क्यों पढ़े आरोग्य आपका   ?

स्वस्थ रहें या रोगी?: फैसला आपका

स्वावलम्बी अहिंसक चिकित्सा

( प्रभावशाली-मौलिक-निर्दोष-वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धतियाँ )

प्रभावशाली चुम्बकीय चिकित्सा


चुम्बकीय चिकित्सा की विशेषताः-

                चुम्बकीय चिकित्सा पद्धति सहज, सरल, सस्ती, बिना पीड़ा वाली, पूर्ण अहिंसक, दुष्प्रभावों से रहित पूर्णतया वैज्ञानिक एवं प्राकृतिक नियमों पर आधारित प्रभावशाली स्वावलम्बी चिकित्सा पद्धति है। इस पद्धति में किसी भी प्रकार के टींके, दवाई, मालिश अथवा गहरे दबाव की आवश्यकता नहीं होती। केवल रोग के अनुसार चुम्बकों को पगथली, हथेली और रोगग्रस्त स्थान पर आवश्यकता के अनुरूप स्पर्श करना पड़ता है। पथ्य का उतना परहेज नहीं रखना पड़ता, जितना अन्य चिकित्सा पद्धतियों में आवश्यक होता है। रोग मुक्त होने के पश्चात् चुम्बकों का आलम्बन छोड़ने में कोई कठिनाई नहीं होती है। यह पद्धति प्रायः सभी रोगों के उपचार तथा बचाव में सक्षम है। उपचार के लिए न तो ज्यादा स्थान चाहिये और न बड़े-बड़े खर्चीले अस्पताल अथवा  रासायनिक प्रयोगशालायें। अन्य चिकित्सा पद्धतियों द्वारा उपचार कराने के साथ भी इसको अपनाया जा सकता है। रोगी स्वयं कहीं भी अपना उपचार कर सकता है। स्थायी चुम्बक की मात्र एक जोड़ी से स्वयं एवं अनेक व्यक्तियों के विविध रोगों का वर्षों तक उपचार किया जा सकता है। चुम्बक का प्रभाव कम होने पर उन चुम्बकों को बैटरी की भांति पुनः चार्ज भी किया जा सकता हैं।

                चुम्बक में शरीर के विजातीय तत्त्वों को शरीर से अलग करने की, पीड़ा दूर करने की, अनावश्यक चर्बी कम करने की, मानसिक संतुलन बनाये रखने की एवं अन्तःस्रावी ग्रन्थियों एवं ऊर्जा चक्रों के स्रावों को संतुलित कर रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की अपूर्व क्षमता होती है। रोग की प्रारम्भिक अवस्था में तो इस पद्धति से शीघ्र लाभ पहुँचता ही है, परन्तु अनेक असाध्य रोगों में जहाँ अन्य चिकित्सा पद्धतियों में उपचार संभव नहीं होता, शीघ्र राहत दिलाती है। चुम्बक शरीर से पीड़ा दूर करने में बहुत प्रभावशाली होता है। घावों को शीघ्र भरता है। रक्त संचार ठीक करता है एवं हड्डियों को जोड़ने में मदद करता है। चुम्बकीय ऊर्जा स्वस्थ व्यक्ति को संक्रमण से बचाती हैं, वृद्धावस्था के परिवर्तनों की गति कम करती है। रूस में शल्य चिकित्सा में चुम्बकों का प्रयोग काफी बढ़ गया। जापान, अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन, इटली, आॅस्ट्रेलिया, स्वीडन आदि देशों में विभिन्न असाध्य रोगों के उपचार एवं शल्य चिकित्सा के विकल्प के रूप में चुम्बकीय चिकित्सा पर शोध के बाद जो चमत्कारिक निष्कर्ष सामने आए हैं, वे स्वास्थ्य के संबंध में हमारी पूर्वाग्रसित भ्रान्त धारणाओं को झकझोरने वाले हैं एवं चिकित्सा क्षेत्र में उपचार के नाम पर राहत को ही प्रधानता देकर भविष्य में पड़ने वाले दुष्प्रभावों की उपेक्षा करने वाली चिकित्सा पद्धतियों को अपना पूर्वाग्रह छोड़ चिन्तन करने हेतु प्रेरित करने वाले हैं। चुम्बक से उपचार करने के लिए शरीर विज्ञान की विशेष जानकारी आवश्यक नहीं होती है। चुम्बक के सिद्धान्तों की सामान्य जानकारी रखने वाला कोई भी सजग व्यक्ति आत्मविश्वास के साथ स्वयं अपने आपको स्वस्थ रख सकता है एवं अपने सम्पर्क में आने वाले रोगियों का भी उपचार हेतु आवश्यक परामर्श दे सकता है।    

संतुलन ही स्वास्थ्य का मूलाधार हैः-

                ब्रह्माण्ड में क्रियाशील सभी गतिशील ऊर्जाएँ चुम्बक में भी सूक्ष्म रूप से विद्यमान रहती है, क्योंकि चुम्बक भी शरीर के प्रत्येक कोशिका की भांति ब्रह्माण्ड का ही सूक्ष्म रूप होता है। चुम्बक के क्षेत्र का प्रभाव नियमित और लगातार होता है। बड़े चुम्बक हो या छोटे, उनसे लगातार आने वाली ऊर्जा के मार्ग में बाधा नहीं डाली जा सकती और न हम अपनी इच्छानुसार उसे रोक सकते हैं। जब तक कोई वस्तु चुम्बक के प्रभाव क्षेत्र में रहती है तब तक उस पर चुम्बक का प्रभाव पड़ता रहता है। शरीर की प्रत्येक कोशिकाएँ भी दिन-रात सूक्ष्म चुम्बक की भांति स्वयं के कम-ज्यादा चुम्बकीय क्षेत्र का निर्माण करती है। शरीर के विभिन्न अंग जो एक ही प्रकार की कोशिकाओं का समूह रूप होते हैं, अपनी-अपनी गतिविधियों, कार्य के अनुसार चुम्बकीय क्षेत्र का निर्माण कर शरीर के संचालन में अहं भूमिका निभाते हैं।

