क्यों पढ़े आरोग्य आपका   ?

स्वस्थ रहें या रोगी?: फैसला आपका

स्वावलम्बी अहिंसक चिकित्सा

( प्रभावशाली-मौलिक-निर्दोष-वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धतियाँ )

33. सुजोक में छः ऊर्जा द्वारा असाध्य रोगों के उपचार की पद्धति


(Sujok Six Ki Therapy for Chronic & Acute Diseases)

 क्या शल्य चिकित्सा का कोई विकल्प है? 

                शरीर में ऊर्जाओं का असंतुलन रोगों का मुख्य कारण होता है। साधारण रोगों में शरीर की पांच मुख्य ऊर्जाओं में से किसी एक ऊर्जा असंतुलन के लक्षण स्पष्ट रूप से प्रकट होते हैं। बाकी अन्य ऊर्जाओं के असंतुलन से पड़ने वाले लक्षण परोक्ष में रहते हैं। जो प्रायः ध्यान में नहीं आते। अतः सुजोक बियोल मेरेडियन  उपचार पद्धति में प्रमुख असंतुलित ऊर्जा के प्रवाह को संतुलित करने मात्र से साधारण रोगों में तुरन्त राहत मिल जाती है। परन्तु जब रोग जन्मजात हों, पुराना हों, संक्रामक एवं तीव्र हों, जिसके परिणामस्वरूप शरीर का कोई अंग उपांग अथवा अवयव बराबर कार्य न करता हों, अथवा रोग शल्य चिकित्सा की स्थिति तक पहुँच गया हो, उस समय शरीर में प्रायः अन्य सहायक ऊर्जाओं के संतुलन का अनुपात अधिक बिगड़ जाता है। उस स्थिति में रोग की अवस्था के अनुसार यदि प्रमुख असंतुलित ऊर्जा के संतुलन के साथ साथ अन्य सहायक एवं नियन्त्रित करने वाली ऊर्जाओं को भी संतुलित कर दिया जाये तो पुराने हठीले रोगों का उपचार बहुत ही सरल एवं प्रभावशाली हो जाता है। कभी-कभी शल्य चिकित्सा की आवश्यकता नहीं रहती। ऊर्जा संतुलन द्वारा शरीर में आये अवरोधों को दूर किया जा सकता है। रक्त संचार सुव्यवस्थित एवं नियन्त्रित किया जा सकता है। शरीर की प्रतिकारात्मक क्षमताओं को बढ़ाया जा सकता है। अंगों की अनावश्यक वृद्धि को रोका जा सकता है। शरीर में विजातीय तत्त्वों के जमा होने से यदि कोई गांठ बनती है तो इस पद्धति द्वारा उसको तोड़ा जा सकता है, बिखेरा जा सकता है, गलाया जा सकता है। संकुचित किया जा सकता है। परन्तु एक बार शल्य चिकित्सा करवाने के पश्चात् इस प्रभावशाली उपचार पद्धति की भी सीमाएँ बढ़ जाती है। अतः यथा संभव शल्य चिकित्सा से बचना ही स्थायी स्वस्थ जीवन के लिये आवश्यक है।

पंच तत्त्व की ऊर्जाओं का आपसी संबन्ध:

                शरीर में सभी ऊर्जाओं का उत्पादन और नियन्त्रण, अलग-अलग अवस्थाओं में उनका अनुपात, निश्चित सिद्धान्तों पर आधारित होता है। प्रत्येक ऊर्जा किसी अन्य ऊर्जा की उत्त्पत्ति में सहायक होती है, तथा किसी दूसरी ऊर्जा को नियन्त्रित करती है और स्वयं किसी तीसरी ऊर्जा द्वारा नियन्त्रित होती है। गर्मी में आद्रता बढ़ती है। जिसका प्रभाव पसीने के रूप में स्पष्ट देखा जा सकता है। वायु हलन-चलन में सहायक होती है। शुष्कता उसको नियन्त्रित रखती है।

