता?

प्राणायाम-

               शरीर को निश्चित अवधि के लिए आत्मा के रहने योग्य बनाये रहने की क्षमता हेतु जिस तत्त्व की प्रधान भूमिका होती है, उसे प्राण कहते है तथा उसकी ऊर्जा को प्राण ऊर्जा कहते हैं। प्राण के आधार पर ही मानव प्राणी कहलाता है। प्राण सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर के बीच का संबंध सूत्र होता है, जो स्थूल शरीर को सूक्ष्म शरीर से जोड़ता है।

                सम्यक् प्रकार से श्वसन क्रिया को संचालित, नियन्त्रित करने की विधि को प्राणायाम कहते हैं। शरीर का भारीपन एवं मन और मस्तिष्क के तनाव से श्वसन क्रिया भी प्रभावित हो जाती है। प्राणायाम से शरीर में प्राण ऊर्जा उत्प्रेरित, संचारित, नियमित और संतुलित होती है। जिस प्रकार बाह्य शरीर की शुद्धि के लिये स्नान की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार शरीर के आन्तरिक अवयवों के लिये प्राणायाम का बहुत महत्त्व होता है।

                प्राणायाम का शाब्दिक अर्थ होता हैं- प्राण का आयाम। आयाम का मतलब वृद्धि करना। प्रत्येक योनि में हमें निश्चित श्वासों के खजाने के अनुसार आयुष्य प्राप्त होती है। यदि उन श्वासों को जल्दी-जल्दी अविवेक पूर्ण ढंग से पूर्ण कर दिया जाये तो हम जल्दी ही मृत्यु को प्राप्त कर लेते हैं और यदि उन्हीं श्वासों का अपव्यय न किया जाये, पूर्ण श्वास-प्रश्वास लिया और निकाला जाये तो उन सीमित श्वासों को लेने में हमें अधिक समय लगेगा अर्थात् हमारी आयु, जीवन अथवा दूसरे शब्दों में कहें तो प्राणों की वृद्धि हो जायेगी। अतः सम्यक् प्रकार से आवश्यकतानुसार श्वासोच्छवास प्रक्रिया को श्वासोयाम न कहकर कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। हमारी श्वास हमारे प्राणों अथवा चेतना को  नियन्त्रित करती है। श्वास हमारे आन्तरिक भावों का नियन्त्रण करता है। भाव बदलते ही श्वास की गति बदल जाती है। आवेग के समय श्वास की गति तेज हो जाती है, जबकि शान्ति का भाव आते ही, श्वास की गति मंद हो जाती है। प्राण अथवा चेतना मन को प्रभावित करते हैं। मन से बुद्धि, बुद्धि से ज्ञान और विवेक तथा ज्ञान और विवेक से आत्मा प्रभावित होती है। प्राणायाम द्वारा मन, बुद्धि, ज्ञान, विवेक विकसित कर आत्मा को परमात्मा बनाया जा सकता है। शरीर का भारीपन, मन और मस्तिष्क के तनाव से श्वशन क्रिया भी प्रभावित हो जाती है। अतः प्राणायाम का उद्देश्य शरीर में प्राण ऊर्जा को उत्पे्ररित, संचालित, नियन्त्रित और संतुलित करना है। जिस प्रकार बाह्य शरीर की शुद्धि के लिए स्नान की जाती है, उसी प्रकार शरीर की आन्तरिक अवयवों की शुद्धि के लिए प्राणायाम का बहुत महत्त्व होता है। जब तक श्वशन क्रिया चालू है, तभी तक हमारा जीवन की प्रक्रिया को जानना, समझना और उसका ढंग से प्रयोग करना प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य हैं।