                हमारा स्वास्थ्य शरीर के विभिन्न अंगों, उपांगों, तंत्रों के मध्य सही तालमेल एवं संतुलन पर निर्भर रहता है। किसी भी आन्तरिक अथवा बाह्य, प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष कारणों से जब यह तालमेल कम होने लगता है तो शरीर में अनावश्यक विजातीय तत्त्व (Toxins) बढ़ने लगते हैं एवं रोग के लक्षण प्रकट होने लगते हैं। रोगों की रोकथाम के लिये आवश्यक है कि शरीर में जमें अनावश्यक तत्त्वों को बाहर निकाला जावे एवं शरीर के सभी अंग उपांगों को संतुलित रख शारीरिक क्रियाओं को नियंत्रित रखा जाये। जो अधिक सक्रिय हैं, उन्हें शान्त किया जावे तथा जो असक्रिय हैं, उन्हें सक्रिय किया जावे। शारीरिक, मानसिक एवं भावात्मक असंतुलन ही सभी रोगों की जड़ होती है और संतुलन ही स्वास्थ्य का मूलाधार होता है। चुम्बक इन सभी कार्यो में प्रभावशाली होता है।

चुम्बकीय ऊर्जा की विशेषताः-

                चुम्बक की विशेषता होती है कि वह किसी भी अवरोधक को पार कर अपना प्रभाव छोड़ने की क्षमता रखता है। फिर भी लोहे अथवा उससे बनी वस्तुओं के साथ चुम्बक का विशेष आकर्षण होता है। जहाँ-जहाँ लोहे के उपकरण होते हैं, चुम्बकीय ऊर्जा का अधिकांश प्रवाह प्राथमिकता के आधार पर पहले उनमें होता है। उनकी उपस्थिति में उस ऊर्जा का प्रवाह अन्य प्रदार्थो में प्रायः कम होता है। जैसे बेटरी रिचार्ज करने के पश्चात् पुनः उपयोगी बन जाती है, उसी प्रकार शारीरिक चुम्बकीय प्रभाव को चुम्बकों द्वारा संतुलित एवं नियन्त्रित किया जा सकता है। विद्युत की भांति चुम्बक में भी प्रभावशाली ऊर्जा होती है। रोगों के उपचार एवं बचाव में विभिन्न प्रकार की चुम्बकीय ऊर्जा का उपयोग दिन-प्रतिदिन लोकप्रिय होता जा रहा है। चुम्बकीय ऊर्जा में शरीर के उन सभी रोगों को दूर करने की ताकत होती है, जो शारीरिक क्रियाओं से विशेष रूप से सम्बन्धित होते हैं। बिजली के प्रवाह हेतु विद्युत चालक धातु (Conductor) की आवश्यकता होती है। अन्य अवरोधक वस्तुओं (Non-Conductor) में बिजली का प्रवाह नहीं हो सकता। परन्तु अधिकांश ऐसे पदार्थ भी चुम्बकीय तरंगों का पूर्ण प्रतिरोध नहीं कर पाते। जबकि चुम्बकीय ऊर्जा कुछ अंशों में लकड़ी, कांच एवं अन्य बिजली की अवरोधक वस्तुओं में भी प्रवाहित हो सकती है।

पृथ्वी के चुम्बक का हमारे जीवन पर प्रभावः-

                वैज्ञानिकों की ऐसी मान्यता है कि सारे ब्रह्माण्ड का मूलाधार चुम्बकीय शक्ति है एवं उसके प्रभाव से ही सारे ग्रहों, उपग्रहों, नक्षत्रों को एक दूसरे से जुड़े रहने की शक्ति प्राप्त होती है। पृथ्वी हों या सूर्य, चन्द्रमा अथवा अन्य ग्रह एवं नक्षत्र सभी चुम्बकीय ऊर्जा से प्रभावित होते हैं। जिनका हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। सारा ज्योतिष शास्त्र उनके प्रभावों पर ही आधारित होता है। पृथ्वी स्वयं एक शक्तिशाली चुम्बक है एवं प्राणीमात्र के शरीर में भी चुम्बकीय शक्ति होती है। जब तक पृथ्वी के चुम्बक का हमारी चुम्बकीय ऊर्जा पर संतुलन और नियंत्रण रहता है तब तक हम स्वस्थ रहते हैं। जितने-जितने हम प्रकृति के समीप खुले वातावरण में रहते हैं, हमारे स्वास्थ्य में निश्चित रूप से सुधार होता है। परन्तु आजकल हम चारों तरफ चुम्बकीय शक्ति को असंतुलित करने वाले वातावरण के बीच में रहते हैं। हम खाने-पीने में प्रायः स्टील के बर्तनों का उपयोग करते हैं। आवागमन के लिये साईकिल, स्कूटर, कार, बस, रेल, हवाई जहाज या स्टीमर आदि का उपयोग करते हैं। मकानों में आर.सी.सी. का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। अधिकांश मशीनें, उपकरण, फर्नीचर आदि जिन्हें हम प्रतिदिन काम में लेते हैं, लोहे की बनी होती है, जिससे पृथ्वी के चुम्बक का प्रभाव हमारे शरीर में घटता जा रहा है। हम कुएँ का पानी उपयोग में लेने के बजाय, जो पानी कार्य में लेते हैं, वह लोहे की पाइप लाईनों में से होकर आता है। दूसरी तरफ आज पृथ्वी का अन्धाःधुन्ध दोहन किया जा रहा है, जिससे उसकी चुम्बकीय ऊर्जा कम होती जा रही है एवं उसका प्रभाव घटता जा रहा है। शरीर में चुम्बकीय ऊर्जा का असंतुलन एवं कमी अनेक रोगों का मुख्य कारण होती है। यदि इस संतुलन को दूर कर अन्य माध्यम से पुनः चुम्बकीय ऊर्जा उपलब्ध करा दी जावे तो रोग  दूर हो सकते हैं। चुम्बकीय चिकित्सा  का यहीं सिद्धान्त है। इसी कारण खुले वातावरण में विचरण करने वाले, गाँवों में रहने वाले, कुएँ का पानी पीने वाले, पैदल नंगे पाँव चलने वाले, अपेक्षाकृत अधिक स्वस्थ रहते हैं। जितना-जितना पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र से संपर्क बढ़ता है, उतनी-उतनी शरीर की सारी क्रियायें संतुलित एवं नियन्त्रित होती है, उतने-उतने हम रोग मुक्त होते जाते हैं।