                उपचार करते समय यदि किसी अंग की कोई ऊर्जा बढ़ाना हो तो उसकी मातृ ऊर्जा (जो उसके उत्पत्ति में सहायक होती है) तथा पुत्र (ऊर्जा जिस ऊर्जा को वह ऊर्जा पैदा करती है), को बढ़ाना चाहिए और यदि किसी अंग की ऊर्जा को घटाना हो तो मातृ एवं पुत्र ऊर्जाओं को भी घटाना चाहिए। इसके साथ-साथ जिस ऊर्जा से वह ऊर्जा नियन्त्रित होती है और ऊर्जा जिसको, वह नियन्त्रित करती है, उस ऊर्जा को मुख्य ऊर्जा की आवश्यकता के विपरीत घटाना अथवा बढ़ाना चाहिये।

शरीर में मास्टर बियोल मेरेडियन की भूमिका:

                पेरीकार्डियन (मस्तिष्क) एवं ट्रीपल वार्मर (मेरुदण्ड) मेरेडियन शरीर की मास्टर मेरेडियन कहलाती है। अधिकांश रोगों का प्रारम्भ मस्तिष्क से होता है तथा उसकी अभिव्यक्ति में मेरूदण्ड की अहम् भूमिका होती है। अतः उपचार करते समय मुख्य असंतुलित ऊर्जा के अनुरूप इन मेरेडियनों में ऊर्जा को बढ़ाने अथवा घटाने से मुख्य ऊर्जा का असंतुलन जल्दी दूर हो जाता है। यिन अंगों (यकृत, हृदय, गुर्दे, तिल्ली, फेंफड़ों) के साथ-साथ मस्तिष्क में तथा यांग अंगों (आमाशय, मूत्राशय, पित्ताशय, छोटी आंत, बड़ी आंत) के साथ-साथ मेरुदण्ड बियोल मेरेडियन  की उसी मुख्य ऊर्जा को घटाना अथवा बढ़ाना चाहिये, जिससे शरीर में रोग शमन की क्षमता बढ़ जाती है।

शरीर के मध्य भाग में प्रवाहित होने वाली मेरेडियन की भूमिका:

                शरीर के बीचों बीच आगे और पीछे की तरफ दो मेरेडियन  प्रवाहित होती है। आगे के भाग में गुजरने वाली मेरेडियन  को कनशेपशन वेसल (C.V.) तथा पीछे के भाग में प्रवाहित होने वाली मेरेडियन को गवरनिंग वेसल (G.V.) मेरेडियन कहते हैं। जिनकी बियोल मेरेडियन अंगूठे में होती है। C.V. मेरेडियन  यिन अंगों और G.V. मेरेडियन  यांग अंगों के बीच संतुलन रखती है। अतः उपचार करते समय C.V. अथवा G.V. बियोल मेरेडियन  की संबन्धित  मुख्य ऊर्जा को भी घटाया अथवा बढ़ाया जावे तो शरीर में रोग निवारण क्षमता और अधिक बढ़ जाती है।

उपचार हेतु चिकित्सक का व्यापक दृष्टिकोण आवश्यक:

                दुनिया में दो व्यक्ति एक जैसे नहीं हो सकते, तब दो रोगी एक जैसे कैसे हो सकते हैं? प्रत्येक रोगी की शारीरिक संरचना, आयु, मानसिक अवस्था, सहन शक्ति, क्षमता, जीवन पद्धति एवं उसके पूर्वकृत कर्मो का प्रभाव अलग-अलग होता हे। अतः चिकित्सकों से अपेक्षा है कि न केवल वे पेथालोजिकल परीक्षणों को ही सही निदान का एक मात्र आधार बनाये परन्तु शरीर में जो-जो रोग के लक्षण प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रकट हो रहे हैं उनका समग्र दृष्टिकोण से तुलनात्मक विश्लेषण करें। उपचार से पड़ने वाले दुष्प्रभावों की अनदेखी न करें।

