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स्वावलम्बी अहिंसक चिकित्सा

( प्रभावशाली-मौलिक-निर्दोष-वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धतियाँ )

11. स्वास्थ्य का मूलाधार अन्तःश्रावी ग्रन्थियाँ


अन्तःश्रावी ग्रन्थियों की क्षमता-

                जैसे वृक्ष का आधार उसकी जड़ें एवं मकान का आधार उसकी नींव होती है, ठीक उसी प्रकार जीवन के सफल संचालन में हमारी अन्तःश्रावी ग्रन्थियों का योगदान होता है। जड़ एवं नींव बाह्य रूप से न दिखने के बावजूद वृक्ष के विकास एवं मकान की सुरक्षा हेतु आवश्यक होती है, ठीक उसी प्रकार प्रत्यक्ष रूप से न दिखने के बावजूद हमारे शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक गतिविधियों के संचालन में अन्तःश्रावी ग्रन्थियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

                हम क्या हैं और क्यों हैं? हमारे स्वभाव, प्रवृत्तियों, क्रियाओं एवं प्रतिक्रियाओं का संचालन और नियन्त्रण कौन और कैसे करता है? हमारे शरीर का नियन्त्रित एवं समयबद्ध विकास ही क्यों होता है? निश्चित अवधि के पश्चात् अंगों के विकास एवं वृद्धि में क्यों स्थिरता आ जाती है? कुछ व्यक्ति क्रोधी, क्रूर, हिंसक, अशान्त, चिड़चिड़े, हताश, भयभीत, असंवेदनशील, निराशावादी होते हैं तो बहुत से व्यक्ति स्वभाव से शान्त प्रसन्न, हंसमुख, आशावादी, संवेदनशील, करुणाशील, निडर, निर्भय, आत्म-विश्वासी क्यों होते हैं? एक ही अध्यापक से शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों में कोई मन्दबुद्धि वाला तो कोई प्रखर पंडित, विद्वान्, ज्ञानी कैसे बन जाते हैं? एक ही परिस्थिति में कार्य करने वाले सभी व्यक्तियों में नेतृत्व की क्षमता एकसी क्यों नहीं होती है? कोई साधारण खुराक खाने के बावजूद मोटा एवं तगड़ा होता है तो बहुत से व्यक्ति खाने-पीने में पूर्ण विवेक रखने तथा अच्छी खुराक लेने के बावजूद अपेक्षाकृत दुबले-पतले ही क्यों रह जाते हैं? कभी-कभी कुछ व्यक्ति बहुत बोने तो चन्द व्यक्ति अत्याधिक लम्बे क्यों हो जाते हैं? ऐसे सैकड़ों प्रश्नों का समाधान आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान में अन्तःश्रावी ग्रन्थियों की कार्य प्रणाली एवं क्षमता को जानने से हो जाता है।

प्रभावशाली चिकित्सा की मूलभूत आवश्यकता-

                ग्रन्थियों के बराबर कार्य न करने से 75 प्रतिशत से अधिक रोगों के पनपने की सम्भावना रहती है। ग्रन्थियों को सुव्यवस्थित एवं संतुलित किये बिना लाख प्रयास करने के बावजूद हम पूर्णतया रोग मुक्त नहीं हो सकते। अतः जो चिकित्सा पद्धतियाँ ग्रन्थियों को सरल ढंग से ठीक करने की क्षमता रखती हैं, वे ही व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ रख सकती है। फिर वह चाहे ध्यान, स्वाध्याय, एक्यूप्रेशर या अन्य विधि ही क्यों न हो? जिन चिकित्सा पद्धतियाँ में अन्तःश्रावी ग्रन्थियों  का सरल एवं प्रभावशाली उपचार न हों, वे अधिकांश रोगों के मूल कारणों को दूर करने में सक्षम नहीं होती, अतः पूर्ण अथवा प्रभावशाली एवं मौलिक चिकित्सा पद्धतियाँ कैसे मानी जा सकती हैं?