विभिन्न क्षेत्रों में चुम्बक के प्रयोगः-

                चुम्बक अपने प्रभाव क्षेत्र की सीमाओं में एक चुम्बकीय ऊर्जा का क्षेत्र बना लेता है। विभिन्न बीजों, वनस्पतियों, फलों, सब्जियों, पशु-पक्षियों, वायरस एवं रोग के कीटाणुओं पर चुम्बकीय प्रभाव के जो निष्कर्ष वैज्ञानिक शोध से सामने आये हैं, वे अत्यधिक उत्साह वर्धक हैं।    

                आज विश्व भर में चुम्बकीय ऊर्जा का उपयोग सभी क्षेत्रों में बढ़ता जा रहा है। चुम्बकीय ऊर्जा से प्रभावित बीज अन्य बीजों की अपेक्षा जल्दी उगते हैं। वे पौधे अधिक विकसित होते हैं। फल जल्दी पकते हैं। सब्जियाँ जल्दी खराब नहीं होती। कृषि में चुम्बकीय ऊर्जा से प्रभावित बीजों के उपयोग एवं चुम्बकत्व से प्रभावित पानी का उपयोग करने से अन्य सभी परिस्थितियाँ एक होने के बावजूद उत्पादन लगभग 20 से 30 प्रतिशत बढ़ जाता है। निर्माण कार्यो में ऐसे पानी एवं पदार्थो के प्रयोग से निर्माण में काम आने वाली सीमेन्ट, चूना जैसे पदार्थो की ताकत लगभग 15 से 20 प्रतिशत बढ़ जाती है। शल्य चिकित्सा के पश्चात् चुम्बकीय ऊर्जा के उपयोग से शरीर की हीलिंग क्षमता बढ़ जाती है। अतः बहुत से देशों में शल्य चिकित्सा के पश्चात् जो रूई, मल्हम, पट्टियें आदि लगाई जाती हैं, वे चुम्बकीय ऊर्जा से ऊर्जित होती है, घावों को चुम्बकीय पानी से साफ किया जाता है। ताकि घाव जल्दी से भर सकें।

                दुधारू पशुओं को चुम्बकीय ऊर्जा से ऊर्जित आहार खिलाने एवं पानी पीलाने से वे अधिक दूध देने लगते हैं। उसमें घी का अंश भी बढ़ने लगता है। वाहनों के रेडियटरों में चुम्बकीय पानी का उपयोग किया जाए तो उनमें नमक अथवा अन्य पदार्थों की परते नहीं जमती। जिससे पेट्रोल/डीजल के खपत में बचत होने लगती है। बोयलर में पानी को चुम्बकीय क्षेत्र के माध्यम से प्रवाहित करने पर पाइप में अनावश्यक पदार्थ जमा नहीं होते। इस प्रकार चुम्बकीय ऊर्जा के प्रयोग से समय, श्रम एवं पैसों की बचत की जा सकती है।

चुम्बकीय उपचार का सिद्धान्त एवं विशेषताएँः-

                शरीर में कुछ अंशों में रक्त और मांसपेशियों में लोहतत्त्व भी होता है। रक्त में यह तत्त्व हेमोग्लोबिन एवं मांसपेशियों में मायोग्लोबिन के रूप में होता है। चुम्बक के प्रभाव से रक्त में हेमोग्लोबिन की गति तेज होती है, जिससे उसमें गर्मी आने लगती है जो रोग ग्रस्त भाग की सूजन दूर करने में सहायक होता है। तेज गति से रक्त का प्रवाह होने से रक्त नलियों में जमा हुआ अनावश्यक पदार्थ दूर होने लगते हैं और रक्त का प्रवाह नियमित होने लगता है, जिससे रक्तचाप एवं हृदय रोग की संभावना कम हो जाती है।

                शरीर के रोगग्रस्त होने पर शरीर की कोशिकाओं का चुम्बकीय क्षेत्र प्रभावित होने लगता है। चुम्बक प्रत्येक कोशिका में उपस्थित चुम्बकीय तत्त्व को आकर्षित अथवा दूर करने लगता है। इस प्रक्रिया से रक्त प्रवाह सुधरता है। जिससे रक्त के माध्यम से रोग ग्रस्त भाग में आॅक्सीजन एवं पौष्टिक तत्त्व शीघ्र पहुँच कर उसे शीघ्र ठीक करते हैं। इस प्रकार चुम्बक बिना किसी दुष्प्रभाव शरीर की प्राकृतिक रोग प्रतिकारात्मक क्षमता को बढ़ाकर सभी रोगों से मुक्ति दिलाता है।

