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स्वर चिकित्सा


स्वर चिकित्सा

(Swar Therapy)

स्वर क्या है?- नासिका द्वारा श्वास के अन्दर जाने और बाहर निकलते समय जो अव्यक्त ध्वनि होती है, उसी को स्वर कहते हैं। जब श्वसन क्रिया बांयें नथुने से होती है तो उसे चंद्र स्वर का चलना, जब दाहिने नथुने से होती है तो सूर्य स्वर का चलना और जब दोनों नथुनों से बराबर होती है तो सुषुम्ना स्वर का चलना कहा जाता है।

स्वरों का प्रभाव- स्वरों और मुख्य नाड़ियों का आपस में एक दूसरे से सीधा सम्बन्ध होता है। ये व्यक्ति के सकारात्मक और नकारात्मक भावों का प्रतिनिधित्व करती हैं जो, उसके भौतिक अस्तित्व से सम्बन्धित होते हैं। उनके सम्यक् संतुलन से ही शरीर के ऊर्जा चक्र जागृत और सजग रहते हैं। अन्तःस्त्रावी ग्रन्थियाँ क्रियाशील होती हैं।

यदि सही स्वर में सही कार्य किया जाए तो हमें प्रत्येक कार्य में अपेक्षित सफलता सरलता से प्राप्त हो सकती है। जैसे अधिकांश शारीरिक श्रम वाले साहसिक कार्य जिसमें अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है, सूर्य स्वर में ही करना अधिक लाभदायक होता है। सूर्य स्वर में व्यक्ति की शारीरिक कार्य क्षमता बढ़ती है। ठीक उसी प्रकार जब चन्द्र स्वर चलता है, उस समय व्यक्ति में चिन्तन, मनन और विचार करने की क्षमता बढ़ती है।

शरीर में कुछ भी गड़बड़ होते ही गलत स्वर चलने लग जाता है। नियमित रूप से सही स्वर अपने निर्धारित समयानुसार तब तक नहीं चलने लगता, जब तक शरीर पूर्ण रूप से रोग मुक्त नहीं हो जाता।

स्वर का हमारे शरीर पर प्रभावः-

जब चन्द्र स्वर चलता है तो शरीर में ठण्डक बढ़ने लगती है और जब सूर्य स्वर सक्रिय होता है तो शरीर में उष्णता बढ़ने लगती है। जब तक शरीर में ठण्डक और उष्णता का संतुलन रहता है तभी तक हमारा शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य प्रायः अच्छा होता है।

अतः जब शरीर में ठण्डक हो तो सूर्य स्वर को सक्रिय कर तथा जब उष्णता अधिक हो तो चन्द्र स्वर चलाकर ठण्डक और उष्णता को नियन्त्रित किया जा सकता है।

जब रोग का कारण समझ में न आये और रोग की असहनीय स्थिति हो, ऐसे समय रोग का उपद्रव होते ही जो स्वर चल रहा है उसको बन्द कर विपरीत स्वर चलाने से तुरन्त राहत मिलती है।

स्वर का हमारे जीवन पर प्रभाव

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