अन्तःश्रावी ग्रन्थियों को प्रभावित करने वाले तथ्य-

                हमारा प्रत्येक विचार, चिन्तन, मनन, क्रिया, प्रतिक्रिया हमारी ग्रन्थियों को प्रभावित करती है। ग्रन्थियाँ हमारे स्वास्थ्य की निर्माता होती हैं। इनमें सक्रियता, संतुलन, सहयोग और समन्वय स्वस्थता का सूचक होता हैं तथा इसके विपरीत निष्क्रियता, असंतुलन, असहयोग बीमारी का द्योतक होता है। ‘‘तनाव, चिन्ता, भय, निराशा, आवेग, क्रोध, अहम्, माया, लोभ आदि पाश्विक वृत्तियों से ग्रन्थियाँ खराब हो जाती हैं।’’ इसीलिये हमारे ऋषि मनीषियों ने कषाय और तनावमुक्त, संयमित, विवेकपूर्ण, सद्चिन्तन युक्त जीवन जीने की प्रेरणा दी। क्षण मात्र की भी असजगता रखने तथा प्रमाद न करने का परामर्श दिया। हमारे अधिकांश रीति-रिवाजों, परम्पराओं, त्योहारों एवं अनुष्ठानों के पीछे भी प्रतिकूल परिस्थितियों में उत्पन्न दुःख को भूलाकर प्रसन्नता पूर्वक जीवन जीने का उद्देश्य रहा हुआ है, जिससे हमारी ग्रन्थियाँ खराब न हों और हम रोग मुक्त जीवन जी सकें। परन्तु आज हम आधुनिकता के नाम पर उनके महत्त्व को भुलाकर अपनी अनेक हितकारी परम्पराओं को छोड़ते जा रहे हैं। फलतः तनाव और चिंताएँ बढ़ रही है और हमारी ग्रन्थियाँ प्रायः पूर्ण स्वस्थ नहीं रहती हैं।

                ग्रन्थियाँ मस्तिष्क की कार्य प्रणाली, चिन्तन, संकल्प, संवेदनाओं आदि शारीरिक एवं मानसिक क्रियाओं तथा प्रतिक्रियाओं के संचालन में सहयोग करती हैं। हमें अपना सुख-दुःख, भला-बुरा, सही-गलत का विवेक जगाने की क्षमता प्रदान करती हैं। ये हमारे जीवन की गतिविधियों, ऊर्जा, स्थिरता, व्यक्तित्व, हलन-चलन, विकास, व्यवस्था का नियन्त्रण करती हैं। एण्टीबायोटिक एवं अनावश्यक दवाइयों के अत्यधिक सेवन से प्रायः ग्रन्थियाँ निष्क्रिय हो जाती हैं, जिससे शरीर की रोग प्रतिकारात्मक शक्ति घटने लगती है।

अन्तःश्रावी ग्रन्थियों की कार्य प्रणाली-

                जिस प्रकार मधु मक्खी फलों का रस संचय कर उसमें अपना थूक मिलाकर मधु बनाती है, ठीक उसी प्रकार ग्रन्थियाँ भी शरीर में से आवश्यक तत्त्व ग्रहण कर उसमें अपना रस मिलाकर रासायनिक कारखानों की भांति शक्तिशाली हारमोन्स का निर्माण करती है। प्रत्येक ग्रन्थि आवश्यकतानुसार एक या उससे अधिक हारमोन्स बनाती है, जिनकी तरंगें नाड़ी संस्थान के माध्यम से आकाशवाणी की भांति प्रसारित हो, शरीर के प्रत्येक भाग में शीघ्र पहुँचने की क्षमता रखती है। ये हारमोन्स हमारे शरीर में प्रतिक्षण निष्क्रिय होने वाली मृतप्रायः कोशिकाओं को पुनर्जीवित कर क्रियाशील बनाने का कार्य करते हैं, जिससे सभी शारीरिक क्रियायें व्यवस्थित रूप से चलती रहें। सभी ग्रन्थियाँ केन्द्रीय मंत्री-मण्डल की भांति सामूहिक जिम्मेदारी से कार्य करती हैं। किसी एक ग्रन्थि के खराब अथवा निष्क्रिय होने का प्रभाव अन्य ग्रन्थियों के कार्यों पर भी पड़ता है।