                चुम्बकीय सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक चुम्बक में प्रायः दो ध्रुव होते हैं,एक तो उत्तरी ध्रुव व दूसरे को दक्षिणी ध्रुव कहते हैं।  सारे आलेख में जहाँ उत्तरी अथवा दक्षिणी ध्रुव की चर्चा की गयी है, वहाँ उपचार हेतु कार्य में लिए जाने वाले चुम्बकों के ध्रुवों को ही समझना चाहिए, न कि भौगोलिक उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव। छड़ी वाले चुम्बक को धागे से बांध सीधा लटकाने पर जो किनारा पृथ्वी के भौगोलिक उत्तरी ध्रुव की तरफ आकर्षित होता है, चुम्बकीय चिकित्सा में वह दक्षिणी ध्रुव होता है। ठीक इसके विपरीत जो छोर भौगोलिक दक्षिण की ओर होता है चुम्बकीय चिकित्सा में वह उत्तरी ध्रुव होता है। उपचार करने से पूर्व इस सिद्धान्त के अनुसार चुम्बक का परीक्षण कर लेना चाहिए ताकि उपचार प्रभावशाली एवं शीघ्र हो सके। बाजार में उपलब्ध बहुत से चुम्बक निर्माता भ्रान्तिवश चुम्बको को भौगोलिक ध्रुवों के अनुसार चिन्ह्ति कर देते हैं। इसी कारण वर्तमान में बहुत से चुम्बक उत्पादनकर्ता चुम्बकीय ध्रुवों के गुणों के आधार पर दक्षिणी ध्रुव को Posative Pole और उत्तरी ध्रुव को Negative Pole मान चिन्हीत करते हैं। दो चुम्बकों के विपरीत ध्रुवों में आकर्षण होता है तथा समान ध्रुव एक दूसरे को दूर फैंकते हैं। उत्तरी ध्रुव का प्रभाव रोग को बढ़ने से रोकना, रोगाणुओं एवं पीब को नियन्त्रित करना, कैंसर से ग्रसित कोशिकाओं को निष्प्रभावी बनाना, घावों को शीघ्र भरना, रक्तचाप कम करना, रक्तश्राव रोकना, दर्द कम करना, गर्मी कम करना, अंग सिकोड़ना, सक्रियता को नियन्त्रित एवं संतुलित करना आदि होता है। दक्षिणी ध्रुव शरीर में गर्मी एवं विशेष ऊर्जा प्रदान करता है। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाता है। वैसे चुम्बक के दोनों ध्रुवों में कुछ समानताएँ भी होती है। इसी कारण दोनों ध्रुव लोहे के पदार्थों को समान रूप से आकर्षित करते हैं। दोनों के कुछ गुणों का अन्तर होते हुए भी वे पूर्ण रूप से विपरीत नहीं होते अपितु पति-पत्नी की भांति एक दूसरे के पूरक होते हैं। चुम्बकीय ऊर्जा के माँप की इकाई गौस अथवा ओस्टेड के नाम से जानी जाती है। जितना ज्यादा शक्तिशाली चुम्बक होता है, उतना ही अधिक चुम्बकीय धातुओं के प्रति उसका आकर्षण होता है। छोटे बच्चों के कम शक्तिवाले चुम्बक को लगाना चाहिए। अन्य व्यक्तियों के चेहरे तथा हृदय जैसे कोमल भाग पर प्रारम्भ में प्रायः कम शक्तिवाले चुम्बक लगाने चाहिये। परन्तु असाध्य एवं भयंकर रोगों में ज्यादा शक्ति वाले चुम्बकों का प्रयोग अनुभवी चिकित्सकों के मार्ग निर्देशन में किया जा सकता है। चुम्बकीय उपचार के साथ-साथ गहरा एवं दीर्घ श्वास लेने अथवा उसके पूर्व प्राणायाम करने से उपचार की प्रभावशालीता बढ़ जाती है। धूप, अग्नी, गिरने या पीटने से चुम्बकीय ऊर्जा क्षीण हो जाती है। चुम्बक को इलेक्ट्रोनिक एवं अन्य ऐसे उपकरणों जिसमें लोह तत्त्व हो, जैसे- घड़ी, मोबाइल, टी.वी., कम्प्युटर आदि समानों से दूर रखना चाहिए, अन्यथा उनके खराब होने की संभावना रहती है। चुम्बक में सामान्यतः दो ध्रुव होते है, जो चुम्बकीय अवस्था में सदैव साथ रहते हैं। भले ही किसी भी चुम्बक के कितने ही टुकडें कर दिए जाए। उसी प्रकार कुछ अंशों में मनुष्य का शरीर भी चुम्बक के सिद्धान्तों पर कार्य करता है। जिस प्रकार चुम्बक के दोनों ध्रुव साथ-साथ रहते हैं, उसी प्रकार उठने, बैठने, चलने-फिरने, दौड़ने-भागने, व्यायाम करने, शरीर के सारे अंग-उपांग, स्नायु तंत्र, मांसपेशिया एवं अस्थि तंत्र स्वस्थ अवस्था में उसी स्थान पर साथ-साथ रहते हैं।

चुम्बकीय उपचार की मुख्य तीन विधियाँः-

                हमारे शरीर के चारों तरफ चुम्बकीय प्रभाव क्षेत्र होता है। जिसे आभा मण्डल भी कहते हैं। प्रायः दाहिने हाथ से हम अधिक कार्य करते हैं। अतः दाहिने भाग में दक्षिणी ध्रुव के गुण वाली ऊर्जा तथा बांये भाग में उत्तरी ध्रुव के गुण वाली ऊर्जा का प्रायः अधिक प्रभाव होता है। अतः चुम्बकीय  ऊर्जा के संतुलन होने हेतु बायीं तरफ दक्षिणी ध्रुव एवं दाहिनी तरफ चुम्बक के उत्तरी ध्रुव का स्पर्श करने से बहुत लाभ होता है। शरीर के चुम्बक का, उपचार वाले उपकरण चुम्बक से आकर्षण होने लगता है और शरीर में चुम्बकीय ऊर्जा का संतुलन होने लगता है। परन्तु यह सिद्धान्त सदैव सभी परिस्थितियों में विशेषकर रोगावस्था में पूर्ण रूप से लागू हो, आवश्यक नहीं? स्थानीय रोगों में आवश्यकतानुसार चुम्बकों का स्पर्श भी करना पड़ता है। उपचार करते समय दक्षिण ध्रुव को घड़ी की दिशा में एवं उत्तरी ध्रुव को घड़ी की उल्टी दिशा में घूमाने से उपचार और अधिक प्रभावशाली हो जाता है। चुम्बकीय उपचार की निम्न तीन मुख्य विधियाँ होती है-

