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स्वावलम्बी अहिंसक चिकित्सा

( प्रभावशाली-मौलिक-निर्दोष-वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धतियाँ )

80. आंखों के रोगों का बिना दवा उपचार


आंखों के रोगों का बिना दवा उपचार 

                आजकल आंखों के रोग बहुत बढ़ रहे हैं। आंखों के रोगों का कारण अपौष्टिक आहार, धूल भरा प्रदूषित वातावरण, तेज प्रकाश में देखना, कम प्रकाश में पढ़ना, लगातार टी.वी. देखना, बात-बात में आंसू निकालना, नेत्र रोगियों से संक्रमण, कम्प्यूटर पर अधिक कार्य करने के अलावा क्षमता से अधिक आंखों पर जोर देकर कार्य लेना तथा अधिक कामभोग अथवा अनावश्यक वीर्य स्खलन, बात-बात में अनावश्यक क्रोध करना अथवा चिड़चिड़ा स्वभाव, देर रात तक जागृत रहना एवं प्रातः देर से उठना, खट्टे पदार्थों का अधिक सेवन  तथा आंखों के माध्यम से विकार बढ़ाने वाले दृश्य आदि हो सकते हैं। उपरोक्त कारणों के कारण आंखों की दृष्टि कमजोर होती ही है। अतः आँखों का संयम उपचार के साथ अति आवश्यक होता है। हम ऐसे कार्यो से यथा संभव बचें, जो आंखों में रोग पैदा करते हैं।

                आध्यात्मिक दृष्टि अथवा कर्म सिद्धान्तानुसार जिस वस्तु का हम दुरुपयोग करते हैं वह वस्तु या तो मिलती नहीं या अच्छी नहीं मिलती। जन्मजात अन्धता एवं आंखों के विभिन्न रोगों का पूर्वजन्मों के कर्मों से सीधा सम्बन्ध होता है। आंख है तो देखे बिना नहीं रह सकते। परन्तु ऐसी वस्तु को देखते रहना और उस अनित्य वस्तु की इच्छा की पूर्ति हेतु उसकी स्मृति नेत्र विकार से संबंधित होते हैं। दिखना अलग है, देखना अलग है, देखते रहना अलग होता है एवं देखी हुई भौतिक वस्तु को प्राप्त करने हेतु चिंतन एवं चिंता अलग होती है। यदि कोइ नासमझ बच्चा अपने पापा को नोट गिनते देख पापा से 1000 रुपये का नोट मांगे तो पापा प्रेमवश उसको नोट दे दें। परन्तु यदि वह नासमझ बच्चा उस नोट को फाड़ दे एवं अपने पापा से दूसरा मांगे तो बच्चे से कितना भी प्यार हो पापा पुनः उसे सही नोट कभी नहीं देंगे। कर्म सिद्धान्त का नामकर्म इसी सिद्धान्त का पालन करता है।

                चक्षु इन्द्रिय के दो भाग होते हैं- 1. द्रव्य चक्षु इन्द्रिय, 2. भाव चक्षु इन्द्रिय। द्रव्य चक्षु इन्द्रिय का संबंध आंख के बाह्य आकार एवं उसके भौतिक उपकरण से होता है, जबकि भाव इन्द्रिय का संबंध देखने की चैतन्य ऊर्जा से होता है। आधुनिक नेत्र चिकित्सक मात्र उपकरण में आए विकारों को दूर कर सकते हैं परन्तु जिसकी दृष्टि ही न हो उसका उपचार नहीं कर सकते। अतः यहाँ भी ऐसे ही उपकरण संबंधी आंखों के रोगों की प्रभावशाली, अहिंसक उपचार का विवेचन किया जा रहा है।

                मानव शरीर के सारे अंग, उपांग और अवयव पूर्ण सहयोग और तालमेल से कार्य करते हैं। प्रत्येक कार्य को करने में शरीर के उस अवयव को प्रत्यक्ष-परोक्ष कम-ज्यादा अन्य अवयवों का सहयोग मिलता है। अतः शरीर के किसी भाग में कोई गड़बड़ी हो और उस भाग से अनावश्यक कार्य न करवाये जाएँ एवं अन्य सहयोगी अवयवों का अधिकाधिक सहयोग लिया जाए तो कोई भी रोग असाध्य और संक्रामक नहीं रहता।