                एक्यूप्रेशर पद्धति द्वारा इन ग्रन्थियों के हथेली एवं पगथली में स्थित संवेदन बिन्दुओं पर उचित दबाव देकर इनकी कार्य प्रणाली को सरलता पूर्वक व्यवस्थित/नियन्त्रित किया जा सकता है। जिससे हमारे जीवन पद्धति में आवश्यक परिवर्तन लाया जा सकता है, मानवीय गुणों का विकास किया जा सकता है, बुरी आदतों एवं पाश्विक वृत्तियों से छुटकारा पाया जा सकता है।

       प्रमुख अन्तःश्रावी ग्रन्थियाँ- हमारे शरीर में 8 प्रमुख अन्तःश्रावी ग्रन्थियाँ होती है।

  1. पीयूष, 2. पिनियल,                           3. थायरोइड,                            4. पेराथायरोइड, 
  2. थायमस, 6. एड्रीनल,                              7. पेंक्रियाज,                            8. प्रजनन।
  3. पीयूष ग्रन्थि (Pituitary Gland)

                इस ग्रन्थि का आकार मटर के दाने से भी छोटा होता हैं। सिर में मस्तिष्क के नीचे स्थित यह सभी ग्रन्थियों में प्रमुख ग्रन्थि होती है। अतः इसे मास्टर ग्लॅण्ड अथवा संचालक ग्रन्थि भी कहते हैं। इसका श्राव अन्य ग्रन्थियों को उत्तेजित करता है ताकि वे अपना-अपना निर्धारित कार्य बराबर कर सकें।

                यह ग्रन्थि व्यक्ति को तनावमुक्त, प्रसन्न, उत्साहित, समभावी, पैनी दृष्टि वाला पारस्परिक प्रेम सम्बन्ध बनाये रखने में बहुत महत्त्वपूर्ण होती हैं। शरीर के आन्तरिक हलन-चलन, स्फूर्ति, हृदय की धड़कन, संवेदनशील नाड़ियों का संचालन, शरीर के तापक्रम एवं शक्कर की मात्रा को नियन्त्रित करती है। शरीर के विकास में इसका महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। यदि बाल्यावस्था में यह ग्रन्थि अधिक सक्रिय हो जाती है तो बालक अपेक्षाकृत अधिक लम्बा हो जाता है परन्तु यदि यह ग्रन्थि शिथिल हो तो व्यक्ति बोना रह जाता है। सिर के बालों एवं हड्डियों के विकास को यह संतुलित रखती है।

                इसका मानसिक प्रतिभा, रक्त के दबाव, प्रजनन अंगों के विकास पर गहरा प्रभाव पड़ता है। स्त्रियों में प्रसूति के समय गर्भाशय में लचीलापन आना तथा स्तनों में दूध का नियन्त्रण इसी ग्रन्थि द्वारा होता है। यदि यह ग्रन्थि बराबर कार्य न करें तो कमजोरी, अधिक प्यास लगना, अधिक पेशाब आना, बालों का झड़ना, समय के पूर्व सफेद होना, गंजापन, मानसिक विकास का अवरूद्ध होना, स्मरण शक्ति बराबर न होना आदि रोग हो सकते हैं।

                यह ग्रन्थि हमारी जीवन पद्धति, प्रवृत्तियों को नियन्त्रित करती है। नकारात्मक सोच वालों, झूठ बोलने वालों, शरारती लोगों, घमण्डी, क्रोधी, दुराचारी, पागल व्यक्तियों की यह ग्रन्थि बराबर कार्य नहीं करती है। अधिकांश आत्महत्याओं का कारण इस ग्रन्थि का असंतुलन होता है। इसमें सूजन आ जाने से हृदय की धड़कन बढ़ जाती है, आंखें बाहर आने लगती हैं एवं शरीर कमजोर होने लगता है। इसके अधिक सक्रिय होने पर व्यक्ति वाचाल, अस्थिर, बात-बात में स्वभाव (मूड) बदलने वाला, अत्याधिक संवेदनशील हो जाता है एवं उसकी त्वचा गर्म रहने लगती है। ज्ञान मुद्रा इस ग्रन्थि के बराबर कार्य करने में सहयोग करती है।