                क्या रोग का कारण किसी विशेष मौसम अथवा परिवर्तन से तो नहीं है? क्या रोग शरीर के किसी भाग तक सीमित है अथवा उसका प्रभाव सारे शरीर पर पड़ रहा है? भूतकाल में रोगी क्या-क्या उपचार ले चुका है तथा किसी संक्रामक रोग से पीड़ित तो नहीं रहा? क्या भूतकाल में शरीर में कोई शल्य चिकित्सा, फ्रेक्चर आदि तो नहीं हुआ? जब रोग के लक्षण प्रकट हुए उस समय, उस महिने, अथवा जीवन की उस अवस्था में कौनसी ऊर्जा का बाहुल्य था? रोगी के स्वभाव एवं सोच में तो कोई विशेष परिवर्तन तो नहीं आया?  रोग का संबन्ध शरीर के किस तंत्र, अन्तःश्रावी ग्रन्थियों, इन्द्रियों से अधिक है? क्योंकि यदि किसी बच्चे के पसीना ज्यादा आता है तो उसके यकृत की नमी घटाने से, विद्यार्थी काल में पसीना ज्यादा आता है, तो हृदय की नमी को घटाने से तथा वृद्धावस्था में पसीना ज्यादा आता है तो गुर्दे की नमी घटाने से उपचार अधिक प्रभावशाली होता है, न कि प्रत्येक अवस्था में तिल्ली की नमी घटाने से। अर्थात जिस अवस्था का रोग हो, उस समय की प्रभावशाली ऊर्जा संतुलन को प्राथमिकता देनी चाहिये।

                उपचार प्रारम्भ करने से पूर्व रोग का सही निदान आवश्यक होता हैं । यदि आवश्यक हो तो अन्य प्रभावशाली चिकित्सा पद्धतियों के अनुभवी चिकित्सकों का निदान में सहयोग लेने में नहीं हिचकिचाना चाहिये। कोई भी चिकित्सा पद्धति अपने आप में पूर्ण नहीं होती जो रोगी को पूर्ण स्वस्थ रखने का दावा कर सके। अतः असाध्य एवं संक्रामक रोगों में तो समग्र दृष्टिकोण से ही उपचार प्रभावशाली और शीघ्र हो सकता है।

                उपचार प्रारम्भ करते समय शरीर के बाह्य असंतुलनों को पहले ठीक करना चाहिये। जैसे दोनो पैर बराबर हैं अथवा नहीं? पगथली बहुत ठण्डी तो नहीं है? नाभि का स्पन्दन अपने केन्द्र में है अथवा नहीं? मेरूदण्ड के मणके और गर्दन का केन्द्र (MO) अपने स्थान पर है अथवा नहीं? जिस प्रकार गाड़ी कितनी भी अच्छी क्यों न हो? चालक कितना भी होशियार क्यों न हो? यदि चक्कों में हवा बराबर नहीं हो तो लक्ष्य पर पहुँचना कभी-कभी कठिन हो सकता है। ठीक उसी प्रकार इन संतुलनों को ठीक किये बिना उपचार भी स्थायी नहीं हो सकता।

                उपचार के साथ-साथ ‘प्रभावशाली स्वावलम्बी दुष्प्रभावों से रहित अहिंसात्मक चिकित्सा पद्धतियों’का अवश्य सहयोग लेना चाहिये। शरीर के विजातीय तत्त्वों को हटाने एवं अन्तःश्रावी ग्रन्थियों को सक्रिय करने में एक्यूप्रेशर पद्धति बहुत प्रभावशाली है। दर्द को कम करने, गांठ को सिकोड़ने और शरीर की हीलिंग क्षमता को बढ़ाने में चुम्बक के प्रभाव को कोई नकार नहीं सकता। शरीर में दवाओं के दुष्प्रभावों को हटाने तथा आन्तरिक अवरोधों को दूर करने में शिवाम्बु का सेवन सैकड़ों दवाओं का एक मात्र विकल्प प्रमाणित हो चुका है। सूर्य किरण एवं रंग चिकित्सा तथा रेकी जैसी प्रभावशाली चिकित्साओं की भी अपनी-अपनी विशेषताएं होती है।