  1. रोगग्रस्त अंग पर आवश्यकतानुसार चुम्बक का स्पर्श करने से, चुम्बकीय ऊर्जा उस क्षेत्र में संतुलित की जा सकती है। स्थानीय रोगों, दर्द आदि में इससे काफी राहत मिलती है।
  2. एक्युप्रेशर की रिफ्लेक्सोलाॅजी एवं सुजोक के सिद्धान्तानुसार शरीर की सभी नाड़ियों के अंतिम सिरे दोनों हथेली एवं दोनों पगथली के आसपास होते हैं। इन क्षेत्रों को चुम्बकीय प्रभाव क्षेत्र में रखने से वहाँ पर जमें विजातीय पदार्थ दूर हो जाते हैं तथा रक्त एवं प्राण ऊर्जा का शरीर में प्रवाह संतुलित होने लगता है, जिससे रोग दूर हो जाते हैं। इस विधि के अनुसार दोनों हथेली एवं दोनों पगथली के नीचे चुम्बक का स्पर्श कराया जाता है। शरीर में नाभि के ऊपर के भागों के रोगों के उपचार हेतु दाहिनी हथेली के नीचे चुम्बक का उत्तरी ध्रुव एवं बांयी हथेली के नीचे चुम्बक का दक्षिणी  ध्रुव स्पर्श करना चाहिए। शरीर में नाभि के नीचे के रोगों में उपचार हेतु पैर के दायें तलवें के नीचे चुम्बक का उत्तरी ध्रुव तथा बायें तलवें के नीचे चुम्बक का दक्षिणी  ध्रुव स्पर्श करना चाहिए। चुम्बक अथवा हथेली या पगथली में जहाँ चुम्बक का स्पर्श हो रहा है, उस स्थान को हिलाते रहने से चुम्बक का प्रभाव बढ़ जाता है।
  3. चुम्बकीय प्रभाव क्षेत्र में जल, किसी पदार्थ अथवा द्रव्य, तरल पदार्थो को रखने से उसमें चुम्बकीय गुण शीघ्र प्रकट होने लगते हैं। जैसे- जल, दूध, तेल,शिवाम्बु, पेय, सूर्य तप्त पानी की दवा आदि तरल पदार्थो में चुम्बकीय ऊर्जा का प्रभाव बढ़ाकर उपयोग करने से काफी लाभ पहुँचता है।
चुम्बकीय जल का उपयोगः-

                चुम्बकीय क्षेत्र के प्रभाव से जल के अनेक भौतिक एवं रसायनिक गुणों में परिवर्तन होने लगता है। जैसे तापमान, घनत्व, विद्युत प्रवाह की क्षमता, गाढ़ापन आदि। ऐसा पानी पीने से रक्त संचार सुधरता है, रक्त में हेमोग्लोबिन का उचित स्तर बना रहता है। जिससे रक्त वाहिनियों में अनावश्यक केलशियम और काॅलोस्ट्रोल जमा नहीं होता एवं हृदय की कार्य क्षमता नियमित होने लगती है। अम्ल एवं पीत्त का संतुलन बना रहता है। फलतः पाचन तंत्र बराबर कार्य करने लगता है। चुम्बकीय पानी पीने से माहवारी नियमित होने लगती है। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने लगती है। साथ ही स्नायुओं का तनाव दूर होने लगता है जो वर्तमान में बुद्धिजीवियों, प्रशासनिक अधिकारियों, प्रबन्धकों, परिक्षार्थियों आदि की समस्याओं का समाधान करता है। नियमित ऐसा पानी पीने से उनकी थकान दूर होती है, तनाव कम होता है, उनका मनोबल बढ़ता है, सोच सकारात्मक होती है। आवेग मंद हो जाते हैं, गुर्दे की पत्थरी को निकालने में भी यह जल बहुत लाभकारी होता है। चुम्बक के पानी से घाव साफ करने पर वे जल्दी ठीक होते हैं।

                 शक्तिशाली चुम्बकों के सम्पर्क में थोड़े समय में ही पानी में चुम्बकीय गुण आने लगते हैं। जितनी देर उसको चुम्बकीय प्रभाव में रखा जाता है, चुम्बक हटाने के पश्चात् लगभग उतने लम्बे समय तक उसमें चुम्बकीय प्रभाव रहता है। प्रारम्भ के 10-15 मिनटों में ही 60 से 70 प्रतिशत चुम्बकीय प्रभाव आ जाता है। परन्तु पूर्ण प्रभावित करने के लिये पानी को शक्तिशाली चुम्बकों के प्रभाव में कम से कम 6 से 8 घंटें तक रखना पड़ता है। चुम्बक को हटाने के पश्चात् धीरे-धीरे उस जल में चुम्बकीय प्रभाव क्षीण होता जाता है। चुम्बकीय जल बनाने के लिये पानी को स्वच्छ कांच की गिलास अथवा बोतलों में भर लकड़ी के पट्टे पर शक्तिशाली चुम्बकों के ऊपर रख दिया जाता है। 8-10 घंटें चुम्बकीय क्षेत्र में रहने से उस पानी में चुम्बकीय गुण आ जाते हैं। उत्तरी ध्रुव के सम्पर्क वाला उत्तरी ध्रुव का पानी तथा दक्षिणी ध्रुव के सम्पर्क वाला दक्षिणी ध्रुव के गुणों वाला पानी बन जाता है। दोनों के संपर्क में रखने से जो पानी बनता है उसमें दोनों ध्रुवों के गुण आ जाते हैं। पानी में चुम्बकीय ऊर्जा का संग्रहण पानी की मात्रा एवं चुम्बकीय क्षेत्र की घनत्वता पर निर्भर करता है। तांबे के बर्तन में दक्षिणी ध्रुव (S.ploe)  तथा चांदी के बर्तन में उत्तरी ध्रुव (N.ploe) द्वारा ऊर्जा प्राप्त पानी अधिक प्रभावशाली एवं गुणकारी होता है। चुम्बक में मानव शरीर के सारे हानिकारक द्रवों को निकालने की क्षमता होती है। इस कारण सभी प्रकार की सूजन और अन्तःस्रावी ग्रन्थियों के श्रावों से संबंधित रोगों में चुम्बकीय उपचार अत्यधिक प्रभावशाली होता है। चुम्बकीय पानी पीने से गुर्दे की पत्थरी मूत्र के साथ निकल जाती है।