पिनियल ग्रन्थि (Peneal Gland)

                वह ग्रन्थि मस्तिष्क के पीछे स्थित होती है जिसका आकार राई के दाने से भी छोटा होता है।यह ग्रन्थि प्रधान सचिव की भांति शरीर की प्रशासनिक व्यवस्था एवं गतिविधियों के संचालन में सहयोग करती है। सभी ग्रन्थियों एवं अवयवों के अनुपात को आवश्यकतानुसार संतुलित रखना, उनका विकास करना एवं उनसे आवश्यक कार्य करवाना, इसके अधीन होता है। संकट से बचने के लिये आवश्यक निर्देश देना एवं शीघ्र क्रियान्वित कराना इसका मुख्य कार्य होता है। यह निर्णयात्मक क्षमता का प्रतिनिधित्व करती है। यदि यह ग्रन्थि बराबर कार्य न करें तो व्यक्ति की निर्णयात्मक क्षमता कम हो जाती है जिससे समय पर सही निर्णय नहीं ले पाता।

                यह ग्रन्थि शरीर में पोटेशियम, सोडियम एवं पानी के प्रमाण को भी संतुलित रखती है। अतः यदि यह ग्रन्थि बराबर कार्य न करे तो शरीर गुब्बारे की भांति फूल सकता है एवं गुर्दे खराब हो सकते हैं।

थायरोइड ग्रन्थि (Thyoroid Gland)

                गहरे लाल रंग की ग्रन्थि कंठ के नीचे गले की जड़ में दो भागों में विभक्त होती है। इसका पाचन क्रिया से सीधा सम्बन्ध होता है तथा यह भोजन को रक्त, मांस, मज्जा, हड्डियाँ एवं वीर्य में बदलने में सहयोग करती है। यह ग्रन्थि शरीर के मोटापे और वजन का नियन्त्रण रखती है। इसका प्रजनन अंगों से भी सीधा सम्बन्ध होता  है। कामेच्छा को गति देने एवं प्रजनन अंगों को स्वच्छ रखने तथा महिलाओं के एम.सी (महावारी) को नियन्त्रित रखने का कार्य में इस ग्रन्थि की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। आॅक्सीजन के उपयोग तथा कार्बनडाईआॅक्साईड के निष्कासन का नियन्त्रण भी यह ग्रन्थि करती है। शरीर के सभी अंगों को शक्ति उत्पन्न करने के लिए आवश्यक श्राव भेजना, श्वसन का संचालन, शरीर में केलशियम, आयोडिन तथा कोलोस्ट्रोल के निर्माण पर नियन्यण में सहयोग करती है। हड्डियों के विकास, घाव भरने एवं रक्त के प्रवाह को नियन्त्रित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मधुर, कर्कष, मोटी, धीमी आदि आवाज का नियन्त्रण, फुर्तीला अथवा आलसी, क्रूर अथवा दयालु, अधीर या धैर्यवान, उत्सुक अथवा उदासीन आदि स्वभाव का नियन्त्रण, इससे सम्बन्धित होते हैं।

                यह ग्रन्थि दाम्पत्य एवं पारिवारिक जीवन में विशेष महत्त्व रखती है। क्योंकि ऐसे पति-पत्नी जिनकी ये ग्रन्थियाँ एक दूसरे से विपरीत होती है, अर्थात् एक की सक्रिय एवं दूसरे की अपेक्षाकृत निष्क्रिय हो तो उनके स्वभाव में तालमेल बैठना कठिन होता है। इसके श्राव शरीर को बाह्य वातावरण के अनुकूल बनाने में सहयोग करते हैं। जब यह ग्रन्थि अपनी क्षमता से कम कार्य करती है तो व्यक्ति का चयापचय तंत्र (Metabolism) असंतुलित हो जाता है। परिणाम स्वरूप उसका वजन बढ़ने लगता है। परन्तु जब यह ग्रन्थि अधिक सक्रिय हो जाती है तो व्यक्ति का वजन घटने लगता है।