                शरीर के कमजोर अथवा जलन, सूजन, दाद, खुजली वाले भाग पर दाणा मेथी का स्पर्श अत्यधिक लाभकारी होता है। सूर्य मुखी तेल का गंडूस करने से रक्त विकार संबंधी रोगों का उपचार बहुत प्रभावशाली हो जाता है। नमस्कार मुद्रा का अभ्यास हृदय तथा मस्तिष्क और फेंफड़े की बियोल मेरेडियनों में संतुलन करने से शरीर में डायाफ्राम के ऊपर के अंगों से संबंधित रोगों में चमत्कारी परिणाम आते है। स्वर परिवर्तन असाध्य रोगों में तुरन्त राहत पहुंचाता है। मुस्कुराने एवं खुलकर हंसने से सकारात्मक सोच होने लगता है। अतः मानसिक एवं भावात्मक रोगों में तुरन्त लाभ होता है। उपचार के साथ मस्तिष्क शोधन की क्रिया करने, उषापान करने, नियमित प्राणायाम, सूर्य दर्शन, अंग व्यायाम, मेरूदण्ड के घुमावदार व्यायाम भी संभव हो तो अवश्य करना चाहिए।

                इन चिकित्साओं के साथ शरीर की पांच प्रमुख ऊर्जाओं को बियोल मेरेडियन के माध्यम से संतुलित कर दिया जावे तो असाध्य समझें जाने वाले पुराने, संक्रामक, हठीले रोगों से बिना दवा के सेवन भी शीघ्र राहत मिल सकती है, और अधिकांश परिस्थितियों में शल्य चिकित्सा को टाला जा सकता है।

उपचार हेतु रोगी से अपेक्षाएं:-

                शारीरिक सूक्ष्म परिवर्तनों की जितनी जानकारी रोगी को होती है, उतनी किसी अन्य को नहीं। उपचार के प्रभावों से पड़ने वाले परोक्ष परिवर्तनों का जितना रोगी को अनुभव होता है, उतना दूसरे को हो नही सकता। अतः उपचार में रोगी की सजगता, स्वयं पर संयम, स्वस्थ होने की तीव्र उत्कंठा, उपचार के प्रति तर्क पूर्ण सम्यक् चिन्तन, श्रद्धा एवं अनुप्रेक्षा, दुष्प्रभावों के प्रति सजगता, रोग के कारणों को जानने एवं उन कारणों से बचने का दृढ़ मनोबल आवश्यक होता है। उपचार में जब तक रोगी की सक्रिय भागीदारी, प्राथमिकता, नियमितता, एकाग्रता एवं शरीर की क्षमताओं के प्रति अज्ञान रहेगा, तब तक रोगी परावलम्बी बन चिकित्सक से ही सारी अपेक्षा रखेगा, तब तक उपचार प्रभावशाली कैसे हो सकता है? उपचार करते समय विशेष रूप से स्वास्थ्य के मूलभूत सनातन सिद्धान्तों का पालन आवश्यक होता है। जैसे भोजन, पानी, हवा और धूप व्यायाम और विश्राम कब, क्यों कहां, कैसे और कितना ? शरीर की क्षमताओं का सम्यक् उपयोग करना ? स्वाध्याय, ध्यान, आत्म निरीक्षण करने में मन लगाना? रोगी को अनित्य, अशरण, संसार और माध्यस्थ भावना का निरन्तर चिन्तन करना चाहिये और अपने शारीरिक ऊर्जाओं का अपव्यय नहीं होने देना चाहिए। ऐसे चिन्तन से रोगी रोग के लिए स्वयं को जिम्मेदार मानेगा। उपचार से पड़ने वाले दुष्प्रभावों की उपेक्षा नहीं करेगा तथा काम में लिये जाने वाले साधनों एवं सामग्री की पवित्रता का विशेष ध्यान रखेगा। उपचार हेतु हिंसा को प्रोत्साहन देने वाले साधनों की उपेक्षा करेगा। क्योंकि दुःख देने से दुःख ही मिलता है। इस प्रकार रोग का कारण यदि पूर्व उपर्जित कर्म का उदय हो तो भी शान्त भाव से उनकी निर्जरा कर सदैव के लिये अपने आपको दुःख के कारणों से मुक्त कर सकेगा। इन सभी बातों के पालन से उपचार अत्यधिक प्रभावशाली हो जाता है।