                अधूरी श्वास लेने वालों के फेंफड़े का अधिकांश भाग निष्क्रिय पड़ा रहता है। जिन मकानों की सफाई नहीं होती, उनमें गन्दगी, मकड़ी, मच्छर आदि का प्रकोप होने लगता है। ठीक इसी प्रकार फेंफड़े के जिस भाग में श्वशन द्वारा शरीर में जाने वाली वायु नहीं पहुँचती, उनमें क्षय, खांसी, जुकाम कफ, दमा आदि रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। अतः हमें ऐसी आदत डालनी चाहिये कि सदैव इस प्रकार श्वास ली जाए कि वायु से पूरे फेंफड़े भर जायें। यह कार्य तेजी अथवा झटके से न हों, अपितु सहज होना चाहिये। धीरे-धीरे इस प्रकार श्वास लें, ताकि सीना भरपूर चौड़ा हो जाये। फिर उसी क्रम से धीरे-धीरे इस प्रकार श्वास लें, ताकि सीना भरपूर चौड़ा हो जाये। फिर उसी क्रम से धीरे-धीरे वायु को बाहर निकाल देना चाहिये। छाती का कमजोर और कम चौड़ा होना स्वास्थ्य के लिये एक अभिशाप होता है, जिसकी तरफ प्रत्येक व्यक्ति की सजगता आवश्यक है।

प्राणायाम से लाभः-

                 1. फेंफड़े मजबूत होते हैं। 2. रक्त के विकार दूर होते हैं। 3. शरीर का संतुलित और सुड़ोल विकास होता है। 4. मन में उत्साह एवं मानसिक बल भी बढ़ता है। 5. ध्यान में चित्त लगता है। 6. प्राणायाम से दीर्घ आयु प्राप्त होती है, स्मरण शक्ति बढ़ती है। 7. स्फूर्ति आती है, आलस्य नहीं आता।

प्राणायाम की चार अवस्थाएँ-

                प्राणायाम में श्वास अन्दर खींचने की प्रक्रिया को पूरक, श्वास बाहर निकालने की क्रिया को रेचक तथा श्वास को अन्दर बाहर रोकने की अवस्था को कुम्भक कहते हैं। प्राणायाम का मूल सिद्धान्त है श्वास धीरे-धीरे परन्तु जितना गहरा लम्बा लिया जा सके लें। श्वास लेते समय पेट पूरा फूल जाना चाहिये। श्वास को जितना ज्यादा देर रोक सकें, अन्दर रोकने का प्रयास करें, ताकि श्वशन द्वारा शरीर में प्रविष्ट प्राण वायु अपना कार्य वापस बाहर निकलने के पूर्व पूर्ण कर सके अर्थात् आॅक्सीजन का पूरा उपयोग हो सके। श्वास को धीरे-धीरे निष्कासित करें। रेचक का समय पूरक से जितना ज्यादा होगा उतना प्राणायाम प्रभावकारी होता है। कुछ योगियों की ऐसी मान्यता है कि जितना ज्यादा श्वास को अंदर रोककर रखा जाता है उतनी अधिक शारीरिक शक्ति प्राप्त होती है, परन्तु यदि दिमाग को शान्त करना हो तो श्वास को बाहर अधिक रोकने का अभ्यास करना चाहिए।

श्वशन सुधारने वाली शारीरिक स्थिति-

                इस मुद्रा को सुखासन, वज्रासन, पदमासन, कुर्सी पर बैठकर या सीधा लेट कर भी कर सकते हैं। अंगूठे हथेली की ओर अन्दर करते हुए हल्के से मुट्ठियों को बंद करके, नाभी के नीचे पेट पर दोनों मुट्ठियों को हल्के से रखें। मुट्ठियों की अंगुलियाँ आमने-सामने सीधी हों, नीचे की ओर न हों। दोनों मुट्ठियों के बीच करीब दो इंच का अंतर हो।

                इस मुद्रा से श्वास नाभी तक चलने लगता है, जिससे पूरे शरीर में प्राण ऊर्जा बढ़ने लगती है। अतः इस मुद्रा से श्वसन संबंधी रोग जैसे दमा, सर्दी, जुकाम में लाभ होता है। नाड़ी संस्थान बराबर कार्य करने लगता है। निद्रा अच्छी तरह से आती है। शरीर ऊर्जावान बनने लगता है। रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने लगती है।

