क्यों पढ़े आरोग्य आपका   ?

स्वस्थ रहें या रोगी?: फैसला आपका

स्वावलम्बी अहिंसक चिकित्सा

( प्रभावशाली-मौलिक-निर्दोष-वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धतियाँ )

17. मुद्राओं द्वारा स्वास्थ्य लाभ


शरीर की संरचना में आकाश, वायु, अग्नि, पृथ्वी, जल आदि पांच महाभूत तत्त्वों की अहं भूमिका होती है।  शरीर के प्रत्येक भाग में ये पांचों तत्त्व होते हैं, फिर भी अलग-अलग भागों में इन पांचों तत्त्वों का अनुपात अलग-अलग होता है। पंच तत्त्वों के आवश्यक अनुपात के असंतुलन से रोग और संतुलन से शरीर में आरोग्य की प्राप्ति होती है।

पृथ्वी तत्त्वः-

                शरीर में ठोस अवयव होते हैं उनमें पृथ्वी तत्त्व अपेक्षाकृत अधिक होते हैं। जैसे हड्डियां, मांसपेशियाँ, त्वचा, नाखून, बाल इत्यादि। पगथली से लेकर गुदा तक शरीर में पृथ्वी तत्त्व अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय होता है। अतः शरीर के इस भाग के रोगों में पृथ्वी तत्त्व के असंतुलन की संभावनाएँ अधिक रहती है।

जल तत्त्वः-

                शरीर में जितने तरल पदार्थ होते हैं, जैसे रक्त, वीर्य, लार, लासिका, पसीना, आंसू, थूक, मल, मूत्र, मज्जा आदि का जल तत्त्व से विशेष संबंध होता है। शरीर के गुदा से लेकर नाभि तक के भाग में जल तत्त्व अपेक्षाकृत अधिक होता है। अतः इस भाग से संबंधित अंगों के रोगों में जल तत्त्व की प्रायः अहं भूमिका होती है।

अग्नि तत्त्वः-

                अग्नि तत्त्व शरीर के तापक्रम को स्थिर रखने, अंगों को सक्रिय रखने, शरीर के आभा मंडल तथा स्वभाव पर नियन्त्रण रखता है। इसकी अधिकता से बुखार, शरीर में जलन, पित्त का बढ़ना, भूख और प्यास ज्यादा लगना, क्रोध अधिक आना, भोग की इच्छा होना जैसे लक्षण प्रकट होने लगते हैं। इसके असंतुलन से भूख और प्यास बराबर नहीं लगती। स्वभाव में चिड़चिड़ापन, शारीरिक ताकत में बदलाव, आंखों का तेज कम होने लगता है। शरीर में नाभि से लेकर हृदय तक के भागों में यह तत्त्व अपेक्षाकृत अधिक होता है।

वायु तत्त्वः-

                शरीर में गति संबंधी प्रत्येक कार्य में इस तत्त्व का विशेष योगदान होता है। जैसे श्वसन, हलन-चलन, चिंतन-मनन, सिकुड़ना-फैलाना, रक्त एवं लासिका प्रवाह, मल-मूत्र एवं अन्य विजातीय तत्त्वों के विसर्जन, धारण करना, फेंकना इत्यादि। शरीर में हृदय से लेकर कंठ तक वायु तत्त्व अपेक्षाकृत अधिक होता है।

आकाश तत्त्वः-

                आकाश तत्त्व चारों तत्त्वों को स्थान देता है। हमारे शरीर में पांचों (आंख, कान, नाक, जीभ, स्पर्श) ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से जो ग्रहण किया जाता है, उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप जो कुछ  होता  है उसका संबंध इस तत्त्व से होता है। जैसे काम, क्रोध, मोह, लोभ, लज्जा इत्यादि।

                सभी दुष्प्रवृत्तियों, शारीरिक आवश्यकताओं और रोग संबंधी अवयवों के असंतुलन को संबंधित महाभूत तत्त्व को संतुलित कर आसानी से दूर किया जा सकता है। जिससे व्यक्ति रोग मुक्त, सजग बन सुखी जीवन जीते हुये अपने उच्चतम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।

मुद्राओं द्वारा पंच तत्त्वों का संतुलनः-

                हस्त योग मुद्राओं द्वारा पंच तत्त्वों को सरलता से संतुलित किया जा सकता है। ये मुद्राएँ शरीर में चेतना के शक्ति केन्द्रों में रिमोट कण्ट्रोल के समान स्वास्थ्य रक्षा और रोग निवारण करने में प्रभावशाली कार्य करती है। जिससे मानव भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति की तरफ अग्रसर होता है।