                क्या रोगी का श्वास कोई दूसरा ले सकता है? खाना दूसरा व्यक्ति पचा सकता है? पानी दूसरा व्यक्ति पी सकता है? चिन्तन-मनन अन्य व्यक्ति कर सकता है? दर्द पीड़ा अन्य व्यक्ति अभिव्यक्त अथवा सहन कर सकता है? शरीर में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों को समझ सकता है? जो रोगी द्वारा ही संभव है। अच्छी से अच्छी चिकित्सा पद्धति और चिकित्सक के प्रयास रोगी की सजगता एवं सक्रिय भागीदारी के बिना अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकते। रोग हेतु रोगी की सजगता आवश्यक  होती है। अतः उपचार में रोगी की भूमिका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होती है।

प्रमुख ऊर्जा असंतुलन जानने का सरल ढंग:-

                पुराने अथवा संक्रामक रोगों में प्रायः ऊर्जा असंतुलन के लक्षण स्पष्ट प्रकट होने लगते हैं । रोगी की हथेली को अपने हाथ से स्पर्श कर अनुभव करें:-

  1. यदि रोगी की हथेली ठण्डी है तो, समझना चाहिये कि रोगी में ठण्डक ऊर्जा की अधिकता है।
  2. यदि रोगी की हथेली गरम है तो, समझना चाहिये कि रोग का कारण ताप ऊर्जा की अधिकता से है।
  3. यदि हथेली में पसीना अधिक आता हो तो, रोग का प्रमुख कारण नमी ऊर्जा का असंतुलन होता है।
  4. यदि रोगी की हथेली शुष्क हो, त्वचा रूक्ष हो तो, शरीर में शुष्क ऊर्जा अधिक होने का संकेत है।
  5. यदि शरीर में कंपकंपी का अनुभव हो, अनावश्यक हलन-चलन हो, अथवा उपरोक्त चारों स्थितियां न हों तो रोग का कारण प्रायः वायु ऊर्जा का असंतुलन होता है। यदि किसी भी विधि द्वारा उन ऊर्जाओं को संतुलित कर स्थिति बदल दी जाये तो रोग सरलता से दूर हो सकता है।

असाध्य रोगों के उपचार हेतु आवश्यक दिशा-निर्देश:-

                सर्व प्रथम रोग के प्रमुख लक्षणों का ऊर्जा से संबन्ध मालूम करना चाहिये। उससे संबन्धित मेरेडियन  का पता लगाना चाहिये। फिर उस मेरेडियन  की प्रमुख असंतुलित ऊर्जा को आधार मान, पूर्व में वर्णन किये गये सिद्धान्तों के आधार पर अन्य अंगों की ऊर्जाओं को संतुलित करना चाहिये। रोगों में मुख्य ऊर्जा का चयन निम्न मार्गदर्शन के अनुसार किया जा सकता है-