                थायरोइड ग्रन्थि का कार्य स्पार्क जनरेटर अथवा स्टोरेज बैटरी के समान होता है। यदि हम शरीर रूपी हमारी बैटरी को जल्दी डिसचार्ज कर देते हैं तो हमें थकावट अनुभव होने लगती है एवं वजन बढ़ने लगता है परन्तु यदि उसको ओवरचार्ज करते हैं तो व्यक्ति हतोत्साहित, चिड़चिड़ा, कमजोर एवं दुबला होने लगता है।

                थायरोइड ग्रन्थि ज्यादा सक्रिय होने की अवस्था में शरीर का तापमान सामान्य से अधिक रहने लगता है, वजन घटना शुरू हो जाता है, गर्मी सहन करने की क्षमता कम हो जाती है, पसीना ज्यादा आने लगता है, व्यक्ति को ज्यादा बेचैनी एवं घबराहट होने लगती है जिससे साधारण सी छोटी-छोटी बातों पर भी व्यक्ति उत्तेजित होने लगता है, वह बहुत अधिक संवेदनशील, बात-बात में शीघ्र मूड बदलने वाला (जिसको आसानी से नियन्त्रित न किया जा सके) हो जाता है।

                बहुत से बच्चों में बचपन से ही ज्यादा चाकलेट/टाॅफियें खाने अथवा अन्य पैतृक कारणों से थायरोइड ग्रन्थि अशक्त हो जाती है जिसके परिणाम स्वरूप उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है और उनकी जननेन्द्रियाँ पूर्णतः विकसित नहीं हो पातीं है।

पेराथायरोइड ग्रन्थि (Parathyroid Gland)

                यह गले में थायरोइड ग्रन्थि के पीछे दोनों तरफ दो-दो अर्थात् कुल चार छोटी-छोटी ग्रन्थियाँ होती है। ये ग्रन्थियाँ शरीर की अपेक्षाकृत अधिक रक्तमय भाग होती हैं तथा रक्त के रसायनिक तत्त्वों को ठीक रखने में सहायक होती हैं।

                इस ग्रन्थि के श्राव रक्त में केलशियम एवं फासफोरस के प्रमाण का संतुलन रखते हैं। शरीर में इनका संतुलन बिगड़ने से बांईटे ¼Cramps½ आने लगते हैं। रक्त में केलशियम का अनुपात काफी महत्त्वपूर्ण होता है। क्योंकि केलशियम चोट के समय रक्त के बहाव को रोकने में अहं भूमिका निभाता है। साथ ही केलशियम कोलस्ट्रोल को नियन्त्रित रखने, नाड़ियों तथा मांसपेशियों की गतिविधियों को संचालित करने हेतु आवश्यक होता है।

                रक्त में केलशियम की मात्रा अधिक होने से गुर्दों में केलशियम जमने लगता है। जिससे गुर्दों में पथरी हो सकती है। जब केलशियम मांसपेशियों के तन्तुओं पर जमा होने लगता है तो रियुमेटिजम हो सकता है और यदि केलशियम जोड़ों पर जमने लगता है तो आर्थाराइटिस हो सकता है। क्रोध से यह ग्रन्थि खराब हो जाती है और कभी-कभी अत्याधिक आवेग से पक्षाघात (लकवा) तक हो सकता है। शांति, धैर्य, स्थिरता, सहयोग देने की भावना आदि मानवीय गुण पेराथायरोइड की स्वस्थता के प्रतीक होते हैं।

थायमस ग्रन्थि (Thymus Gland)