मुद्रा विज्ञान:-

                हाथ की पाँचों अंगुलियों का सम्बन्ध पंच महाभूत तत्त्वों से होता है। प्रत्येक अंगुली अलग-अलग तत्त्व का प्रतिनिधित्व करती है। जैसे- कनिष्ठिका जल तत्त्व से, अनामिका, पृथ्वी तत्त्व से, मध्यमा अग्नि तत्त्व से, तर्जनी वायु तत्त्व से और अंगुठा आकाश तत्त्व से। परन्तु बहुत से योगी अंगूठे को अग्नि और मध्यमा को आकाश तत्त्व का प्रतीक मानते हैं। परन्तु ऐसा इसलिए उचित नहीं लगता क्योंकि आकाश तत्त्व ही सभी तत्त्वों को आश्रय देता है, उसके सहयोग के बिना किसी भी तत्त्व का अस्तित्त्व नहीं रहता।

                मुद्रा विज्ञान के अनुसार हमारी अंगुलियाँ ऊर्जा का नियमित स्रोत होने के साथ-साथ एन्टीना का कार्य भी करती है। शरीर में पंच तत्त्वों की घटत-बढ़त से व्याधियाँ होती हैं। अंगुलियों एवं अंगूठे को मिलाने, दबाने, स्पर्श करने, मोंड़ने तथा विशेष आकृति में कुछ समय तक बनाए रखने से शरीर में तत्त्वों के अनुपात में परिवर्तन किया जा सकता है। उसका स्नायु मण्डल और यौगिक चक्रों पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है।

                अंगूठे को तर्जनी, मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठिका के मूल में लगाने से उस अंगुलि से सम्बन्धित तत्त्व की विशेष वृद्धि होती है। अंगुलियों के प्रथम पौर में स्पर्श करने से तत्त्व सन्तुलित होता है तथा इन अंगुलियों को मोड़ कर अंगूठे के मूल पर स्पर्श कर अंगूठे से दबाने से उस तत्त्व की कमी होती है। इस प्रकार विभिन्न मुद्राओं के माध्यम से पंच तत्त्वों को इच्छानुसार घटाया अथवा बढ़ाकर संतुलित किया जा सकता है। हथेली में अंगुलियों एवं अंगूठों की अलग स्थितियों द्वारा अलग-अलग मुद्राऐं बनती है, जो पंच तत्त्वों को संतुलित कर साधक को स्वस्थ रखने में सहयोग करती है।

चन्द उपयोगी मुदाएँ

ज्ञान मुद्राः- अंगुष्ठ व तर्जनी के ऊपरी पौर के स्पर्श करने से जहाँ हल्का सा नाड़ी स्पन्दन हो, ज्ञान मुद्रा बनती है। इस मुद्रा से स्मरण शक्ति तेज होती है, एकाग्रता बढ़ती है और बुद्धि निर्मल एवं मन नियन्त्रित होता है। आज्ञा चक्र सक्रिय होने से शरीर में हारमोनस का संतुलन एवं सभी अन्तःश्रावी ग्रन्थियों की सक्रियता बढ़ने लगती है। परिणामस्वरूप सभी कार्य व्यवस्थित होने लगते हैं।

वायु मुद्राः- अंगुष्ठ से तर्जनी को दबाने से वायु मुद्रा बनती है जो शरीर में वायु के बढ़ने से होने वाले वात रोगों का शमन करती है, जैसे शरीर में कम्पन्न होना, जोड़ों का दर्द, गंठिया, रीढ़ की हड्डी संबंधी दर्द, वात रोग, लकवा आदि के समय इस मुद्रा को करने से रोगों में राहत मिलती है।

आकाश मुद्रा:- अंगुष्ठ के ऊपरी पौर को मध्यमा के ऊपरी पौर से स्पर्श करने से आकाश मुद्रा बनती है। इससे अग्नि तत्त्व संतुलित होता है। हड्डियां मजबूत होती है। मुख का तेज ओर कान्ति सुधरती है। विचार क्षमता बढती है। श्रवण शक्ति ठीक रहती है एवं कान के रोग ठीक होते हैं। मानसिक संकीर्णता कम होती है। हृदय रोग में भी यह मुद्रा प्रभावकारी होती है। मानसिक एवं शारीरिक विकलांगता के लिए यह मुद्रा बहुत अच्छी है।