  1. किसी व्यक्ति के घुटनों में दर्द है, इसका मतलब घुटनों में हलन-चलन बराबर नहीं होता। अतः दर्द वाले स्थान के समीप गुजरने वाली मेरेडियन की बियोल मेरेडियन में, यदि वायु ऊर्जा को बढ़ा दिया जाये तथा शुष्क / ठण्डक ऊर्जा को कम कर दिया जाये तो, घुटनों में हलन-चलन होने लगता है।
  2. किसी व्यक्ति को त्वचा संबंधी रोग है। त्वचा का रंग बदल गया है। त्वचा शुष्क ऊर्जा से अधिक प्रभावित होती है। अतः उस स्थान के समीप गुजरने वाली मेरेडियन की बियोल मेरेडियन में, शुष्क ऊर्जा को संतुलित करने से अच्छे परिणाम आते हैं।
  3. यदि कोई अंग अथवा उपांग निष्क्रिय हो गया हों तो, उससे संबंधित बियोल मेरेडियन की शुष्क / ठण्डक ऊर्जा को कम कर तथा ताप ऊर्जा को बढ़ाने से रोग ग्रस्त भाग में चेतना की सक्रियता बढ़ने से अपेक्षित लाभ मिलता है।
  4. यदि किसी व्यक्ति के मूत्र संबंधी रोग हों, जैसे मूत्र का रुक-रुक कर आना, मूत्र को न रोक पाना, निद्रा में पेशाब आ जाना आदि। ऐसी परिस्थितियों में मूत्राशय की ठण्डक ऊर्जा को बढ़ाकर एवं वायु ऊर्जा को आवश्यकतानुसार संतुलित करने से रोग मुक्त हो सकते हैं।
  5. कभी कभी रोगी के पेशाब में रक्त आने लगता है। रक्त नियन्त्रण ताप ऊर्जा से होता है। अतः यदि मूत्राशय बियोल मेरेडियन की ताप ऊर्जा को कम कर दिया जाये, तो मूत्र के साथ रक्त आना बंद हो जाता है।
  6. यदि किसी को उल्टियों होती हों तों आमाशय की नमी ऊर्जा को घटाने, को चिकित्सा का मूल केन्द्र मान उपचार करना चाहिये।
  7. यदि किसी को दस्ते लग रही हों, उसका मतलब उसकी बड़ी आंत में नमी बढ़ गई है, अतः बड़ी आंत की नमी ऊर्जा को घटाने को चिकित्सा का मूल केन्द्र मान उपचार करना चाहिये।
  8. यदि किसी को पुरानी कब्जी हों तो बड़ी आंत की नमी ऊर्जा को बढ़ाने को चिकित्सा का मूल केन्द्र मान उपचार करना चाहिये।
  9. किसी को चक्कर आ रहे हों, तो उसका कारण मस्तिष्क में वायु असंतुलित हो गई है। अतः पित्ताशय की वायु ऊर्जा को संतुलित करने से चक्कर में राहत मिलती है।
  10. पुराना रक्तचाप का मतलब रक्त की मुख्य ताप ऊर्जा का बढ़ना और रक्तचाप का कम होना मतलब रक्त की ताप ऊर्जा का घटना। अतः रक्त चाप में हृदय की ताप ऊर्जा को आवश्यकतानुसार संतुलित कर दिया जावे तो शरीर में रक्तचाप से छुटकारा पाया जा सकता है।
  11. मेरूदण्ड संबन्धी रोगों में जैसे स्लीप डिस्क, मणकों का संकुचित होना, सर्वायकल स्पोन्डोलाइसिस, बम्बू स्पाईन आदि रोगों का मतलब मेरूदण्ड की ठण्डक ऊर्जा असंतुलित हो गई है। इसी प्रकार साईटिका आदि नाड़ी संस्थान संबन्धी रोगों का मतलब मेरूदण्ड की ताप ऊर्जा असंतुलित है। पक्षाघात प्रायः मस्तिष्क के नाड़ी संस्थान में अवरोध आने से होता है। अतः मस्तिष्क (पेरीकार्डियन) की मुख्य गर्मी ऊर्जा को अन्य लक्षणों के आधार पर संतुलित करने से अवरोध दूर किया जा सकता है।
  12. डायाबिटीज का मतलब पेन्क्रियाज का बराबर कार्य नहीं करना। इनका संबंध तिल्ली से है और उसकी मुख्य ऊर्जा नमी है। अतः ऐसे रोगियों की तिल्ली की नमी ऊर्जा बढ़ा दी जावे और सभी ग्रन्थियों के प्रतिवेदन बिन्दुओं, विशेष कर पीयूष, थायरोड ओर एड्रीलन को सक्रिय कर दिया जावे तो असाध्य समझा जाने वाला डायाबीटिज चन्द दिनों में ठीक हो सकता है।