                चुम्बक के अन्य उपचारों के साथ आवश्यकतानुसार चुम्बकीय पानी पीने से उपचार की प्रभावशालीता बढ़ जाती है। चुम्बकीय जल की भांति यदि दूध को भी चंद मिनट तक चुम्बकीय प्रभाव वाले क्षेत्र में रखा जाये तो, वह शक्तिवर्द्धक बन जाता है। दक्षिणी ध्रुव से प्रभावित दूध विकसित होते हुए बच्चों के लिये लाभप्रद होता है। दोनों ध्रुवों से प्रभावित दूध शक्तिवर्धक होता है। इसी प्रकार किसी भी तेल को 45 से 60 दिन चुम्बकीय क्षेत्र में लगातार रखने से उसकी ताकत बढ़ जाती है। ऐसा तेल बालों में इस्तेमाल करने से बालों संबंधी रोग जैसे गंजापन, समय से पूर्व सफेद होना ठीक होते हैं। दोनों ध्रुवों से प्रभावित तेल बालों की सभी विसंगतियां दूर करता है। चुम्बकीय तेल की मालिश भी साधारण तेल से ज्यादा प्रभावकारी होती है। जितने लम्बे समय तक तेल को चुम्बकीय प्रभाव क्षेत्र में रखा जाता है, उतनी लम्बी अवधि तक उसमें चुम्बकीय गुण रहते हैं। थोड़े-थोड़े समय पश्चात् पुनः थोड़े समय के लिये चुम्बकीय क्षेत्र में ऐसा तेल रखने से उसकी शक्ति पुनः बढ़ायी जा सकती है। जोड़ों के दर्द में ऐसे तेल की मालिश अत्यधिक लाभप्रद होती है। सिर पर लगाने अथवा मानसिक रोगों के लिये चुम्बकीय ऊर्जा की उत्तरी ध्रुव से ऊर्जित नारियल का तेल तथा जोड़ों के दर्द हेतु सूर्यमुखी, सरसों अथवा तिल्ली का दक्षिणी  ध्रुव से ऊर्जित चुम्बकीय तेल अधिक गुणकारी होता है। चुम्बक ऊर्जित स्वमूत्र सेवन से शिवाम्बु चिकित्सा का प्रभाव अत्यधिक प्रभावशाली होने लगता है।

चुम्बकीय चिकित्सा के प्रभावशाली प्रयोगः-

                सामान्यतया चुम्बक चिकित्सा करते समय रोग में वृद्धि नहीं होती, परन्तु प्रारम्भ में यदि पीड़ा कुछ बढ़ जावे तो, उसका कारण यह हो सकता है कि, चुम्बक पीड़ा को दूर करने के लिये, विकारों को शरीर से बाहर निकाल रहा है। पीड़ा पुनः थोड़े समय पश्चात् स्वतः कम हो जाती है और उसको घटाने के लिये किसी अलग उपचार की आवश्यकता नहीं होती। चुम्बकीय उपचार करते समय इस बात का ध्यान रहे कि, रोगी को सिर में भारीपन न लगें, चक्कर आदि न आवें। ऐसी स्थिति में तुरन्त चुम्बक हटाकर धरती पर नंगे पैर घूमना चाहिये अथवा एल्यूमिनियम या जस्ते पर खड़े रहने अथवा स्पर्श करने से शरीर में से चुम्बक चिकित्सा द्वारा किया गया अतिरिक्त चुम्बकीय प्रभाव कम हो जाता है। रक्त के अधिक दबाव वाले रोगियों को चुम्बक चिकित्सा का समय धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिये। दाहिनी हथेली के नीचे और गले के दाहिने भाग में धड़कन वाले स्थान पर उत्तरी ध्रुव स्पर्श करने से उच्च रक्तचाप तुरन्त कम होने लगता है। यदि इस चुम्बक को किसी तेज गति वाले वाइब्रेटर में लगाकर उपचार किया जाये तो चन्द मिनटों में उच्च रक्त चाप साधारण हो जाता है। एक्युप्रेशर के प्रतिवेदन बिन्दुओं पर चुम्बक स्पर्श करने से शरीर में उस स्थान पर जमे विजातीय तत्त्व दूर होने लगते हैं एवं प्राण ऊर्जा का प्रवाह बराबर होने से रोग से मुक्ति मिलती है। सुजोक बियोल मेरिडियन चिकित्सा में इसी सिद्धान्तानुसार उपचार किया जाता है।

                पेन्क्रियाज पर चुम्बक का दक्षिणी ध्रुव लगाने से पेन्क्रियाज सक्रिय हो जाता है, और मधुमेह के रोगियों को दवा और इंजेक्षन के माध्यम से इंसुलिन की आवश्यकता कम की जा सकती है। चुम्बक अत्यधिक प्रभावशाली दर्दनाशक होता है। दर्द वाले भाग पर उत्तरी ध्रुव को स्पर्श करते हुए Anti Clockwise घुमाने से तुरन्त लाभ मिलता है। चुम्बक का स्पर्श करने से शरीर की हीलिंग क्षमता बहुत बढ़ जाती है। शरीर के कमजोर अंग-उपांगों पर दक्षिणी ध्रुव को स्पर्श करने से उन अंगों की कार्य क्षमता बढ़ने लगती है।