                यह ग्रन्थि गर्दन के नीचे तथा हृदय के ऊपर स्थित होती है। इसको बच्चों की धायमाता भी कहते हैं क्योंकि यह बच्चों की रोगों से रक्षा करती है। यह ग्रन्थि बालकों के शारीरिक विकास एवं जनेन्द्रियों के विकास पर नियन्त्रण रखती है। युवा अवस्था प्रारम्भ होने पर इसके पिंड धीरे-धीरे लुप्त होने लगते हैं अर्थात् यह ग्रन्थि अपना कार्य बन्द कर देती है। यदि किसी कारणवश यह ग्रन्थि वयस्क होने पर भी क्रियाशील रहे तो शरीर में जड़ता आ जाती है तथा थकावट जल्दी अनुभव होने लगती है। जब तक यह ग्रंथि सक्रिय रहती है प्रजनन अंग उत्तेजित नहीं होते। मन में कामवासना के विकार जागृत नहीं होते। ऐसा कहा जाता है कि वृद्धावस्था में यह ग्रन्थि पुनः सक्रिय हो जाती है। इसी कारण बच्चों और वृद्धों के स्वभाव में प्रायः काफी एक रूपता होती है।

एड्रीलन ग्रन्थि (Adreneal Gland)

                ये ग्रन्थियाँ दोनों गुर्दों के ठीक ऊपर होती है। शरीर की संचार व्यवस्था, हलन-चलन, श्वसन, रक्त परिभ्रमण, पाचन, मांस पेशियों का संकुचन अथवा फैलाव, पानी अथवा अन्य अनावश्यक पदार्थों का निष्कासन आदि शरीर की अधिकांश प्रमुख गतिविधियों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसका कार्य लड़ों या भाग जाओ अर्थात् शरीर की अवरोधक/प्रतिकारात्मक क्षमता विकसित करना होता है। उसके लिये आवश्यक सभी प्रकार की दवाओं का शरीर में निर्माण इस ग्रन्थि के श्राव बनाने में सहयोग करते हैं। यह व्यक्ति को साहसी, निर्भय, सहनशील, आशावादी बनाती है एवं आत्मविश्वास जागृत करती है। शरीर को सभी प्रकार की एलर्जी एवं रोगों से बचाती है। अत्याधिक भय अथवा साधारण से रोगों में दवाई लेने तथा बाल्यकाल में बच्चों के अनावश्यक रोग निरोधक टीके लगाने से, यह ग्रन्थियाँ प्रायः बराबर कार्य नहीं करतीं।

पेन्क्रियाज ग्रन्थि (Pancreas Gland)

                यह पेट में स्थित 6‘‘ से 8’’ लम्बी गन्थि होती है। जिसका ऊपरी भाग पाचक रस बनाता है जो क्षारीय स्वभाव का होने से शरीर में आम्लीय तत्त्वों का नियन्त्रण रखता है। इसमें अनेक तत्त्व होते हैं जो कठोर भोजन को पतला बनाने में सहयोग करते हैं जिससे आंतें उनको ग्रहण कर सकें। जबकि नीचे वाला भाग इंसुलिन नामक रस बनाता है जो शरीर में ऊर्जा हेतु मुख्य तत्त्व होता है। यह ग्लुकोज को ग्रहण करने में सहायता करता है तथा शरीर में उसकी मात्रा को संतुलित एवं नियन्त्रित रखता है। जब तक इंसुलिन उचित मात्रा में बनता है तो यकृत भी अतिरिक्त ग्लूकोज को ग्लाईकोजिन में बदल कर अपने पास एकत्रित रख सकता है ताकि आवश्यकता पड़ने पर पुनः ग्लूकोज में बदल कर कोशिकाओं तक पहुँचा सके। दूसरी बात इंसुलिन की कमी के कारण शरीर ग्लूकोज को चर्बी के रूप में भी नहीं रख पाता। फलतः ग्लूकोज जो शरीर पूर्ण ग्रहण नहीं कर पाता मूत्र द्वारा बाहर चला जाता है एवं मधुमेह नामक रोग हो जाता है। व्यक्ति अन्दर ही अन्दर शक्तिहीन होने (दीमक लगी लकड़ी के समान) लगता है। आँखें एवं गुर्दे इसकी खराबी से जल्दी प्रभावित होते हैं। तनाव मधुमेह के रोग का मुख्य कारण होता है। खुराक का नियन्त्रण, पाचन सम्बन्धी नियमों का पालन, प्राणायाम, नियमित भ्रमण, स्वाध्याय, भक्ति, सद्चिन्तन, तनावमुक्त आचरण, कड़वे स्वादों का सेवन इस रोग के निवारण में प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं। पेन्क्रियाज बहुत ही संवेदनशील ग्रंथि होती है एवं इसकी मामूली खराबी से शरीर की सारी रसायनिक क्रियाएँ प्रभावित होने लगती है।