शून्य मुद्रा:- मध्यमा के ऊपरी पौर को अंगुष्ठ के मूल पर स्पर्श कर अंगुष्ठ से दबाकर बाकी अंगुलियाँ सीधी रखने से बनती है। इस मुद्रा से शरीर में मणिपुर चक्र से विशुद्धि चक्र तक के सभी चक्र प्रभावित होते हैं। बहरापन, गले के रोग,कान का दर्द, हिचकी, गूंगापन, सिर दर्द, विचार एवं शारीरिक शून्यता दूर होती है। काम वासना नियन्त्रित होती है। मूत्रावरोध दूर होता है। रक्त संचार सुधरता है।

पृथ्वी मुद्रा:- अंगुष्ठ को अनामिका के ऊपरी पौर से स्पर्श से यह मुद्रा बनती है। पृथ्वी तत्त्व सन्तुलित होने से शरीर की ताकत और पैरों की शक्ति बढ़ती है। हड्डियां एवं मांसपेशियां शक्तिशाली होती है। रक्त की कमी दूर होती है। नाभि के आसपास स्थित प्रायः सभी  अंगों से संबंधित रोगों में लाभ होता है। भूख नियन्त्रित होती है।

सूर्य मुद्रा:- अनामिका के ऊपरी पौर को अँगूठे के मूल पर रख कर अंगूठे से दबाने पर यह मुद्रा बनती है। इस मुद्रा से मोटापा व भारीपन घटता है। मानसिक तनाव में कमी आती है। सर्दी एवं जल तत्त्व की अधिकता वाले उल्टियें, दस्तें संबंधित रोग ठीक होते हैं। नेत्र ज्योति बढ़ती है और प्रारम्भिक स्तर का मोतिया बिन्द भी ठीक होता है। पाचन क्रिया ठीक होती है जिससे कोलस्ट्रोल भी कम होता है।

जल मुद्रा (वरुण मुद्रा):- अंगुष्ठ का कनिष्ठ अंगुलि के ऊपरी पौर पर स्पर्श करने से यह मुद्रा बनती है। कनिष्ठिका जो शरीर में जल तत्त्व का संतुलन करती है। जल तत्त्व की कमी से होने वाले रोगों में जैसे- मांसपेशियों में खिचांव, चर्म रोग, शरीर में रुक्षता आदि ठीक होते हैं। रक्त शुद्धि और त्वचा में स्निग्धता लाने के लिए वरुण मुद्रा लाभदायक होती है। लू नहीं लगती। बाईटों (Cramps) में इस मुद्रा से तुरन्त आराम मिलता है। आकस्मिक दुर्घटना में इस मुद्रा से चमत्कारी लाभ होता है।

जलोदर नाशक मुद्रा:- कनिष्ठिका को पहले अंगूठे की जड़ से लगा कर फिर अंगूठे से कनिष्ठिका को दबाने से जलोदर नाशक मुद्रा बनती है। इस मुद्रा से शरीर से जल की वृद्धि से होने वाले रोग ठीक होते हैं। जैसे फेफड़ों अथवा पेट में पानी भरना, शरीर के किसी भाग में सूजन, नाक से पानी आना, आंखों से पानी आना, मुंह से लार टपकना आदि। इस मुद्रा को करने से शरीर  के विजातीय द्रव्य बाहर निकलने लगते है, जिससे शरीर निर्मल बनता है, पसीना आता है, मूत्रावरोध ठीक होता है।

प्राण मुद्रा:- कनिष्ठिका और अनामिका के ऊपरी पौर को अंगूठे के ऊपरी पौर से स्पर्श करने से यह मुद्रा बनती है, जो जल और पृथ्वी तत्त्व को शरीर में सन्तुलन करने में सहयोग करती है।  इस मुद्रा से चेतना शक्ति जागृत होती है। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। भूख प्यास सहन हो जाती है। रक्त संचार सुधरता है। आँखों के रोगों में राहत मिलती है। नेत्र ज्योति सुधरती है। हस्त रेखा विज्ञान के अनुसार सूर्य की अंगुलि अनामिका समस्त प्राणशक्ति का केन्द्र मानी जाती है। बुद्ध की अंगुलि कनिष्ठिका युवा शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है। अतः इस मुद्रा के अभ्यास से शरीर में प्राण शक्ति का संचार तेज होता हैं रक्त संचार ठीक होने से रक्त नलिकाओं का अवरोध दूर होता है। साधक को भूख प्यास की तीव्रता नहीं सताती। थकावट दूर होती है। वाक् शक्ति सुधरती है।