                नाभि पर उच्च शक्ति के चुम्बक के दक्षिणी ध्रुव को रोगी के Clockwise (घड़ी की सीधी दिशा में) 5-10 मिनट घूमाने से कब्ज दूर हो जाती है। इसी प्रकार चुम्बक का उत्तरी ध्रुव को Anti Clockwise (घड़ी की उल्टी दिशा में) घूमाने से दस्त में तुरन्त राहत मिलती है। जलन अथवा खुजली वाले स्थान पर चुम्बक का उत्तरी ध्रुव फेरने से शीघ्र आराम मिलता है। हाथ और पैर संबंधी रोगों में हृदय की दिशा में चुम्बक का आवश्यकतानुसार मसाज करने से रक्त में आया अवरोध दूर होने से उपचार अधिक सक्रिय हो जाता है। जैसे साइटिका के रोगियों को उत्तरी ध्रुव का मसाज करना चाहिए, जबकि लकवे (पक्षाघात) के रोगी को दक्षिणी ध्रुव का मसाज करना चाहिये। यदि शरीर के किसी भाग में गांठ हो गई हो तो, वहां स्थायी चुम्बक का उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव को बारी-बारी में स्पर्श द्वारा उपचार करने से गांठ का फैलाव और संकोचन होने लगता है और धीरे-धीरे वह गांठ बिखर जाती है।

                मेरुदण्ड के उपचार हेतु मेरुदण्ड पर नीचे की तरफ चुम्बक का दक्षिणी ध्रुव तथा ऊपर उत्तरी ध्रुव लगाना चाहिए। दक्षिणी ध्रुव पर सीधी कमर बैठने से मूलाधार चक्र सक्रिय होता है। मल द्वार की मांसपेषियाँ सक्रिय होती है और कब्ज दूर होती है।

चन्द असाध्य रोगों में चुम्बकीय उपचार

केन्सर का उपचार-

                सामान्य रूप से स्वस्थ व्यक्ति की सभी कोशिकाएँ एक विशेष अन्तराल पर गति करती है, लेकिन केन्सर की कोशिकाएँ की गति बढ़ जाती है। चुम्बकीय उत्तरी ध्रुव के उपचार से उसे सामान्य स्थिति में लाया जा सकता है। अमेरिका के डाॅ. मैकलीन ने सैंकड़ों कैंसर के रोगियों का उपचार करने के पश्चात् अपना अभिमत देते हुए स्पष्ट कहा- ‘‘शक्तिशाली चुम्बकीय क्षेत्र में कैंसर के सेल विकसित नहीं हो सकते और जो पहले से शरीर में उपस्थित हैं, वे दूर होने लगते है।’’। जितना शक्तिशाली चुम्बक होगा उपचार उतना ही अधिक प्रभावशाली होगा। विदेशों में इस हेतु विशेष प्रकार के शक्तिशाली चुम्बकों का निर्माण हो रहा है।

जोड़ों का उपचार-

                चुम्बक का प्रभाव हड्डी जैसे कठोरतम भाग को पार कर सकता है, अतः हड्डी सम्बन्धी दर्द निवारण में चुम्बकीय चिकित्सा रामबाण के तुल्य सिद्ध होती है। विशेषकर दर्द दूर करने एवं फ्रेक्चर के पश्चात् हड्डियों को पुनः जल्दी जोड़ने में अत्यधिक प्रभावशाली है। घुटनों के शल्य चिकित्सा की आवश्यकता नहीं होती। हड्डियों के जुड़ने के समय में कमी आ जाती है।

रक्तस्राव सम्बन्धी रोग-           

                महिलाओं के मोनोपाज की अवस्था में रक्तस्राव अनियन्त्रित होने लगता है। परिणामस्वरूप उन्हें शल्य चिकित्सा द्वारा गर्भाशय निकालने का परामर्श दिया जाता है। जिससे भविष्य में हारमोन्स असंतुलन के कारण अनेक समस्याएँ उत्पन्न होने की संभावना रहती है। यदि ऐसी स्थिति में महिलाएँ रक्तस्राव प्रारम्भ होते ही अपने दोनों पेडूओं पर शक्तिशाली उत्तरी ध्रुव का उपचार करे तो समस्या से चन्द दिनों में ही समाधान मिल सकता है। इसी प्रकार जिनके महावारी समय से पूर्व होती हो तो दोनों पेडूओं पर उत्तरी ध्रुव लगाकर उपचार करना चाहिए। अगर महावारी देर से होती है तो दोनों पेडूओं पर दक्षिणी  ध्रुव का स्पर्श कर उपचार करना चाहिए।

चुम्बकीय चिकित्सा के अनुभूत प्रयोगः-

                मेरे 1990 में ट्रक से दुर्घटना होने पर चेहरे की दो हड्डियों में फ्रेक्चर हो गया। अहमदाबाद में शल्य चिकित्सा के पश्चात् जबड़े पर 26 टांके आए। तीन दिनों के बाद डाॅक्टर ने अस्पताल से छुट्टी देते हुए 45 दिनों तक आवश्यक दवा लेते रहने के पश्चात् टांके खुलवाने हेतु पुनः वापस आने का परामर्श दिया। मैंने डाॅक्टर से दवा का कारण एवं अन्य जिज्ञासाएँ रखी, जिसका मुझे संतोषप्रद समाधान नहीं मिला। फलतः मैंने परिजनों के विरोध के बावजूद दवा लेना उचित नहीं समझा। अपना उपचार 15 से 20 दिनों में बिना दवा मात्र चुम्बकीय चिकित्सा की सामान्य जानकारी होते हुए भी करने में पूर्ण सफलता प्राप्त की।