  13. यदि किसी को कैंसर हो गया तो उसका मतलब उसका लासिका तंत्र (शरीर की सफाई व्यवस्था) बराबर कार्य नहीं कर रहा है। लासिका तंत्र का प्रमुख अंग तिल्ली है तथा उसकी ऊर्जा नमी है। अतः शरीर के जिस भाग में कैंसर की गांठ हो उस भाग से संबन्धित मेरेडियन में नमी ऊर्जा एवं ठण्डक ऊर्जा का संतुलन कर दिया जावे एवं सहायक ऊर्जाओं को संतुलित कर दिया जावे तो उस अंग का लासिका तंत्र कार्य करने लग जावेगा। विजातीय तत्व वहां पर जमा नहीं हो सकेंगे और अवरोध दूर हो जावेगा। यदि कैंसर का प्रभाव सारे शरीर में हो, जैसे रक्त कैंसर, हड्डियों के कैंसर आदि में लासिका तंत्र के मुख्य अंग अर्थात तिल्ली मेरेडियन  को उपचार का आधार मानना चाहिये। रक्त का संबन्ध ताप ऊर्जा से है और हड्डियों का संबन्ध ठण्डक ऊर्जा से है। अतः रक्त कैंसर में तिल्ली की ताप ऊर्जा जो लगभग क्षीण हो जाती है, को यदि बढ़ा दिया जावे और हड्डियों के केंसर में तिल्ली की ठण्डक ऊर्जा को कम कर नियन्त्रित कर लिया जावे तो शरीर रोग मुक्त होना प्रारम्भ कर देता है।
  14. इसी प्रकार जिन्हें हृदय का रोग है उनके हृदय की ठण्डक ऊर्जा बढ़ जाती है। जिनके हृदय के वाल्व में अवरोध आ गया है, उनके हृदय की शुष्क ऊर्जा बढ़ जाती है। हार्ट अथवा तिल्ली एनलार्जमेंट का मतलब सम्बन्धित मेरेडियन की शुष्क ऊर्जा क्षीण हो गई है।
  15. गुर्दे में पत्थरी अथवा उसके कार्य न करने का मतलब गुर्दो की ठण्डक ऊर्जा आवश्यकता से ज्यादा बढ़ गई है। अतः गुर्दे की ठण्डक ऊर्जा कम करनी चाहिए।
  16. तपेदिक का मतलब फेंफड़ों की ठण्डक ऊर्जा बढ़ गई है। अतः फेंफड़े की ठण्डक ऊर्जा कम करनी चाहिए।
  17. महिलाओं में महावारी (M.C.) यदि जल्दी हों तो ट्रिपल वार्मर की ताप ऊर्जा को कम करना चाहिए, परन्तु यदि महावारी देर से हो तो ट्रिपल वार्मर की ताप ऊर्जा को बढ़ाना चाहिए। यदि महावारी के समय रक्त का प्रवाह ज्यादा हों तो ट्रिपल वार्मर की नमी ऊर्जा को कम करना चाहिए।
  18. ऐपेन्डिक्श में मूत्राशय की ठण्डक ऊर्जा कम करनी चाहिए।
  19. बिजली का झटका लगने पर आमाशय की नमी ऊर्जा को कम करना चाहिए।
  20. एलर्जी के रोगी की तिल्ली की नमी ऊर्जा बढ़ानी चाहिए।
  21. मौसम परिवर्तन से होने वाले रोगों में आमाशय की नमी को बढ़ाना चाहिए।
  22. विषाक्त भोजन का प्रभाव दूर करने के लिए आमाशय की ताप ऊर्जा को घटाना चाहिए।
  23. युवाअवस्था में चेहरे पर मुहांसें (Pimples) होने पर छोटी आंत की ताप ऊर्जा को कम करना चाहिए।
  24. तेज बुखार में छोटी आंत की ताप ऊर्जा को कम करना चाहिए।
  25. यदि रोगी का वजन तेजी से कम हो रहा हों तो बड़ी आंत की शुष्क ऊर्जा को कम करना चाहिए।
  26. धीरे-धीरे बचपन से मोटापा बढ़ता हों तो तिल्ली की नमी ऊर्जा को कम करना चाहिए, परन्तु यदि बड़ी उम्र में अचानक मोटापा बढ़ता हो तो आमाशय की नमी ऊर्जा को कम करना चाहिए।

