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स्वस्थ रहें या रोगी?: फैसला आपका

स्वावलम्बी अहिंसक चिकित्सा

( प्रभावशाली-मौलिक-निर्दोष-वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धतियाँ )

39. मेरुदण्ड के घुमावदार व्यायाम


    योग महर्षि स्वामी देवमूर्ति जी द्वारा अन्वेषित मेरूदण्ड के घुमावदार आसनों से रीढ़ के मणकों में आया तनाव, खिंचाव और विकृति सरलतापूर्वक दूर की जा सकती है। इन आसनों को स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़े, स्वस्थ और रोगी सभी आसानी से कर सकते हैं। इनके नियमित अभ्यास से रोगी के मेरूदण्ड संबंधी विविध रोग ठीक हो जाते हैं तथा व्यक्ति स्वस्थ बना रह सकता हैं। जैसे हजार रुपयों के सिक्कों के बोझ को हजार के नोट में बदल कर ले जाने वाला सिक्कों के भार से बच जाता है ठीक उसी प्रकार वर्तमान में प्रचलित विविध व्यायामों का संयुक्त लाभ मेरूदण्ड के इन घुमावदार व्यायामों से मिल जाता है।

                मनुष्य को छोड़कर सभी प्राणियों की रीढ़ की हड्डी क्षितिज के समानान्तर होती है। अतः चलने-फिरने में उनके मणके स्वयं हलचल में आ जाते हैं। परिणाम स्वरूप उनकी सुषुम्ना नाड़ी की सुप्त शक्तियाँ स्वयं जागृत हो जाती है। यही कारण है कि अन्य जीवों को मनुष्य की अपेक्षा स्नायु सम्बन्धी रोग कम होते हैं। यदि मनुष्य भी रीढ़ के विविध घुमावदार आसनों को नित्य विधिपूर्वक करलें तो उनमें भी सुषुम्ना शक्तियाँ जागृत होने लगती हैं, ऊर्जा चक्र  सक्रिय होने लगते हैं एवं स्नायु संस्थान ताकतवर होने से, स्नायु संबन्धी रोगों के होने की संभावनाएं बहुत कम हो जाती है।

                हम देखते हैं कि घोड़ा दिन भर बोझा खींचता है, जिससे उसकी रीढ़ के मणके कभी-कभी आपस में चिपक जाते हैं। सायंकाल घोड़ा जमीन पर लेटकर मस्ती से अपने शरीर को दायें-बायें करता है, जिससे उसके मणकों में आया तनाव, विकृति और खिंचाव दूर हो जाता है, मणके अपने स्थान पर आ जाते हैं। उसकी सारी थकान दूर हो जाती है। यदि हम भी घोड़े की तरह रीढ़ की हड्डी को सुबह-शाम ‘ठोडी दायें तो घुटना बायें’और ‘घुटना दायें तो ठोडी बायें’ घुमाना प्रारम्भ कर दें तो मेरू दण्ड में आई विकृतियाँ दूर हो जाती है।

                रीढ़ के घुमावदार व्यायाम करने के लिये सर्व प्रथम दोनों हाथ कन्धों के बराबर फैलाकर एक दम सीधा पीठ के बल जमीन पर लेट जाना चाहिए। इस व्यायाम की विविध स्थितियाँ होती है, जिसमें पैरों की ही स्थितियाँ अलग-अलग ढंग से बदली की जाती है। गर्दन को घुमाने का एक ही तरीका और नियम होता है। जब पैरों को बायीं तरफ घुमाया जाता है तो गर्दन को दाहिनी तरफ मोड़, टोढ़ी को कंधों से स्पर्श किया जाता है। जब पैरों को दाहिनी तरफ घुमाया जाता है तो, गर्दन को उसी ढंग से बायीं तरफ घुमाया जाता है।

                प्रथम स्थिति में पैरों की दोनों एडियों के बीच पगथली के बराबर दूरी रखी जाती है तथा एक पगथली की अंगुलियों को बारी-बारी से दूसरे पैर की ऐडी से स्पर्श किया जाता है तथा गर्दन को उसके विपरीत दिशा में घुमाया जाता है।

                दूसरी स्थिति में दोनों पगथलियों को पास-पास में रख अंगुलियों को एक बार बायीं, फिर दाहिनी तरफ, बारी-बारी से जमीन को स्पर्श किया जाता है तथा साथ ही साथ गर्दन को विपरीत दिशा में घुमाया जाता है। ठीक इसी प्रकार तीसरी स्थिति में एक पगथली के ऊपर दूसरी पगथली बारी-बारी से रख कर, चौथी स्थिति में पैर के अंगूठे और उसके पास वाली अंगुलि के बीच दूसरे पैर की एडी को बारी-बारी से रख, पांचवी स्थिति में दोनों घुटनों को पास-पास खड़ा कर दोनों पैरों को आपस में स्पर्श करते हुए  बारी-बारी से बायें-दाहिने जमीन को स्पर्श कराया जाता है। पांचवें आसन को क्वीन एक्सरसाईज (रानी आसन) भी कहते हैं।