श्वसन हेतु आॅक्सीजन युक्त प्राण वायु लाभप्रद-

                प्रत्येक संसारी जीव में श्वासोश्वास नामक ऊर्जा का मूल स्रोत होता है जिसके कारण वह ब्रह्माण्ड से श्वसन योग्य पुद्गलों को आकर्षित करता है। लोक भाषा में हम उन पुद्गलों के प्रवाह एवं निष्कासन को श्वसन क्रिया अथवा प्राण ऊर्जा का प्रवाह कहते हैं। यह प्राण ऊर्जा पंच तत्त्वों के साथ मिलकर उन्हें उपयोगी बनाती है। वायु मण्डल में हवा के अन्दर जो आॅक्सीजन का तत्त्व है, वही प्राण ऊर्जा की क्षमता बढ़ाने में विशेष प्रभावी होता है। इसी कारण लोक भाषा में आॅक्सीजन को प्राण वायु भी कहते हैं। यह आॅक्सीजन जिस वातावरण में ज्यादा होता है, वही वातावरण शरीर के लिए स्वास्थ्यवर्धक होता है। जब शरीर में आॅक्सीजन की मात्रा बहुत कम हो जाती है तो, प्राण ऊर्जा का उत्पादन आवश्यकतानुसार नहीं हो पाता। परिणामस्वरूप शारीरिक क्रियाएँ अपना कार्य बराबर नहीं कर पाती और अंत में एक स्थिति ऐसी आती है, जब श्वासोच्छवास प्र्याप्ति (ऊर्जा का स्रोत) समाप्त हो जाती है, तो आॅक्सीजन के रूप में आवागमन (आकर्षण) बंद हो जाता है और प्राण ऊर्जा का उत्पादन समाप्त हो जाता है, जिसे मृत्यु कहते हैं।

                जब तक शरीर श्वसन द्वारा अधिकाधिक प्राण वायु प्रकृति से ग्रहण करता रहता है, तब तक शरीर स्वस्थ रहता है। शुद्ध वायु में एक चौथाई भाग लगभग आॅक्सीजन का होता है। यदि उसमें कमी हो जाये तो, उसका प्रभाव पाचन क्रिया पर अनिवार्य रूप से पड़ता है तथा जठराग्नि मंद होने लगती है।

आयुर्वेद में वायु का महत्त्व-

                आयुर्वेद के अनुसार कफ, पित्त और वायु का असंतुलन रोग का कारण होता है। शरीर में कफ और पित्त की स्थिति तो अपंग जैसी ही होती है। सारा हलन-चलन, संचालन, वायु के माध्यम से ही होता है। जब हम पूरा, गहरा, धीरे-धीरे श्वास लेते हैं तो शरीर के ज्यादा से ज्यादा अवयवों को प्राण ऊर्जा पहुँचती है। जिससे जो कोशिकाएँ मृत प्रायः हो जाती है पुनर्जीवित होने लगती है। तीव्र श्वास का सम्बन्ध भय, चिन्ता, तनाव आदि आवेगों से होता है, जबकि मंद गति से गहरी श्वास लेने वाला व्यक्ति अपेक्षाकृत शांत, तनाव मुक्त और प्रसन्न रहता है। गहरी श्वास से डायाफ्राम सहित पेट के समस्त अंगों की अच्छी मसाज हो जाती है। गहरी श्वास लेने से मृत कोशिकाओं को पुनर्जीवित करने हेतु ज्यादा प्राण वायु मिलती है। जल्दी-जल्दी श्वास क्रिया करने से शुद्ध वायु आॅक्सीजन अपना पूरा कार्य किए बिना ही पुनः बाहर निकल जाती हैं, जिससे शरीर में उसका पूर्ण उपयोग आवश्यकतानुसार नहीं हो पाता।

                ठण्डी जलवायु गहरे श्वास के लिए अनुकूल होती है। तंग कपड़े पहनने और कसी हुई बेल्ट अथवा नाड़ा बांधने से पूर्ण श्वास में बाधा पहुँचती है।