                2 अप्रेल 1991 को मेरे  दायें पैर की हीप्सबोन पर स्कूटर दुर्घटना के कारण लगभग दो इंच की दरार पड़ गई तथा मुझे असहनीय वेदना होने लगी। डाॅक्टरों ने कम से कम 21 दिनों तक बिना हलन-चलन आराम करने का परामर्श दिया। परन्तु चुम्बकों के निरन्तर प्रयोग से बिना दवा पीड़ा तुरन्त शान्त होने लगी। मात्र 4-5 दिनों में ही मैंने अपना उपचार स्वयं कर नियमित कार्य करना प्रारम्भ कर दिया। जीवन की इन दोनों घटनाओं के कारण ही मैंने अपने इंजीनियरिंग व्यवसाय से निवृत्ति ले, स्वावलम्बी, प्रभावशाली, अहिंसात्मक चिकित्सा पद्धतियों के प्रति जनसाधारण में सजगता पैदा करने का मानस बनाया। मेरी माताजी के पक्षाघात एवं मेरे हृदयघात के समय भी चुम्बकीय उपचार के चमत्कारिक प्रभाव का मुझे सुखद अनुभव हुआ।

स्वास्थ्य मंत्रालय से अपेक्षाएँः-

                सारांश यही है कि चुम्बक अपने प्रभाव क्षेत्र में चुम्बकीय क्षेत्र बना लेता है, जिसका प्रभाव सभी चेतनाशील प्राणियों पर विशेष रूप से पड़ता है, फिर चाहे मनुष्य हो, पशु हो या पेड़-पौधे आदि। यदि चुम्बक का उपयोग रोगों के रोकथाम एवं उपचार में किया जावे तो सभी जीवों का जीवनकाल बढ़ जाने की बहुत अधिक संभावना रहती है। जिन-जिन देशों में चुम्बकीय चिकित्सा का तीव्र गति से विकास हों रहा है, वहाँ के वैज्ञानिकों, चिकित्सकों से स्वास्थ्य मंत्रालय सम्पर्क करें, उनकी शोधों का अध्ययन करें एवं भारत में इस चिकित्सा पद्धति की क्रियान्विति की योजना बना व्यवस्थित कार्यक्रम बनायें तब ही इस पद्धति के प्रति अज्ञानतावश निराधार षंकायें दूर हो सकेगी। इस सहज, सरल, निरापद, सस्ती, प्रभावशाली अहिंसक चिकित्सा पद्धति के प्रति जन साधारण का विष्वास बढ़ सकेगा एवं चुम्बकीय चिकित्सा जन-साधारण में लोकप्रिय बन सकेगी। चिकित्सा पद्धतियों में आपसी सामंजस्य, विचार-विमर्ष एवं जन-जागरण से ही पीड़ित मानव समाज रोग मुक्त बन सकता है।

चुम्बक चिकित्सा के बारे में मेरा व्यक्तिगत अनुभव

                स्वयं द्वारा चुम्बक का उपचार करते समय मात्र इस बात की सजगता आवश्यक है कि हृदय एवं मस्तिष्क जैसे संवेदनशील भागों पर यथासंभव प्रारम्भ में उच्च शक्ति के चुम्बकों का प्रयोग न किया जाए, उपचार की अवधि धीरे-धीरे बढ़ावे तथा उपचार उतना ही करें, जिससे सिर में भारीपन न बढ़े। उपचार करते समय यदि गलती से चुम्बक का सही चयन न होने अथवा आवश्यकता से अधिक समय तक उपचार होने पर सिर में भारीपन होना प्रारम्भ होने लगता है। ऐसे समय हम नंगें पांव कुछ चलने अथवा एल्युमिनियम/ जस्ते धातु का स्पर्श कर लें तो सिर का भारीपन दूर हो जाता है।

                चुम्बक चिकित्सा के उपचार की अवधि एवं अन्तराल के सम्बन्ध में विभिन्न चिकित्सकों का अलग-अलग अभिमत है। अधिकांश चुम्बकीय चिकित्सा पद्धतियों की पुस्तकों में उपचार हेतु चुम्बकों को चन्द मिनटों तक दिन में एक या दो बार से अधिक स्पर्श कर उपचार करने का निषेध बताया गया है। मेरे पिछले 25 वर्ष के व्यक्तिगत अनुभव के अनुसार मैं दृढ़तापूर्वक कह सकता हूँ कि असाध्य एवं पुराने रोगों में तो चुम्बक का उपचार अपनी अनुकूलतानुसार बार-बार एवं अधिक समय तक पूर्ण करना चाहिए। पूर्ण उपचार न करने से अपेक्षित स्थायी लाभ नहीं मिलता, अपितु उपचार राहत तक ही सीमित हो सकता है। मैंने चुम्बकों का प्रयोग रोग की अवस्था में स्वयं पर बार-बार लम्बे समय तक किया है एवं अनेक रोगियों से भी करवाया है। जिसका कोई प्रत्यक्ष दुष्प्रभाव आज तक ध्यान में नहीं आया एवं बहुत कम समय में ही अपेक्षित परिणाम प्राप्त हुए। पूर्ण उपचार न करने से चुम्बकीय उपचार की भी अवधि बढ़ जाती है और उसकी प्रभावशालीता के सारे दावे खोखले लगने लगते हैं। कहने का आशय यह है कि चुम्बक आपका विश्वसनीय डाॅक्टर एवं दवा है जो इसका विधिवत प्रयोग करने लगते हैं, वे स्वयं के लिए रोगों का सुरक्षा कवच बना लेते हैं। अब हमकों ही निर्णय करना होगा कि- ‘‘हम चुम्बक का सही उपयोग कर स्वस्थ रहें या उपेक्षा करके रोगी”।

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