                आंखों का सीधा संबंध चीनी पंच तत्त्व सिद्धान्त के अनुसार यकृत और पित्ताशय से भी होता है। आंखों में रोग का आन्तरिक प्रभाव यकृत-पित्ताशय का असंतुलन अथवा पूर्ण क्षमता से कार्य न कर पाना होता है। अतः यकृत और पित्ताशय की पंच ऊर्जाओं को बियोल मेरेडियन में संतुलित और नियन्त्रित रखा जाए तो यकृत-पित्ताशय के असंतुलन से होने वाले, आंखों के अनेक रोगों से बचा जा सकता है।

  1. दूर या नजदीक की कमजोर दृष्टि- जब यकृत की वायु ऊर्जा कम हो जाती है, तो नजदीक की दृष्टि कमजोर होने लगती है। परन्तु जब यकृत में शुष्क ऊर्जा की कमी हो जाती है तो दूर की वस्तुएँ देखने में कठिनाई होती है। अतः यकृत की बियोल मेरेडियन में वायु ऊर्जा को बढ़ाकर नजदीक की दृष्टि और शुष्क ऊर्जा को बराबर कर दूर की दृष्टि को सुधारा जा सकता है।
  2. मोतियाबिंब का उपचार- मोतियाबिंब (केट्रक) होने का एक मुख्य कारण यकृत की ठण्डक ऊर्जा का बढ़ना भी होता है। अतः जब यकृत में ठण्डक ऊर्जा बढ़ जाती है तो, केट्रक (Cataract) होने लगता है। अतः उस स्थिति आने से पूर्व यदि यकृत की ठण्डक ऊर्जा को कम रखा जाए तो केट्रक होने की संभावनाएँ कम हो जाती है।

          वृद्धावस्था में मोतियाबिंब पकने से पूर्व मुंह में पानी भरकर नियमित सूर्य तप्त हरे पानी से अथवा ताजे स्वमूत्र से अथवा त्रिफला के पानी से नियमित आंखें धोने से भी केट्रक होने की संभावनाएँ कम हो जाती है। परन्तु केट्रक होने के पश्चात् यदि पुराने स्वमूत्र को दिन में दो बार आंखों में डाला जाए तो केट्रक साफ हो सकता है और शल्य चिकित्सा की आवश्यकता नहीं रहती। जितना स्वमूत्र पुराना होता है, उतना उपचार अधिक प्रभावशाली होता है। फिर भी कम से कम 15 से 20 दिन पुराना स्वमूत्र तो होना ही चाहिए। पुराना शिवाम्बु आंखों में डालने से असहनीय जलन हो सकती है। अतः हमें एक दम पुराना शिवाम्बु आंखों में डालने के बजाय पहले उसी दिन का, फिर दूसरे, तीसरे, चौथे, पांचवें दिन के हिसाब से अवधि क्रमशः बढ़ाते-बढ़ाते 15 से 20 दिन तक अवधि बढ़ाकर स्वमूत्र नियमित डालना चाहिए। इससे आंखों का पुराने स्वमूत्र के साथ तालमेल हो जाता है। किसी दुष्प्रभाव की संभावना नहीं रहती। इंदौर के अनुभवी शिवाम्बु चिकित्सक माणक चन्द जी मारू के परामर्श से ऐसे बहुत से आंखों के रोगियों को शल्य चिकित्सा की आवश्यकता नहीं पड़ी।

  1. रतोन्धी- कुछ व्यक्तियों को रात्रि में देखने और पढ़ने में परेशानी होती है अथवा रतोन्धी का रोग हो जाता है। यदि ऐसे रोगियों के यकृत की वायु और ताप ऊर्जा आवश्यकतानुसार बढ़ा दी जाए तो सन्तोषजनक परिणाम आने लगते हैं।
  2. रंग न पहचान पाना (Colour Blindness)- चन्द रोगियों को कुछ रंग पहचानने में परेशानी होती है। यदि हरा रंग पहचानने में कठिनाई हो तो यकृत की वायु ऊर्जा बढ़ाने से अच्छे परिणाम आते हैं। ठीक उसी प्रकार लाल रंग न पहचानने वालों की ताप, पीला रंग न पहचानने वालों की नमी और नीला रंग न पहचानने वालों के यकृत की ठण्डक ऊर्जा बढ़ाने और संतुलित करने से लाभ होता है।
  3. आंखों के अन्य रोगों का उपचार- चीनी पंच तत्त्व सिद्धान्त के अनुसार आंख, यकृत, पित्ताशय यिन-यांग परिवार का सदस्य होती है। अतः यकृत पित्ताशय को संतुलित एवं स्वस्थ रख आंखों के सभी रोगों का प्रभावशाली उपचार किया जा सकता है।