                दूसरी बात श्वास कहाँ लें? जीवन के लिए आॅक्सीजन की आवश्यकता होती है। जिसका हम श्वास के रूप में वायु के साथ सेवन करते हैं। अतः श्वसन योग्य वायु जितनी स्वच्छ, शुद्ध, आॅक्सीजन युक्त होती है, उतनी ही हमें ऊर्जा अधिक मिलती है। इसके विपरीत अशुद्ध, प्रदूषित वातावरण में श्वास लेने से हमारे स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। प्रातःकाल प्रदूषण की कमी होने के कारण वायुमण्डल में आॅक्सीजन की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है। फेंफड़े ब्रह्माण्ड से प्राण ऊर्जा ग्रहण करने हेतु अधिकाधिक सजग और सक्रिय होते हैं। अतः प्रातःकाल घूमने, दौड़ने, जोगिंग एवं अन्य फेंफड़ों के व्यायाम से अधिक लाभ मिलता है। जो व्यक्ति प्रायः देर से निद्रा त्यागते हैं, वे फेंफड़ों  की सक्रियता का पूर्ण लाभ नहीं ले पाने के कारण अपेक्षाकृत कम फूर्तीले होते हैं।

                जिस स्थान पर आॅक्सीजन का अभाव होता है, उस वातावरण में रोग होने की संभावना अधिक रहती है। जितना कम प्रदूषण उतनी वायु मंडल में आॅक्सीजन की मात्रा अधिक रहती है। पेड़ पौधे आॅक्सीजन के अच्छे स्रोत होते हैं। अतः प्रातःकाल स्वच्छ वातावरण में भ्रमण करने वालों को सहज रूप से प्राण वायु मिल जाती है।

                योग शास्त्र में प्राणायाम के विविध प्रकारों का वर्णन मिलता है। अतः जिज्ञासु स्वास्थ्य प्रेमियों को अनुभवी योग प्रशिक्षकों के सान्निध्य में प्राणायाम की विविध पद्धतियों का अवश्य अध्ययन एवं अभ्यास करना चाहिए। प्राणायाम के समान स्वास्थ्य सुरक्षा की सहज, सरल, स्वाललम्बी, अन्य विधि प्रायः संभव नहीं होती।

श्वास नाक से ही क्यों लें?

                नासिका शरीर का वह अंग है जिसका कार्य श्वास द्वारा ली जाने वाली वायु का फेंफड़े में पहुँचने के पूर्व पर्याप्त शुद्धि, परिमार्जन व शरीर के तापक्रम के अनुरूप बनाना है। ताकि बाह्य वातावरण की गर्म अथवा सर्द हवा फैंफड़ों को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुँचा सके। सामान्यतः जो वायु हम श्वास के रूप में लेते हैं, वह ठण्डी या गर्म, गंदी और रोगाणुओं से परिपूर्ण हो सकती है? उसमें सूक्ष्म धूलकण हो सकते हैं। नथूनों में उपस्थित रोम (बाल) जो एक प्रकार की छलनी का कार्य करते हैं। श्वास नली उन धूल कणों और रोगाणुओं को अन्दर जाने से रोक देती हैं। ये रोम अन्दर की तरफ प्रवाहित वायु की दिशा के विपरीत कंपन करते हैं। अतः वायु के साथ होने वाले दूषित पदार्थ अन्दर नहीं जा पाते।

                दूसरी बात नाक में स्थित श्लेशमा झिल्लियाँ (म्यूकस मेम्ब्रेन) होती है। जिससे एक प्रकार का वायु में उपस्थित तरल पदार्थ निकलता है, जो वायु में उपस्थित उन असंख्य रोगाणुओं को भी हटा देता है, जो फेंफड़ों के लिए अति घातक सिद्ध हो सकते हैं। साथ ही उन धूल कणों से भी बचाव करती है, जिनका किसी कारणवश नासिका के रोम में रुकावट नहीं हो पाती। ये झिल्लियाँ श्वास की वायु  को आवश्यक शुश्कता-आद्रता भी प्रदान करती है।

                तीसरी बात नाक से ही गंध और सुगन्ध की अनुभूति होती है। गंध की अनुभूति हानिकारक वायु को अन्दर जाने से रोकती है। जैसे ही हमें किसी दुर्गन्ध की अनुभूति होती है। हम तुरन्त श्वास लेना बन्द कर देते हैं और जल्दी से जल्दी वहाँ से दूर होकर ताजी हवा वाले स्थानों में पहुँचने का प्रयास करते हैं।