                यदि पेन्क्रियाज अधिक कार्य करे तो इंसुलिन आवश्यकता से ज्यादा बनने लगता है, जिससे रक्त में ग्लूकोज की मात्रा कम होने लगती है। इस परिस्थिति में भूख ज्यादा लगती है, पसीना अधिक आता है, रक्तचाप घट जाता है, सिर दर्द होता है एवं कमजोरी का अनुभव होता हैं। रोगी कभी-कभी बहकी-बहकी बातें करने लगता है और यदि ग्लूकोज की मात्रा बहुत कम हो जावे तो अचानक बेहोशी की अवस्था में पहुँच मृत्यु तक हो जाती है। ऐसी परिस्थिति के लक्षण प्रकट होने पर रोगी को तुरन्त कुछ मीठा पीला देना चाहिए।

प्रजनन ग्रन्थियाँ (Sex Glands)

                यह ग्रन्थियाँ कामेच्छा को नियन्त्रित कर विपरीत लिंग (सेक्स) में आर्कषण पैदा करती हैं। प्रजनन का कार्य अत्याधिक महत्त्वपूर्ण होने से अन्य ग्रंथियाँ भी इस कार्य में प्रमुख भूमिका निभाती हैं। पिनियल जहाँ कामेच्छा जागृत करती है, थायरोइड उसे गति देती है तथा पीयूष ग्रंथि प्रजनन अंगों का विकास करती है, वहीं यह ग्रन्थि सारे प्रजनन तंत्र के कार्यों का संचालन करती है। प्रजनन ग्रंथियाँ एवं एड्रीनल ग्रंथियाँ एक दूसरे के हारमोन बनाने में आपस में सहयोग करती हैं, जिससे शरीर एलर्जी से बच सके। जिन महिलाओं का गर्भाशय शल्य चिकित्सा द्वारा निकाल दिया जाता है, रक्त में ओवरीज के हारमोन मिलना बंद हो जाते हैं, ऐसे रोगियों की एड्रीनल, पीयूष एवं थायरोइड ग्रंथियों को सक्रिय करने से आवश्यक हारमोन्स की पूर्ति संभव हो सकती है। ऐसे रोगियों की प्रायः सभी ग्रंथियाँ शिथिल हो जाती हैं। अतः सभी ग्रंथियों के प्रतिवेदन बिन्दुओं पर नियमित दबाव देना चाहिये। ये ग्रन्थियाँ बराबर कार्य न करें तो जननेन्द्रियों सम्बन्धी रोग हो जाते हैं। चेहरे का आकर्षण, तेज, व्यक्तित्व इसी ग्रंथि की क्षमता को दर्शाता है। यह ग्रंथि बालों को बढ़ाने, स्वर सुधारने, शरीर के तापक्रम तथा आकार को संतुलित रखने में सहयोग करती है।

लिम्फ ग्रन्थि-

                उपरोक्त ग्रंथियों के अतिरिक्त एक लिम्फ ग्रंथि भी होती है जो यद्यपि अन्तःश्रावी ग्रन्थि नहीं होती है, फिर भी उसका कार्य काफी महत्त्वपूर्ण होता हैं। इसका कार्य शरीर में पीब को उत्पन्न होने से रोकना है। यह ग्रंथि शरीर की विकृति को दूर करने का महत्वपूर्ण कार्य करती है। जब शरीर में विकृति ज्यादा बढ़ जाती है तब इस ग्रन्थि को ज्यादा कार्य करना पड़ता है, जिससे यह कमजोर हो जाती है। कैंसर के बारे में भी यह ग्रंथि सर्व प्रथम चेतावनी देती है।