                यदि आंखें झपकती हो तो पित्ताशय की वायु ऊर्जा घटाने से, आंखें लाल हो तो पित्ताशय के ताप की ऊर्जा कम करने से, आंखों में बिना विशेष कारण पानी आता हो तो पित्ताशय की नमी ऊर्जा को कम करने से, आंखे खटकती हो तो पित्ताशय की शुष्क ऊर्जा कम करने से अच्छे परिणाम आते हैं। ऊर्जा घटाने हेतु बटन चुम्बक का उत्तरी ध्रुव तथा ऊर्जा बढ़ाने हेतु बटन चुम्बक का दक्षिणी ध्रुव बियोल मेरेडियन के संबंधित ऊर्जा प्रतिवेदन बिन्दुओं पर लगाना चाहिए। आंखों के उपरोक्त रोग यदि लम्बे समय तक हों तो पित्ताशय के स्थान पर यकृत की संबंधित ऊर्जा को घटाना चाहिए। यदि आंखों से बराबर न दिखता हो तो भी यकृत की ठण्डक ऊर्जा घटानी एवं ताप ऊर्जा बढ़ानी चाहिए।

नेत्र ज्योति अच्छी रखने के उपायः-
  1. आज्ञा चक्र, विशुद्धि चक्र, नाभि चक्र एवं आंखों पर एकाग्रता पूर्वक प्रातःकाल ध्यान करने से नेत्र दृष्टि सुधरती है।
  2. प्राण मुद्रा, उदान मुद्रा, नमस्कार मुद्रा एवं ज्ञान मुद्रा नियमित करने से आंखों के रोग होने की संभावनाएँ कम हो जाती है।
  3. चन्द्र स्वर एवं सूर्य स्वर को आवश्यकतानुसार संतुलित रखने से आंखों के रोगों में शीघ्र अच्छे परिणाम मिलते है।
  4. हथैली एवं पगथली में सभी दर्दस्थ प्रतिवेदन बिन्दुओं पर एक्युप्रेशर करने से आंखों के सभी रोग ठीक होते हैं।
  5. प्रतिदिन आंखों का व्यायाम करने से अर्थात् आंखों को दायें-बायें, ऊपर-नीचे, तिरछी बायें नीचे, दाहिने तिरछी ऊपर, तिरछी दाहिने नीचे, तिरछी बांयें ऊपर, बहुत दूर और बिल्कुल समीप के पदार्थो को देखने से आंखों की मांसपेशियाँ सक्रिय होती है। आंखों की पलकों को गोल-गोल घूमाने, दोनो हथेलियों के अंगूठे के नीचे के ऊभरे भाग को रगड़ कर आंखों पर स्पर्श करने से आंखों का भारीपन कम होता है तथा नेत्र ज्योति सुधरती है।
  6. प्रातःकाल उदित सूर्य के सामने देखने से आंखों की रोशनी बढ़ती है।
  7. मुंह में पानी भरकर त्रिफला के पानी से या सूर्य तप्त हरे पानी से अथवा स्वमूत्र से आंखों को धोने से आंखों की दृष्टि सुधरती है।
  8. प्रातःकाल निद्रा त्याग के समय आंखों में अपने बासी थूक का अंजन करने से आंखों के विकार दूर होते हैं।
  9. स्वमूत्र से नेति क्रिया करने से आंखों के विकार दूर होते हैं।
  10. रात्रि में निद्रा में आंखों पर मेथी की पट्टी बांध कर सोने से अथवा कम शक्ति वाले चुम्बक आंखों पर स्पर्श करने से आंखें सशक्त हो जाती है।
  11. प्रातः नंगें पांव हरी घास पर चलने, हरे रंग का ध्यान करने, हरी वस्तुओं को देखने एवं भोजन में हरी सब्जियों का सेवन आंखों के लिये लाभ प्रद होता है।
  12. पीयूष ग्रन्थि ओप्टिकल नर्व पर नियन्त्रण रखती है। पीयूष एवं अन्य ग्रन्थियों पर एक्युप्रेशर द्वारा उपचार करने से आंखों के रोग होने की संभावनाएँ कम हो जाती है।
  13. पगथली के तलवों में नियमित तेल मर्दन करने से नेत्र ज्योति सुधरती है।

                उपर्युक्त बातों का यथा संभव पालन करने से आंखों के अनेक रोगों में न केवल शीघ्र लाभ ही मिलता है, अपितु आंखों की ज्योति भी सुधरती हैं।

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