                इसके विपरीत मुँह में न तो बाल होते है और न श्लेशमा झिल्लियाँ। जो वायु का परिमार्जन अथवा शुद्धि कर सके। दूसरा मुँह का छिद्र नाक की अपेक्षा इतना बड़ा होता है कि उसमें वायु बिना रूकावट फेंफड़े तक पहुँच सकती है। तीसरी नाक के माध्यम से फेंफड़ों तक पहुंचते हुये वायु का तापमान शरीर के अनुकूल हो जाता है। परन्तु मुँह से श्वास लेने पर ऐसा कम संभव होता है। अतः जो व्यक्ति मुँह से श्वास लेते हैं, विशेष कर रात में, सवेरे उनका मुँह सूखा हुआ और बदबूदार होता है, जिससे विभिन्न रोगों के होने की संभावना बनी रहती है।

                यदि नासिका अवरुद्ध हो जायें या श्लेश्मा झिल्लियों में बहुत सारी अशुद्धियाँ एकत्रित हो जायें जिसके कारण मुंह से श्वास लेना पड़े तो नथूनों की सफाई कर लेनी चाहिए। नियमित रूप से ऐसी सफाई करने से नथूनों में रुकावट उत्पन्न होने की संभावना कम हो जाती है।

नेति क्रिया-

                श्वास संबंधी रोगों के उपचार हेतु नेति क्रिया विश्वसनीय सहज पद्धति है। नासिका के छिद्रों की तरल पदार्थों से सफाई करने की विधि को नेति क्रिया कहते हैं। नेति करने से विभिन्न अंगों से आकर नासिका में समाप्त होने वाले स्नायुओं के छोर सक्रिय होते हैं। जिससे मस्तिष्क एवं उन स्नायुओं से जुड़े तंत्रों को लाभ पहुँचता है, जिनकी असक्रियता एलर्जी का प्रमुख कारण होती है। अतः जिन व्यक्तियों को किसी प्रकार की एलर्जी होती है, उनके लिए नेति क्रिया अत्यन्त लाभकारी होती है। नेति क्रिया से आज्ञा चक्र भी सक्रिय होता है।

                नेति के लिए जल शुद्ध और गुनगुना होना चाहिए। उसमें थोड़ा सा नमक मिला देना चाहिये। नमकीन जल साधारण जल की अपेक्षा नाक की नाजुक रक्त नलिकाओं और श्लेशमा झिल्लियों द्वारा सरलतापूर्वक शोषित नहीं किया जा सकता। जबकि साधारण जल सरलता से शोषित किया जा सकता है। यद्यपि साधारण जल से किसी प्रकार की हानि नहीं होती, फिर भी नाक में पीड़ा और बैचेनी का अनुभव हो सकता है। नेति क्रिया के लिये विशेष प्रकार का नेति का बर्तन मिलता है। नेति लोटे को नमकीन पानी से भर कर किसी एक नथूने से पानी डालें और दूसरे छिद्र को मस्तिष्क को घूमाकर ऐसा रखें कि वह पानी दूसरे छिद्र से बाहर निकल जाये। फिर यही क्रिया दूसरे नथूने से भी करें। उसके पश्चात् बारी-बारी से एक-एक नथूने को बन्द कर दूसरे नथूने से जल्दी-जल्दी और दबाव के साथ श्वास निकाले। जिससे नासिका मार्ग की सफाई हो जाती है। पानी की अपेक्षा स्वमूत्र से नेति करना बहुत अधिक प्रभावशाली होता है।

                प्रातःकाल और सोने से पूर्व नेति क्रिया करने से न केवल नथूनों की सफाई होती है, परन्तु उसके साथ साथ निद्रा अच्छी आती है। आंखों की ज्योति सुधरती है। सिर की गर्मी शान्त होती है। स्मरण शक्ति बढ़ने लगती है। बाल झड़ने बन्द हो जाते हैं और लम्बे समय तक बाल काले बने रहते हैं, ऐसे प्रत्यक्ष परोक्ष अनेक लाभ होते हैं। जल नेति करते समय हमेशा मुँह खोलकर ही श्वास-प्रश्वास की क्रिया करनी चाहिए अन्यथा नासिका में जल ऊपर चढ़ सकता है, जिससे चक्कर आने की संभावना रहती है। जल नेति के पश्चात् कपाल भांति व भस्रिका प्राणायाम अवश्य करना चाहिये। जिससे नाक पूर्ण रूप से साफ हो जाये और उसमें एक बूँद भी पानी न रहें। देशी गाय का घी आॅक्सीजन का श्रेष्ठतम स्रोत होता है। अतः नथुनों में घी की चन्द बूंदें डालने से श्वशन क्रिया सुधरती है एवं श्वशन सम्बन्धी रोगों में शीघ्र लाभ मिलता है।