                इसी प्रकार फ्रेक्चर का मतलब उस भाग के समीप प्रवाहित होने वाली मेरेडियन में ठण्डक ऊर्जा का बढ़ जाना। यदि संबन्धित ठण्डक ऊर्जा को नियन्त्रित कर दिया जाये तो, दर्द में तुरन्त राहत एवं हड्डियों के जुड़ने के समय में काफी कमी हो जाती है।

                अस्थमा में फेंफड़े की वायु ऊर्जा असंतुलित हो जाती है। इस प्रकार रोग की प्राथमिकता एवं प्रकट लक्षणों की अधिकता के आधार पर यदि सही मेरेडियन और सर्वाधिक असंतुलित ऊर्जा का चयन कर उसको संतुलित करने के साथ-साथ उसकी सहायक ऊर्जाओं को पूर्व में बतलायें सिद्धान्तों के अनुसार संतुलित कर दिया जावे तो उपचार के परिणाम तुरन्त प्राप्त होने लगते हैं। मेरेडियन और असंतुलित ऊर्जा चयन में रोगी की अवस्था अनुसार बाहुल्य वाली ऊर्जा तथा रोग से संबन्धित मेरेडियन में उपचार को प्राथमिकता देनी चाहिए। मुख्य ऊर्जा को घटाने अथवा बढ़ाने के साथ-साथ उस आयु में प्रकृति के अनुसार जिस ऊर्जा का बाहुल्य हो उससे सम्बन्धित मेरेडियन में भी संतुलन करना चाहिये।

उपसंहार:-

                संक्रामक एवं पुराने रोगों में विभिन्न रोगियों की शारीरिक क्रियाओं में परिवर्तन एक जैसा नहीं होता। पूर्व में वर्णन किए गये चन्द उपचार तो जनसाधारण के मार्ग दर्शन हेतु बतलाये गये हैं। शरीर में सभी रोगों को ठीक करने की अभूतपूर्व क्षमता होती है। अतः जीवन भर दवाओं के आधार पर जीवन चलाना रोगी की मानसिक दुर्बलता का प्रतीक होता हैं। कभी कभी रोग में बिल्कुल विपरीत ऊर्जाओं के असंतुलन के लक्षण प्रकट होते हैं। अतः उपचार करते समय अनुभवी चिकित्सों का मार्गदर्शन लेने से उपचार स्थायी एवं प्रभावशाली हो सकता हैं। कौनसी ऊर्जा को कितने समय के लिए बढ़ाना अथवा घटाना चिकित्सक के विवेक तथा रोगी द्वारा उपचार से पड़ने वाले सूक्ष्मतम् परिवर्तनों की अभिव्यक्ति पर निर्भर करता है। उपचार की यह विधि इतनी सरल, सहज, कष्ट रहित, सस्ती पूर्ण अहिंसक, दुष्प्रभावों से रहित स्वावलम्बी है कि बिना शारीरिक अंगों की विस्तृत जानकारी साधारण जिज्ञासु भी जो स्वावलम्बी जीवन जीना चाहे तो चन्द दिनों में सरलता पूर्वक सीख सकता है। स्वयं को असाध्य एवं संक्रामक शारीरिक रोगों से प्रभावशाली ढंग से स्वस्थ रख सकता है।

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