उपसंहार-

                जिस प्रकार किसी बड़े नेता से व्यक्तिगत मिलने हेतु लम्बी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है परन्तु टेलीफोन द्वारा तुरन्त सीधा सम्पर्क हो जाता है। ठीक उसी प्रकार एक्यूप्रेशर चिकित्सा में अन्तःश्रावी ग्रन्थियों के हथेली और पगथली में स्थित प्रतिवेदन बिन्दुओं पर दबाव देकर ग्रन्थियों के असंतुलन को सरलता पूर्वक दूर किया जा सकता है। एक्यूप्रेशर पद्धति द्वारा इन ग्रंथियों का जितना सरल, सहज, प्रभावशाली उपचार हो सकता है उतना अन्य चिकित्सा पद्धतियों में प्रायः सम्भव नहीं होता। आज जहाँ चारों तरफ क्रूरता, हिंसा/आतंकवाद, क्रोध, स्वछन्दता, घमण्ड, माया, लोभ, घृणा, द्वेष, तनाव आदि दुष्प्रवृत्तियाँ बढ रही हैं जिससे संबंधित व्यक्तियों की ग्रंथियों का उपचार कर आसानी से बदला जा सकता है।

                स्वास्थ्य मंत्रालय से अपेक्षा है कि विज्ञापन तथा मनोरंजन के नाम पर संचार मंत्रालय द्वारा बेहिचक काम विकार बढ़ाने वाले जो दृश्य टी.वी. पर दिखाये जाते हैं, जिनसे उठने वाले आवेग, जनता की ग्रन्थियों को खराब कर रहे हैं, उन पर रोक लगावे। इससे होने वाले दुष्प्रभावों का पता लगाये। अनावश्यक रोग अवरोधक टीकों का प्रचार बन्द करें। उन कारणों के मूल में जावे जिसके फलस्वरूप डाॅक्टरों एवं अस्पतालों के निरन्तर बढ़ने के बावजूद जनता का स्वास्थ्य निरन्तर क्यों गिरता जा रहा है? रोगियों की संख्या में तीव्र गति से वृद्धि क्यों हो रही है? आज हमारी प्रतिकारात्मक शक्ति क्यों कम हो रही है? सहनशक्ति क्यों क्षीण हो रही है? दवाइयों के कहीं दुष्प्रभाव तो नहीं पढ़ रहे हैं? नये-नये रोग क्यों पनप रहे हैं? उन कारणों को दूर करने में अपना कत्र्तव्य एवं जिम्मेदारी का ईमानदारी पूर्वक पालन करें। स्वस्थ रहने की भावना रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को तथा दूसरों को स्वस्थ रखने में जुड़े प्रत्येक चिकित्सक को पूर्वाग्रह छोड़ ग्रंथियों के इस सरल उपचार को अवश्य सीखना चाहिये। जो हमारे शरीर में 75 प्रतिशत से ज्यादा रोगों का मूल कारण होते हैं अन्यथा हम ऊपर से स्वस्थ दिखते हुये भी वास्तव में स्वस्थ नहीं बन सकते। जेलों में कैदियों के स्वभाव परिवर्तन हेतु ग्रंथियों का उपचार किया जावे। सभी अध्यापकों एवं अभिभावकों से विनम्र अनुरोध है कि बालकों के चारित्रिक विकास हेतु इन ग्रंथियों को स्वस्थ रखने के तरीकों की बालकों को जानकारी दें। जन साधारण जितना-जितना इन ग्रंथियों के प्रति सजग होगा, उतनी-उतनी उनकी प्रतिकारात्मक शक्ति बढ़ेगी। चारित्रिक गुणों का विकास होगा, तनाव घटेगा, विवेकशील बनेगा, उसमें सद्चिन्तन की प्रवृत्ति बढ़ेगी, आशावादी दृष्टिकोण पैदा होगा, साहस बढ़ेगा, चिन्तायें मिटेंगी, व्यक्तित्व का विकास होने से प्रतिकूल परिस्थितियों में भी प्रसन्न एवं स्वस्थ रहकर सच्चे अर्थों में स्वाधीन बनेगा, एवं अपने आपको चिकित्सकों से दूर रख सकेगा।

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