अप्राकृतिक जीवन शैली का श्वसन पर प्रभाव-

                प्राचीन समय में मानव आज की अपेक्षा अधिक प्राकृतिक जीवन जीता था। जिससे उसका श्वसन स्वतः सही होता था। उसकी सहज तनाव मुक्त जीवन शैली भी सही श्वसन के अनुकूल थी। उसे आज के मानव की भांति अनावश्यक श्वसन प्रणाली पर बोझ और अवरोध नहीं थोपने पड़ते थे। आधुनिक मानव भय, असन्तोष, तनाव, प्रतिद्वन्द्वता, घृणा, प्रदूषण, पर्यावरण और भीड़ भरे अप्राकृतिक वातावरण में जीवन यापन करने के कारण उसे प्रर्याप्त मात्रा में स्वच्छ शुद्ध, स्वास्थ्य वर्धक आॅक्सीजन युक्त वातावरण नहीं मिलता है। सारे दिन तो वे व्यवसाय के लिए अप्राकृतिक वातावरण अथवा बंद कमरे में रहते हैं और रात्रि में बंद कमरे में सोते हैं। जिसके कारण श्वसन तंत्र बराबर कार्य नहीं करता। परिणाम स्वरूप अधिकांश व्यक्ति धीमे व गहरे श्वास प्रायः नहीं ले पाते। अतः स्वस्थ रहने वालों को वातावरण के अनुकूल रहकर मुक्त प्रसन्नचित मुस्कराते हुये जीवन जीना चाहिए। जब कभी थकान अथवा आवेश आने की संभावना हो सजग होकर सही ढंग से धीमे-धीमे श्वास लेने लग जायें तो, तुरन्त लाभ होने लग जाता है।

सही निःश्वास का महत्त्व-

                पूर्ण श्वास लेना जितना आवश्यक है उतना ही पूरा श्वास निकालना भी आवश्यक है। श्वास के माध्यम से जो आॅक्सीजन के रूप में प्राण वायु हम ग्रहण करते हैं, वह रक्त शुद्ध करने में कार्बन डाई आॅक्साईड में बदल जाती है। यदि इस दूषित वायु का शरीर से समय पर पूर्ण निष्कासन न हुआ तो शरीर में अनुपयोगी विजातीय तत्त्वों में वृद्धि होने लगती है। जिससे प्राण ऊर्जा के प्रवाह में अवरोध आने के कारण रोग होने की संभावना रहती है। जन साधारण जो प्राणायाम नहीं करते, उन्हें भी प्रातः काल स्वच्छ एवं शुद्ध वातावरण में कम से कम कुछ समय तो गहरी धीमी पूर्ण सजगता पूर्वक अवश्य श्वसन क्रिया करनी चाहिये। साथ ही प्रातः भूखे पेट ही बिना कुछ खाये कुछ बार गहरी श्वास प्रक्रिया करने के बाद मुँह बंद करके पूरे वेग से नाक से जितनी ज्यादा वायु बाहर फेंक सकें, फेंकने का अपनी सामथ्र्य और विवेक अनुसार प्रयास करना चाहिये। ऐसा करने से सारे शरीर में वायु का प्रवाह एक दम तेज हो जाता है और जो विजातीय तत्त्व साधारण रेचक प्रक्रिया से निष्कासित नहीं होते हैं, वे भी बाहर निकल जाते हैं। साथ ही स्वतः पूर्ण वेग से श्वास की पूरक क्रिया होती है, जिससे सारे शरीर में प्राण ऊर्जा का प्रवाह पहुँचने लगता हैं। इस प्रक्रिया द्वारा शरीर में लम्बे समय से जमा अवरोध तथा विजातीय तत्त्व अपना स्थान छोड़ने लगते हैं।

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