अपान मुद्रा:- मध्यमा और अनामिका अंगुली के सिरे को अंगूठे के सिरे से स्पर्श करने से बनती है। इस मुद्रा से शरीर से  विभिन्न प्रकार के विजातीय तत्त्वों की विसर्जन क्रिया नियमित होती है, ताकि अनावश्यक, अनुपयोगी पदार्थ सरलता पूर्वक शरीर से बाहर निकल जाते हैं।                 इससे पेट में वायु का नियन्त्रण होने से पेट संबंधी वात रोगों में विशेष लाभ होता है। इस मुद्रा से मूत्राशय की कार्य प्रणाली सुधरती है। गुर्दो के रोग, कब्ज और बवासीर में यह मुद्रा विशेष लाभ दायक होती है। यह मुद्रा दांतों को भी स्वस्थ रखती है। इस मुद्रा से पसीना नियमित ढंग से आने लगता है। शरीर में प्राण और अपान वायु संतुलित होती है।

व्यान मुद्राः- अंगुठा, तर्जनी और मध्यमा के अग्र भाग को स्पर्श कर शेष दोनों अंगुलियां सीधी रखने से बनती है। इस मुद्रा से वात, पित्त और कफ का संतुलन होता है। उच्च एवं निम्न रक्त चाप में विशेष तथा हृदय रोग में लाभ होता है।

उदान मुद्राः- अंगुठा, तर्जनी, मध्यमा एवं अनामिका के अग्र भाग को मिलाने से यह मुद्रा बनती है। इस मुद्रा से गले संबंधी रोग दूर होते हैं। स्मरण शक्ति एवं सजगता विकसित होती है। मानसिक शान्ति एवं स्थिरता बढ़ती है।

समान मुद्राः- अंगूठे एवं हथेली की चारों अंगुलियों के अग्र भाग को मिलाने से यह मुद्रा बनती है। इस मुद्रा से पांचों तत्त्वों का संतुलन होता है। दर्दस्थ एवं शरीर के कमजोर भाग पर यह मुद्रा बना अंगुलियों का स्पर्श करने से दर्द में आराम तथा निष्क्रिय भाग सक्रिय होने लगता है। इस मुद्रा से शरीर, मन और बुद्धि में अच्छा तालमेल रहने लगता है।

अपान वायु मुद्रा:- इस मुद्रा को मृत संजीवनी मुद्रा भी कहते है। तर्जनी को अंगुष्ठ के मूल से स्पर्श कर अंगूठे का अग्रभाग मध्यमा और अनामिका के ऊपरी पौर से स्पर्श करने व कनिष्ठिका को सीधी रखने से बनती है। इस मुद्रा से हृदयघात, हृदय रोग, हृदय की कमजोरी धड़कन, प्राण ऊर्जा की कमी, उच्च रक्त चाप, सिर दर्द, बैचेनी, पेट की गैस, घबराहट दूर होती है। दिल का दौरा पड़ने पर यह मुद्रा इंजेक्शन के समान तुरन्त प्रभाव दिखलाती है। हृदय के रोगियों को सीढ़िया चढ़ते समय यदि श्वास फूलता हो तो सीढ़िया चढ़ने से पूर्व 10-15 मिनट इस मुद्रा को करने से श्वास नहीं फूलता। हिचकी, दमा एवं दांतों के दर्द में आराम मिलता है। भोजन करते समय यदि भोजन का अंश श्वास नली में चला जाए तो तुरन्त राहत दिलाती है।

शंख मुद्रा:-  बांये हाथ के अंगूठे को दांये हाथ की मुट्ठी में बन्द कर बांये हाथ की तर्जनी को दाहिने हाथ के अँगूठे से मिला, बाकी तीनों अंगुलियों को मुट्ठी के ऊपर रखने से शंख मुद्रा बनती है। इस मुद्रा से वाणी संबंधी रोग जैसे तुतलाना, आवाज में भारीपन, गले के रोग और थायरायड संबंधी रोगों में विशेष लाभ होता है। भूख अच्छी लगती है। वज्रासन में बैठकर यह मुद्रा करने से अधिक प्रभावकारी हो जाती है। हृदय के पास इस मुद्रा को हथेलियाँ रख कर करने से हृदय रोग में शीघ्र लाभ होता है। रक्त चाप कम होने लगता है।

लिंग मुद्रा:- दोनों हाथों की अंगुलियों को आपस में फंसाकर दायें अंगूठे को ऊपर खड़ा रखने से यह मुद्रा बनती है। इस मुद्रा से शरीर में गर्मी बढ़ती है। मोटापा कम होता है। कफ, नजला, जुकाम, खांसी, सर्दी संबंधी रोगों, फेंफड़ों के रोग, निम्न रक्तचाप आदि में कमी, होती है। इस मुद्रा से शरीर में मौसम परिवर्तन से होने वाले सर्दी जन्य  रोगों में शीघ्र राहत मिलती है तथा शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

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