                इस प्रकार छट्ठी स्थिति में दोनों घुटनों को कुछ दूरी पर खड़ा रख पगथली को जमीन से स्पर्श कर पैर को बायें-दाहिने घुमाते हुये, एक घुटने को जमीन तथा दूसरे को पहले पैर की एडी से स्पर्श बारी-बारी से कराया जाता है। इस आसन को किंग एक्सरसाईज (राजा आसन) भी कहते हैं।

                सातवीं स्थिति में एक पैर को सीधा रख दूसरे पैर की पगथली को उसके घुटने के पास रख कर, दूसरे पैर के घुटने को दूसरे पैर की दिशा में जमीन से बारी-बारी स्पर्श कराया जाता है। आठवी स्थिति में दोनों घुटनों को छाती से स्पर्श करते हुये बायीं-दाहिनी तरफ पैरों व गर्दन को घुमाया जाता है।

                अंत में पवन मुक्तासन की स्थिति में दोनों हथेलियों से घुटनों को पकड़ सीने से स्पर्श करते हुए हुये बायें-दाहिने पैरों की तरह सारे शरीर को घुमाया जाता है और अंत में सीधा पवन मुक्तासन किया जाता है।

व्यायाम करते समय ध्यान रखने योग्य सावधानियाँ:-

                प्रत्येक आसन के पश्चात् कुछ समय शवासन करना चाहिये। प्रत्येक आसन को कम से कम 15 से 25 बार करना चाहिये। जो एक साथ इतना न कर सकें उन्हें कम से कम रोग की स्थिति में दो-तीन बार थोड़ा-थोड़ा अवश्य कर लेना चाहिए। इन आसनों का अभ्यास प्रायः मल त्याग के पश्चात् खाली पेट करना चाहिए। परन्तु जिन्हें कब्ज की शिकायत रहती है, उन्हे उषापान करने के पश्चात् इन आसनों को करना अधिक गुणकारी होता है। महिलाएँ मासिक धर्म के दिनों में एवं गर्भावस्था के तीन मास पश्चात् तथा किसी भी व्यक्ति को शल्य चिकित्सा के तुरन्त पश्चात् अथवा फ्रेक्चर होने की स्थिति में इन आसनों को नहीं करना चाहिये। जिन्हें निद्रा आने में परेशानी हों, उन्हें सोते समय इन व्यायामों को करना चाहिए।  प्रायः व्यायाम करते-करते निद्रा आने लगती है।

                प्रत्येक व्यायाम श्वास भर कर करने से अधिक लाभकारी होता है, परन्तु जिन्हें इसमें कठिनाई हो, वे साधारण स्थिति में भी इन आसनों को कर सकते हैं। आसन करते समय शरीर के साथ किसी प्रकार की जोर जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए। सहजता एवं सरलता से शरीर जितना घुमाया जा सकता है, उतना ही घुमाना चाहिए। जिन व्यक्तियों के मेरूदण्ड के मणकों में लोच की कमी होती है, या बायें-दायें करने में कष्ट होता है,उन्हें धीरे-धीरे जितना बायें-दायें कर सकते हैं करना चाहिए अर्थात् झटका न दें और न ही देर तक किसी एक कष्टदायक स्थिति में रूकें और न ही शरीर के उस भाग को जबरदस्ती जमीन तक ले जाना जरूरी होता है। घुमाते समय धीरे-धीरे दायें-बायें जाना चाहिए अर्थात् किसी प्रकार का झटका नहीं देना चाहिए।  शरीर को घुमाते समय जिन मांसपेशियों में दर्द हों, वे मासपेशियाँ शरीर में रोगों से संबंधित होती  है। उन मांसपेशियों का उपचार करने से रोग में तुरन्त आराम मिलता है। उन दर्दस्थ मांसपेशियों के उपचार हेतु एक्यूप्रेशर, चुम्बक, मसाज, आसन,मेथी एवं खिंचाव जैसी सरल स्वावलंबी चिकित्साओं का सहयोग लिया जा सकता है। नियमित इन आसनों के करने से बोने बच्चों की लम्बाई-बढ़ने लगती है। नाभि अपने स्थान पर आ जाती है। कब्ज, गैस, थकावट, आलस्य, अनिद्रा, मोटापा, मधुमेह एवं नाड़ी संस्थान एवं मेरूदण्ड सम्बन्धी ऐडी से लगाकर गर्दन तक के विविध अन्य रोगों में लाभ होता है। इन आसनों को स्वस्थ एवं रोगी दोनों कर सकते हैं।

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